The Mysterious Bell – Chapter 199
“तू इतना कैसे कह सकता है?”
“क्योंकि मेरे पास तीन दिन हैं,” मैंने कहा। “और मेरे पास घंटी है। और मेरे पास गली है। तेरे पास क्या है?”
वो देर तक मेरी तरफ़ देखती रही।
“मेरे पास कैमरा है,” उसने कहा। “और मेरे पास अंकल सालेम साहब का फोन है।”
“क्या फोन रिकॉर्ड होता है?”
“हाँ,” उसने कहा। “मैंने तो नहीं सोचा था, पर फोन अपने आप रिकॉर्ड करता है।”
मैं मुस्कुराया।
“तो देख,” मैंने कहा। “जब वो काग़ज़ बनवा रहा था, तब वो नहीं जानता था कि उसकी बात रिकॉर्ड होगी। आज रात सालेम साहब की बात रिकॉर्ड हो गई। कल कोई और बात होगी। धीरे-धीरे हमारा काम होगा। और उसका हर बार नया हाथ फँसेगा।”
वो उठी। मैंने देखा कि वो जाने से पहले एक बार रुकी।
“अंकुश,” उसने कहा।
“हाँ?”
“आज रात अगर तू नहीं होता, तो मैं कहीं और होती। किसी और के पास। और शायद — शायद मैं उनकी बात मान लेती।”
“कोई नहीं मानता,” मैंने कहा। “डर सबको लगता है, पर मानता कोई नहीं।”
वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी। उसने दरवाज़ा खोला। बाहर रात थी। गली में चुप्पी थी। बस एक दूर कुत्ता भौंक रहा था, और पीपल के पत्ते धीरे-धीरे हिल रहे थे।
वो रुकी और पलटी।
“तीन दिन,” उसने कहा।
“तीन दिन,” मैंने कहा।
वो गई।
मैं अकेला रह गया।
मैंने काग़ज़ फिर उठाया। मैंने उस पर मीरा का नाम पढ़ा, चंद्रेश सक्सेना का हस्ताक्षर देखा, और नीचे बबलू पांडे का नाम। यह नोटिस कोई काग़ज़ नहीं था। यह शुरुआत थी।
मैंने घंटी उठाई। वो अब ठंडी नहीं थी। वो गुनगुनी थी, और मुझे लगा कि उसका रंग भी थोड़ा गहरा है — जैसे शाम की रोशनी में गर्म पीतल।
“घंटी,” मैंने धीरे से कहा। “तीन दिन में हमें क्या जोड़ना है?”
घंटी चुप रही।
“कुछ तो कह,” मैंने कहा। “तू चुप रहेगी, तो मैं क्या करूँगा?”
फिर भी चुप।
मैंने उसे वापस जेब में रखा। चारपाई पर लेटा। छत की तरफ़ देखा। छत पर पुरानी दरारें थीं। बल्ब गुनगुनाता रहा।
और तभी, बहुत धीमे से, जैसे दूर किसी कुएँ से आवाज़ आए, मैंने एक शब्द सुना।
बस एक शब्द।
मैं उठकर बैठ गया। जेब से घंटी निकाली।
“तूने कहा?”
घंटी चुप थी।
पर मैंने सुना था। ठीक से सुना था। और वो शब्द मेरे दिमाग़ में चुभ गया, जैसे कोई सुई कपड़े में फँस जाए।
शब्द था — “जूते।”
मैं चारपाई पर वापस बैठ गया। हाथों में घंटी थी। मैंने उसे मुँह के पास लाया।
“जूते?” मैंने कहा। “तू मुझे जूते बता रही है? उस्ताद ने भी कहा था — आज रात दुकान पर आने वाले के जूते देखना।”
घंटी चुप रही।
मैंने दुकान के दरवाज़े की तरफ़ देखा। वो बंद था। फिर मैंने खिड़की की तरफ़ देखा। उस पर पुरानी चटाई टँगी थी। मैं उठा, चटाई हटाई, और बाहर झाँका।
गली में अंधेरा था। पीपल एक बड़ा काला साया बनकर खड़ा था। चबूतरी ख़ाली थी।
पर दूर, गली के मुँह की तरफ़, जहाँ बिजली की एक पुरानी खंभा है, वहाँ एक आदमी खड़ा था।
मैंने आँखें सिकोड़ीं। वो चल नहीं रहा था। बस खड़ा था। और उसके जूते… उसके जूते सफ़ेद थे।
मैंने घंटी को ममैंने घंटी को मुँह के पास लाया और धीरे से कहा, "अब क्या? वो आदमी कौन है?"
