The Mysterious Bell – Chapter 198
वो काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। फिर उसने देखा कि मेरे पीछे मीरा खड़ी है। उसकी नज़र मीरा पर पड़ी, फिर उसने काग़ज़ मेरे हाथ में थमा दिया। मेरे हाथ से मीरा के हाथ में चला गया। मैंने उसके हाथ में देखा — काग़ज़ पर रेखाएँ थीं। नीली स्याही। एक तरफ़ नोटिस की शक्ल में कुछ छपा था।
मीरा ने काग़ज़ खोला। उसका चेहरा बदला।
“बबलू भाई, यह क्या है?” मैंने कहा।
“कोई काग़ज़,” उसने कहा। “कुछ ज़रूरी नहीं। बस — इसे अच्छे से देख लो। मैंने यह नहीं छुआ।”
वो पीछे हटा। फिर वो रुका।
“और बेटा,” उसने कहा। “सुबह दस बजे की बात तुझे याद है?”
“हाँ।”
“जवाब देने की ज़रूरत नहीं है,” उसने कहा। “साहब ने आज से दस बजे वाला जवाब हटा दिया है। नई बात हो गई है।”
“नई बात?”
“कुछ नहीं,” वो फिर पलटने लगा। “कुछ नहीं। बस — मैं यहाँ आया नहीं। मैं यहाँ आया नहीं, समझा?”
वो पीछे के अंधेरे में ग़ायब हो गया।
मैंने दरवाज़ा बंद किया और पलटा। मीरा ने काग़ज़ फैलाया। उसका चेहरा सफ़ेद था।
“क्या है?” मैंने पूछा।
“यह नोटिस है,” उसने कहा। “मेरे खिलाफ़।”
“कैसा नोटिस?”
उसने पढ़ा।
“बस्ती की आवाज़ नाम के चैनल पर प्रसारित कथित खबरों की सत्यता के संबंध में,” वो पढ़ने लगी, “हमें शिकायत मिली है कि चैनल संचालिका मीरा तिवारी द्वारा भारद्वाज कंस्ट्रक्शन, इसके स्वामी, और शहर के गणमान्य लोगों के विरुद्ध असत्य, भ्रामक, और मानहानि करने वाली सामग्री प्रसारित की जा रही है। तीन दिन के भीतर स्पष्टीकरण प्रस्तुत करना अनिवार्य है। असफल होने पर न्यायालय में उपयुक्त दवा की जाएगी।”
वो रुकी।
“अंकुश, इस पर तीन लोगों के हस्ताक्षर हैं। और नीचे यह देख — भारद्वाज कंस्ट्रक्शन।”
“काग़ज़ बताओ,” मैंने कहा। “जल्दी।”
“हस्ताक्षर हैं — चंद्रेश सक्सेना। और नीचे — बबलू पांडे।”
मैं थोड़ी देर खड़ा रहा।
“तीन दिन?”
“तीन दिन,” उसने कहा। “और यह काग़ज़… यह काग़ज़ कोई डाक से नहीं आया। बबलू लाया है। रात में। पीछे की तरफ़ से। छुपकर। अंकुश, यह कोर्ट का नोटिस नहीं है। यह धमकी है।”
मैंने हाथ आगे बढ़ाया। उसने काग़ज़ मेरे हाथ में दिया। मैंने उसे उलटा किया। पीछे कुछ छपा था — अपना नाम-पता, कंपनी की मोहर — नीली।
“मीरा।”
“हूँ?”
“इस पर मोहर ताज़ा है,” मैंने कहा। “स्याही उँगली पर लग रही है।”
वो मेरी तरफ़ देखने लगी।
“मतलब?”
“मतलब यह कि यह आज छपा है,” मैंने कहा। “आज शाम को। जब रणवीर तुझसे गली के मुँह पर मिला था — उसी वक़्त यह काग़ज़ बन रहा था। वो तेरे सामने मुस्कुरा रहा था और पीछे यह छप रहा था।”
मीरा ने साँस ली। गहरी। फिर वो चारपाई पर बैठ गई। उसके हाथ से कैमरा फिसल गया और चारपाई पर गिरा।
“अंकुश,” उसने कहा। “अब मुझे क्या करना चाहिए?”
“क्या करना चाहिए?” मैंने कहा। “मुझे तो यह भी नहीं पता कि मैं क्या करूँ।”
“तू ही तो हर बार कुछ बोलता है,” उसने कहा। “अब बोल।”
मैंने घंटी निकाली। वो ठंडी थी। पर जैसे ही मेरी उँगली ने उसे छुआ, वो थोड़ा गरम हुई। जैसे किसी ने अंदर से एक छोटी-सी आँच जला दी हो।
“मीरा,” मैंने कहा। “तीन दिन की बात है। तीन दिन में हम क्या जोड़ सकते हैं?”
“जोड़?”
“हाँ। क्योंकि यह काग़ज़ तेरा नहीं, हमारा है। वो तुझे सिर्फ़ इसलिए दिखा रहा है कि तू अकेली पड़ जाए। जब कोई अकेला होता है, तो उसके हाथ काँपते हैं। तूने खुद कहा — सालेम साहब यही कहते थे।”
मीरा कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने सिर हिलाया।
“तीन दिन में?” उसने कहा। “हम क्या जोड़ सकते हैं?”
