The Mysterious Bell – Chapter 201
मीरा ने वीडियो फिर चलाया। फिर चलाया। तीन बार। चार बार। हर बार उसकी आँखें उसी मुस्कान पर टिकती रहीं।
उसने अपना सिर नीचे किया।
"कुछ नहीं है," उसने कहा। "एक भी धमकी नहीं। एक भी ऐसी बात नहीं जिसे मैं अदालत में ले जा सकूँ। वो सिर्फ़ मुस्कुराया और मैं उसे पकड़ नहीं पाई।"
"तूने सवाल तो अच्छे पूछे," मैंने कहा।
"सवाल अच्छे थे," उसने कहा। "पर जवाब भी तो अच्छे थे। मैंने काग़ज़ माँगा? नहीं। मैंने उससे पूछा कि काग़ज़ दिखाइए? नहीं। मैंने सिर्फ़ आरोप लगाए और अपने हाथ में कैमरा पकड़े रही और सोचती रही कि वो पकड़ा जाएगा। पर वो बड़ा आदमी है। वो पकड़ा नहीं जाता। वो सिर्फ़ मुस्कुराता है।"
उसने कैमरा मेज़ पर पटक दिया। ज़ोर से।
"यही मेरी ग़लती है," उसने कहा। "हमेशा रही है।"
"क्या?"
वो चुप रही। मुझे लगा कि वो नहीं बोलेगी। पर फिर उसने बात की — धीमी आवाज़ में, जैसे किसी बीमार की तरह।
"पाँच साल पहले," उसने कहा, "मैं एक अख़बार में थी। छोटी रिपोर्टर। एक टीचर थी — रमा मैडम। उसके बारे में मुझे किसी ने कुछ बताया। मैंने सुना और सुना और बिना पूरी जाँच किए एक खबर छाप दी। आधी सच। आधी झूठ। मेरे पास सबूत था — बस एक काग़ज़ का टुकड़ा जो किसी अजनबी ने फेंका था।"
वो रुकी।
"उस खबर से उसका घर टूट गया। उसका मर्द चला गया। उसके बच्चे को स्कूल से लोगों ने निकाल दिया। और मैं?"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"मुझे पदोन्नति मिली," उसने कहा। "मुझे अपना चैनल बनाने के लिए उसी खबर का नाम काम आया। 'बस्ती की आवाज़' — यह नाम भी उसी दिन पड़ा। मेरी आवाज़ जिसने एक घर तोड़ा।"
मुझे ध्यान आया — माँ की हिसाब की कॉपी। मई कभी उसकी आवाज़ में यह नहीं सुनी थी। यह कमरे की हवा में पहली बार आ रही थी।
"उसके बाद से," उसने कहा, "मैं हर छोटी खबर के पीछे पागलों की तरह भागती हूँ। मैं सोचती हूँ कि अगर मैं हर खबर पकड़ लूँगी, तो शायद किसी दिन मैं अपना वो आधा सच भी पूरा कर सकूँगी। पर नहीं। आज फिर… आज फिर मैंने आधा सच पकड़ा और पूरा खो दिया।"
वो फ़र्श पर बैठ गई।
मैं कुछ देर चुप रहा।
फिर मैंने उसके सामने चारपाई पर बैठकर कहा, "मीरा।"
"क्या?"
"आज तूने झूठ नहीं बोला," मैंने कहा। "आज तूने सिर्फ़ वो पूछा जो तेरे पास था। सवाल अधूरे रह गए। पर झूठ नहीं बोला। और सच बोलने के लिए सबूत ज़रूरी नहीं होता — सच बोलने के लिए हिम्मत ज़रूरी होती है, और वो तेरे पास है।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"पर उस आदमी ने सही कहा," उसने कहा। "हिम्मत से अदालत नहीं जीती जाती।"
"अदालत शायद न जीती जाए," मैंने कहा। "पर गली जीती जाती है। और गली अदालत से बड़ी होती है, मीरा। गली में एक बात जो चार दीवारों में बोली जाती है, वो एक दिन छत उठाकर बाहर आ जाती है। तेरा कैमरा सिर्फ़ सबूत नहीं है। तेरा कैमरा गली का कान भी है। जब रणवीर मुस्कुरा रहा था, तेरा कैमरा चालू था — और उसका मुँह उसमें दिख रहा है। वो मुँह जो 'मदद' कह रहा है, वो 'दबाव' कह रहा है, इसे गली अगर एक बार सुन ले, तो वो अकेली अदालत में जाने की ज़रूरत नहीं रहेगी।"
उसने कोई जवाब नहीं दिया।
तभी बाहर दुकान की तरफ़ से किसी के जूतों की आवाज़ आई। भारी आवाज़। मैं उठा और दरवाज़े से बाहर झाँका।
बबलू पांडे खड़ा था। आज फिर चेन पहनी हुई थी। पानदान भी वापस आ चुका था। पर उसका चेहरा आज कुछ और था। जैसे रात भर सोया हो और उठकर आ गया हो। घमंड वापस आया था।
वो हमारी तरफ़ बढ़ा। उसके हाथ में एक काग़ज़ था — मुड़ा हुआ, मोटा।
"मीरा जी," उसने कहा, आवाज़ में वही पुरानी चबाती हुई लय। "साहब ने कहा था कि आपको अलग से कुछ देना है।"
उसने काग़ज़ मीरा के हाथ में थमा दिया।
मीरा ने उसे खोला।
मैं पीछे से पढ़ नहीं पा रहा था। पर मीरा का चेहरा सफ़ेद हो गया। फिर धीरे-धीरे लाल होने लगा। उसने काग़ज़ ऊपर उठाया, और उसकी आवाज़ तेज़ थी।
"यह क्या है?" उसने कहा।
"नोटिस," बबलू ने कहा। "आपकी नहीं। हमारी तरफ़ से। यही जवाब है साहब का, मीरा जी। यह काग़ज़ अब आपके खिलाफ़ है। आपने अपने चैनल पर झूठी खबर छापी — रणवीर भारद्वाज जैसे इज़्ज़तदार आदमी के खिलाफ़। अब अदालत जाएगा। और साहब का वकील चंद्रेश सक्सेना साहब खुद इस केस को लड़ेंगे।"
मीरा ने काग़ज़ पढ़ा। मैंने उसके हाथ से लिया। काग़ज़ पर वही सब लिखा था जो कल रात आए काग़ज़ पर था — पर आज यह कुछ और था। इसमें यह भी लिखा था कि आरोपी अगर तीन दिन में सार्वजनिक रूप से माफ़ी नहीं माँगती, तो उसके चैनल को बंद करवाने की कार्रवाई की जाएगी। साथ में हर्जाने की बात भी थी — इतनी रकम जो सुनकर मीरा की आँखें छत की दरारों पर टिक गईं।
बबलू मुस्कुराया।
"वैसे," उसने कहा, "साहब ने एक और बात कही थी। कहा कि मीरा जी को यह भी बता देना कि अगर वो चाहें, तो काग़ज़ को… रास्ते में पड़ा मिला कह सकते हैं। सब कुछ ठीक हो सकता है।"
"क्या मतलब?" मीरा ने कहा।
"मतलब," बबलू ने कहा, "कि तीन दिन बहुत होते हैं। एक आदमी को खुद सुलझाने के लिए।"
वो पलटा और चला गया।
मीरा वहीं बैठी रह गई। उसके हाथ में काग़ज़ था और उसकी आँखें उस काग़ज़ पर थीं, पर वो पढ़ नहीं रही थी। वो कहीं और थी। शायद पाँच साल पीछे, किसी अख़बार के दफ़्तर में, किसी आधे सच के साथ।
मैंने उसके सामने घुटने टेके।
"मीरा," मैंने कहा।
उसने मुझे देखा।
"आज तक जो हुआ," मैंने कहा, "वो हो गया। अब तेरे पास यह काग़ज़ है।"
"हाँ," उसने कहा। "यह काग़ज़ मेरे खिलाफ़ है।"
"नहीं," मैंने कहा। "यह काग़ज़ एक दीवार है जो उसने खड़ी की है। और दीवार के पीछे वो खुद छिपा है। तू अगर इस दीवार से डर गई, तो वो जीत जाएगा।"
"तो क्या करूँ? काग़ज़ फाड़ दूँ?"
"काग़ज़ मत फाड़," मैंने कहा। "काग़ज़ फाड़ने से कुछ नहीं होता। गली के सामने खड़े होकर बोल कि यह काग़ज़ आया है। कह कि तुझ पर झूठी खबर का इल्ज़ाम है। कह कि तेरे पास सबूत नहीं, तो क्या हुआ — तेरे पास मुँह है, और वो काफ़ी है।"
"अगर मैं हार गई?"
"तो भी बोल। हार उसको कहते हैं जो चुप हो जाए। तू चुप नहीं होगी।"
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रही।
फिर उसने धीरे से काग़ज़ मोड़ा, अपने बैग में रखा, और खड़ी हो गई।
"मैं जा रही हूँ," उसने कहा।
"कहाँ?"
"अपने दफ़्तर," उसने कहा। "कुछ पुराने काग़ज़ देखने हैं।"
वो चली गई।
मैं दुकान के बाहर आया। पीपल के नीचे धूप फैल रही थी। शबनम आपा गुमटी पर कुछ बोल रही थीं, पर आवाज़ मेरे कान तक साफ़ नहीं पहुँच रही थी। मैंने घंटी जेब से निकाली।
"अब बोल," मैंने कहा। "क्या हम सही कर रहे हैं?"
घंटी गुनगुनी थी। पर चुप थी।
"तू हमेशा चुप क्यों रहती है जब सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है?" मैंने कहा।
और तभी — बहुत धीमे से — घंटी ने एक शब्द कहा।
"सुन।"
"क्या सुनूँ?"
वो फिर चुप हो गई।
मैंने सिर उठाया।
और मुझे सुना — दूर से, किसी कमरे के अंदर से, एक फोन की घंटी बज रही थी। मीरा का फोन। वो अपने दफ़्तर में नहीं पहुँची थी — वो शायद अभी भी गली के मोड़ पर थी, बैग से फोन निकाल रही थी।
मैं तेज़ी से वहाँ पहुँचा।
मीरा ने फोन उठाया। उसका चेहरा देखकर मैं समझ गया कि कॉल किसकी है।
"रमेश भाई?" उसने कहा। "नहीं। नहीं। मैं अभी आ रही हूँ।"
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