घंटी ने कुछ नहीं कहा। बस एक गुनगुनाहट, जैसे दूर कोई पुराना तार खिंचकर छूट जाए।
मैंने चटाई वापस टाँगी और दुकान का दरवाज़ा खोलकर बाहर कदम रखा। रात की हवा में वो हल्की सी नमी थी जो बारिश से पहले आती है। पीपल के पत्ते हिल रहे थे, पर मुझे हवा महसूस नहीं हुई।
वो आदमी वहीं खड़ा था। बिजली के पुराने खंभे के नीचे। उसके जूते सफ़ेद थे — बिल्कुल सफ़ेद, जैसे अभी पोंछकर आया हो। पर गली की धूल भी उन पर नहीं लगी थी। यही सबसे अजीब बात थी। गली में कोई आए, और उसके जूते साफ़ रहें — यह उस गली में नामुमकिन था जिसमें आधे घरों के बाहर नाली बहती है।
मैं धीरे-धीरे उसकी तरफ़ बढ़ा।
"भाई साहब," मैंने कहा। "इतनी रात को कोई दुकान ढूँढ रहे हैं? दुकान तो बंद है।"
वो मुड़ा।
उसका चेहरा छिपा हुआ था — पीले पुराने बल्ब की रोशनी नीचे पड़ रही थी और उसका चेहरा ऊपर अंधेरे में था। पर उसकी आवाज़ साफ़ थी। बहुत साफ़। जैसे किसी ने आवाज़ को तराश कर रखा हो।
"बंद नहीं है," उसने कहा। "तुम्हारी दुकान कभी बंद नहीं होती।"
मैंने कदम रोक दिए। "आप कौन हैं?"
"एक ग्राहक," उसने कहा। "पर मेरी चीज़ जैसी कोई चीज़ तुम ठीक नहीं कर सकते।"
"तो फिर क्यों आए?"
वो हँसा। छोटी, ठंडी हँसी। "देखने आया कि तुम कैसे आदमी हो।"
"देख लिया?"
"देख लिया," उसने कहा। "तुम्हारे दादा जैसे हो। वो भी बात-बात में मुँह लगा देते थे।"
मेरी रीढ़ में एक ठंडी सुई चुभी। दादा का नाम। रात को। इस अंधेरे में।
"आप मेरे दादा को जानते थे?" मैंने पूछा।
वो पीछे हटा। धीरे-धीरे। जैसे कोई साया खिसकता हो।
"जानता था," उसने कहा। "पच्चीस साल पहले जानता था। अब भी जानता हूँ।"
वो मुड़ा और चलने लगा।
"रुकिए," मैंने कहा। "आपका नाम?"
वो नहीं रुका। पर जाते-जाते उसने एक बात कही, जो मेरे दिल में एक कील की तरह गड़ गई।
"नाम से क्या होता है," उसने कहा। "तुम उस चीज़ को देखो जो मैं पीछे छोड़ रहा हूँ।"
वो अंधेरे में घुल गया। मैं वहीं खड़ा रह गया, साँस रोककर, कान खड़े किए, पर गली चुप थी। सिर्फ़ दूर एक कुत्ते के रोने की आवाज़ आई।
मैं पलटा और अपने कदमों के नीचे देखा।
वहाँ, मिट्टी पर, एक छोटी सी चीज़ पड़ी थी।
वो एक टिकट था। पुराना, पीला, फटा हुआ टिकट। जैसे कोई ट्रेन का टिकट हो या सिनेमा हॉल का। और उस टिकट पर स्याही से लिखा था — तारीख़। आज की नहीं, पच्चीस साल पहले की।
मैंने टिकट उठाया। उस पर एक पुरानी मुहर थी — बमुश्किल पढ़ी जा सकती थी — पर एक बात साफ़ थी। नीचे कोने में एक छोटा सा नाम छपा था। और वो नाम था — "अस्पताल।"
मैंने टिकट जेब में रखा और घंटी को बाहर निकाला।
"अब बोल," मैंने कहा। "कौन था वो?"
घंटी चुप रही।
"तू जानती है," मैंने कहा। "तूने मुझे जूतों की तरफ़ भेजा। तू जानती थी वो आएगा।"
फिर भी चुप।
"ठीक है," मैंने कहा। "तू नहीं बोलेगी, तो मैं खुद ढूँढ लूँगा।"
और मैं अंदर आ गया। दरवाज़ा बंद किया। पर उस रात मैं सो नहीं पाया। चारपाई पर लेटा रहा और छत की दरारें गिनता रहा। वो टिकट, वो सफ़ेद जूते, वो आवाज़ — सब मेरे सिर में घूमते रहे।
सुबह जब मैंने आँख खोली, तो बाहर पीली धूप फैल चुकी थी, और दरवाज़े पर मीरा खड़ी थी। उसका बाल बिखरा हुआ था। आँखों के नीचे कालापन था। कैमरा उसके हाथ में था, पर वो हिल रहा था — जैसे हाथ काँप रहा हो।
"अंकुश," उसने कहा। "मैंने रात भर सोचा।"
"अंदर आ," मैंने कहा।
वो अंदर आई। पीछे वाले कमरे की चारपाई पर बैठ गई। कैमरा सामने मेज़ पर रख दिया। फिर उसने अपना बैग खोला और वो काग़ज़ निकाला — जो कल रात आया था। जिस पर उसका नाम था, चंद्रेश का हस्ताक्षर और बबलू का नाम।
"तीन दिन की मोहलत है," उसने कहा। "तीन दिन में जवाब देना है, वरना मान लिया जाएगा कि मैंने और मेरे चैनल ने मानहानि की, झूठी खबर छापी, और मेरे खिलाफ़ कार्रवाई होगी।"
"तू अब इससे डर रही है?" मैंने पूछा।
"डर नहीं रही," उसने कहा। "गुस्सा आ रहा है।"
"तो?"
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