“एक-एक बात जोड़ेंगे,” मैंने कहा। “पहले यह बताऊँ कोई सिर्फ़ तेरे पास था जो कोई और नहीं जानता — उसकी शिकायत किसने की, यह लिखा है?”
“कहीं नहीं,” उसने कहा। “शिकायतकर्ता का नाम बिल्कुल नहीं है।”
“तो फिर तीन दिन की धमकी किसकी है?”
“सिर्फ़ हस्ताक्षर,” उसने कहा। “चंद्रेश सक्सेना। और बबलू पांडे।”
“तो बबलू का हस्ताक्षर है?” मैंने कहा। “बबलू ने आज रात खुद यह काग़ज़ तुझे दिया है। अपने हाथ से।”
मीरा ने काग़ज़ पर फिर देखा।
“तो क्या वो…”
“वो डर गया है,” मैंने कहा। “वो अंदर से काँप रहा है। और जो आदमी काँपता है, वो एक दिन बोलता है। हमें बस उस दिन का इंतज़ार करना है।”
वो चुप रही।
मैंने घंटी हथेली पर रखी। वो और गरम हुई। मैंने उसे कान के पास लाया — पर वो कुछ बोली नहीं। बस गुनगुनी रही, जैसे कोई साँस भर रहा हो।
तभी मीरा का फोन बजा।
वो चौंकी। उसने जेब से फोन निकाला। स्क्रीन चमकी। उसने देखा और उसका चेहरा बदल गया।
“कौन है?” मैंने पूछा।
“सालेम साहब,” उसने धीरे से कहा। “मेरे पुराने एडिटर।”
“उठा।”
उसने फोन कान पर रखा।
“हैलो? सालेम साहब?”
मैंने देखा कि उसकी आँखें फैल गईं। उसने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने फोन थोड़ा दूर किया ताकि मैं भी सुन सकूँ। पुरानी आवाज़ थी — कर्कश, थोड़ी थकी हुई, जैसे बहुत देर से किसी ने बहुत कुछ पी रखा हो।
“मीरा, बेटी,” वो बोल रहे थे। “मैंने सुना है तू उलझ गई है।”
“कौन सा उलझना, साहब?”
“वो ही उलझना,” उन्होंने कहा। “जो मैंने तुझे बहुत पहले बता दिया था। बेटी, बात मान ले। तेरे पास सालेम का फोन आया है — यह अच्छी बात नहीं है। तू बोल दे उनसे कि तेरी उम्र ही नहीं है इस मामले की।”
“मैं काकी नहीं हूँ, सालेम साहब,” मीरा ने कहा। “मुझे कैसे मान लेना है?”
“बेटी, सुन।”
वो कुछ देर चुप रहे। मैंने सुना कि उन्होंने साँस ली, फिर एक शब्द यहाँ, एक वहाँ — जैसे कोई बेचैन हो।
“मुझे बुलाया गया है,” उन्होंने कहा। “आज शाम। मुझसे कहा गया कि तेरी खबर को रोकूँ। और मैंने साफ़ मना कर दिया। मैंने कहा — मीरा जो लिखेगी, वो उसका काम है। पर फिर मुझे बताया गया कि तेरे खिलाफ़ नोटिस जा रहा है।”
“तो?”
“तो अभी मेरे पास एक फोन आया है,” उन्होंने धीरे से कहा। “उस आदमी का। वो कह रहा है कि इस बार बचने का रास्ता सिर्फ़ साहब के पास है।”
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसके हाथ फिर काँप रहे थे।
“क्या कहा उसने?” उसने पूछा।
सालेम साहब की आवाज़ और नीची हो गई।
“उसने कहा कि अगर मैं तुझे नहीं रोक पाया,” उन्होंने कहा, “तो जो पाँच साल पहले रमा मैडम के साथ हुआ, वो अब छोटा करके बताया जाएगा। और अब यह मेरी ग़लती नहीं है, मीरा। मैं सिर्फ़ एक बात कह रहा हूँ — साहब फोन पर आए थे। मुझसे बात की। और मुझे तेरी फाइलें वापस करनी हैं।”
फोन कट गया।
मीरा के हाथ से फोन नीचे गिरा। उसने कैमरा उठाने की कोशिश की, पर उठा नहीं पाई। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
“अंकुश,” उसने कहा। “उसने सालेम साहब को फोन किया।”
“सुना मैंने,” मैंने कहा।
“और कहा कि बचने का रास्ता सिर्फ़ उनके पास है।”
“हाँ।”
“तो इसका मतलब — मैं अब भी घूम कर वहीं आ गई?”
मैंने घंटी मेज़ पर रख दी। वो ठंडी नहीं थी, गुनगुनी थी। मैंने उसकी तरफ़ देखा। शायद वो कुछ कहे। पर वो चुप रही। हो सकता है उसके पास भी कुछ नहीं था।
मैं मीरा के सामने बैठ गया।
“मीरा,” मैंने कहा। “रास्ता अभी भी सिर्फ़ उसके पास है, मुझे पता है। पर सुन। हम सब एक-एक काग़ज़ तोड़ेंगे। धीरे-धीरे। हम उसे हर बार एक ही सवाल देंगे — ‘सबूत कहाँ है?’ और वो हर बार हँसेगा। पर वो हँसेगा ज़्यादा देर नहीं। क्योंकि जो आदमी सबूत की बात करता है, वो सबूत छुपाने में भी लगा होता है। और सबूत छुपाने वाले लोग एक दिन सबूत के नीचे लेट जाते हैं।”
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno