The Mysterious Bell202 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 202

6 min read November 5, 2026

वो फोन काटने लगी, फिर रुकी। उसने फोन फिर कान पर लगाया। उसकी आँखें बड़ी हो गईं। उसने देखा — सीधे मेरी तरफ़।

"कौन?" मैंने पूछा।

उसने फोन जेब में रखा।

"मेरा पुराना एडिटर," उसने धीरे से कहा। "पाँच साल वाला। जिसके साथ मैं उस रमा मैडम की खबर छापी थी।"

"क्या कहा उसने?"

वो कुछ देर चुप रही। गली में कुछ बच्चे खेल रहे थे — उनकी आवाज़ें आ रही थीं। पीपल के पत्तों में एक गौरैया चहचहा रही थी।

"वो कह रहा था," मीरा ने कहा, "कि उसे मेरी हालत का पता चला। कि नोटिस की खबर उसे मिल गई।"

"तो?"

"तो वो कह रहा था," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ एक अजीब सी ठंडक में आ गई, "कि इस बार बचने का रास्ता सिर्फ़ साहब के पास है।"

हम दोनों चुप हो गए।

फिर मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।मीरा ने फोन जेब में रखा और कुछ देर वैसे ही खड़ी रही।

मैंने देखा कि उसके हाथ में कैमरा था, पर उँगलियाँ ढीली थीं, जैसे वो कैमरा नहीं, कोई भारी पत्थर पकड़े हो।

"मीरा," मैंने कहा।

"हाँ?"

"तू डर गई।"

उसने मेरी तरफ़ देखा। फिर हँसी। वो हँसी जो लोग तब हँसते हैं जब उनके अंदर कुछ काँप रहा हो और वो उसे छुपाने के लिए हँस देते हैं।

"मैं डरती नहीं हूँ," उसने कहा।

"मैंने कहा नहीं कि तू डरती है," मैंने कहा। "मैंने कहा कि तू डर गई। दोनों में फ़र्क़ है। डरना आदत है, डर जाना हालत है।"

वो चुप हो गई।

गली के मुँह पर एक ठेला गुज़रा — सब्ज़ी वाला, जो रोज़ शाम इसी वक़्त निकलता है। उसकी घंटी की आवाज़ आई, फिर चली गई।

"मेरा एडिटर," मीरा ने कहा, "पाँच साल से मुझसे नहीं बोला था। आज बोला। और पहली बात यही कही कि बचने का रास्ता साहब के पास है।"

"उसने यह क्यों कहा?"

"क्योंकि उसे पता है," मीरा ने कहा, "कि अगर रणवीर भारद्वाज किसी पत्रकार पर हाथ डाले, तो उस पत्रकार के पास दो ही रास्ते बचते हैं। या तो वो साहब की हो जाए, या वो खत्म हो जाए।"

मैंने घंटी जेब में महसूस की। ठंडी नहीं थी।

"वो खत्म करेगा?" मैंने पूछा।

"मेरे पास एक चैनल है," मीरा ने कहा। "बीस हज़ार लोग देखते हैं। मेरे पास एक कैमरा है, एक फटा बैग है, और एक कमरा है जिसका किराया मैं हर महीने सोचकर देती हूँ। खत्म करने के लिए इतना ही काफ़ी है।"

"तो?"

"तो मैं उससे सीधा पूछूँगी।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"किससे?"

"रणवीर भारद्वाज से," उसने कहा। "कैमरे के सामने। अस्पताल की ज़मीन पर। नीलामी पर। पापा के अंगूठे पर।"

"और तू सोचती है वो जवाब देगा?"

"मैं सोचती हूँ," मीरा ने कहा, "कि वो जवाब नहीं देगा। वो मुस्कुराएगा। और उसकी मुस्कान, अगर मैं ठीक से कैमरे में ले लूँ, तो वो मुस्कान उसके खिलाफ़ सबसे बड़ा सबूत बन जाएगी।"

मैंने कुछ देर सोचा।

"तूने उसकी मुस्कान देखी है?" मैंने पूछा।

"रोज़ देखती हूँ," उसने कहा। "हर पोस्टर पर। पर पोस्टर की मुस्कान और आमने-सामने की मुस्कान में फ़र्क़ होता है।"

"क्या फ़र्क़?"

"पोस्टर पर वो मुस्कुराता है," मीरा ने कहा, "क्योंकि कैमरा उसे देख रहा है। सामने जब मुस्कुराएगा, तब पता चलेगा कि वो कैमरे को देखकर मुस्कुरा रहा है या मुझे।"

मुझे यह बात ठीक लगी।

"ठीक है," मैंने कहा। "तो तू कब पूछेगी?"

"आज।"

"आज कैसे? वो तो भारद्वाज भवन में बैठा होगा।"

मीरा ने अपना फोन निकाला।

"मैं उसके दफ़्तर फोन करूँगी," उसने कहा। "मैं कहूँगी कि मैं एक पत्रकार हूँ और मुझे अस्पताल की ज़मीन के बारे में कुछ सवाल पूछने हैं। वो मुझे दफ़्तर बुलाएगा। मैं जाऊँगी।"

"नहीं," मैंने कहा।

"क्यों नहीं?"

"क्योंकि उसके दफ़्तर में तेरे पीछे कोई रिकॉर्डिंग करेगा," मैंने कहा। "और जब तू सवाल पूछेगी, तो वो तुझे ऐसा घुमाएगा कि तेरी रिकॉर्डिंग में तू ही गुनहगार लगेगी।"

मीरा ने फोन नीचे किया।

"तो क्या करें?"

"उससे यहाँ बुला," मैंने कहा।

"यहाँ?"

"गली के मुँह पर," मैंने कहा। "जहाँ सब देख रहे हों। जहाँ उसकी गाड़ी खड़ी हो और उसकी मुस्कान किसी दफ़्तर की कुर्सी पर न बैठे, खुली गली में बैठे।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ आई जो मैंने पहले भी कुछ लोगों की आँखों में देखी थी — डर और ज़िद, दोनों एक साथ।

"वो आएगा?" उसने पूछा।

"आएगा," मैंने कहा। "क्योंकि वो जानता है कि गली उसे देख रही है। और उसे गली के सामने न आने से ज़्यादा डर किसी चीज़ का नहीं है।"

मीरा ने फोन उठाया और नंबर मिलाया।

उसने दो मिनट बात की। बहुत ठंडी आवाज़ में। "जी, मैं मीरा तिवारी बोल रही हूँ, बस्ती की आवाज़ से। मुझे अस्पताल की ज़मीन पर कुछ सवाल पूछने हैं… जी… जी… नहीं, दफ़्तर नहीं। मैं गली के मुँह पर हूँ… अगर आप आज शाम यहाँ से गुज़रें, तो मैं दो मिनट ले लूँगी।"

वो रुकी। सुनी। फिर उसका चेहरा बदला।

"जी," उसने कहा। "जी, ठीक है।"

उसने फोन काटा।

"क्या कहा?" मैंने पूछा।

"उसने कहा," मीरा ने धीरे से कहा, "कि वो गली के मुँह से खुद गुज़रेगा। कहा कि उसने सुना है कि गली में एक नया पत्रकार निकला है जो बिना माइक के सवाल पूछता है। और उसने कहा कि वो उस पत्रकार से मिलने खुद आएगा।"

मेरे पेट में कुछ ठंडा हुआ।

"उसने 'नया पत्रकार' कहा?"

"हाँ।"

"वो तुझे जानता है," मैंने कहा। "वो तेरा नाम जानता है। वो तेरा चैनल जानता है। वो यह भी जानता है कि तू किसके साथ खड़ी है।"

मीरा ने कंधे उचकाए।

"तो जानता हो," उसने कहा।

मैंने घंटी जेब से निकाली। उसे हथेली पर रखा।

"कुछ कह," मैंने धीरे से कहा।

घंटी चुप रही।

"अच्छा," मैंने कहा। "तेरा भी यही तरीक़ा है। जब सबसे ज़्यादा ज़रूरत हो, तब चुप।"

मैंने उसे वापस जेब में रखा।

"चल," मीरा ने कहा। "मुझे कैमरा तैयार करना है।"

हम दुकान पर लौटे। मीरा ने अपना बैग खोला और उसमें से तिपाई निकाली। वो तिपाई थोड़ी टेढ़ी थी — एक पैर का रबर गायब था, उसकी जगह कपड़ा लिपटा था।

टिंकू पीछे से आया।

"दीदी," उसने कहा, "आज मैं कैमरा पकड़ूँगा?"

"नहीं," मीरा ने कहा।

"प्लीज़।"

"टिंकू," मीरा ने कहा, "आज कैमरा ऐसे आदमी के सामने जाएगा जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी कैमरों के सामने मुस्कुराकर काटी है। अगर तेरे हाथ में कैमरा आया और वो एक बार तेरी तरफ़ देखकर मुस्कुरा दिया, तो तेरे हाथ काँपेंगे।"

"नहीं काँपेंगे।"

"काँपेंगे," मीरा ने कहा। "मेरे भी काँपते हैं। और मैं पाँच साल से यही कर रही हूँ।"

टिंकू ने कुछ नहीं कहा। पर वो वहीं खड़ा रहा। जैसे उसे पता था कि उसका काम अभी आएगा।

शबनम आपा गुमटी से आईं। हाथ में दो गिलास चाय थी।

"पी लो," उन्होंने कहा। "गला सूखा होगा।"

मीरा ने गिलास लिया।

"आपा," मैंने कहा, "आज शाम उसकी गाड़ी गली के मुँह पर रुकेगी।"

शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा।

"तो?"

"तो गुमटी खुली रहे," मैंने कहा। "और आप बाहर बेंच पर बैठिए।"

"मैं क्यों बैठूँ?"

"क्योंकि जब वो गाड़ी से उतरेगा," मैंने कहा, "तो उसकी नज़र सबसे पहले उन लोगों पर जाएगी जो उसके सामने खड़े हैं। और जो लोग पीछे बैठे हैं, उन्हें वो देखेगा ही नहीं।"

शबनम आपा ने कुछ देर सोचा। फिर उन्होंने चिमटी उठाई और पीतल की थाली पर धीरे से रख दी।

"मैं बैठूँगी," उन्होंने कहा। "और मैं उसकी गाड़ी का नंबर भी याद रखूँगी।"

"क्यों?"

"क्योंकि," उन्होंने कहा, "जिस दिन यह सब खत्म होगा, उस दिन मैं उस नंबर के आगे एक लाइन लिखूँगी।"

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