The Mysterious Bell – Chapter 196
और मुझे लगा — यही तो सच है। सब टूटा नहीं है। कुछ चीज़ें चुपचाप जुड़ रही हैं।
टिंकू दौड़ता हुआ आया।
“उस्ताद! उस्ताद! सफ़ेद गाड़ी!”
मैंने रिंच रख दिया।
“कहाँ?”
“गली के मुँह पर,” उसने कहा। “पर वो रुकी नहीं। चल रही है — धीरे-धीरे। जैसे कोई गली को देख रहा हो।”
मैं उठा। दुकान का शटर पूरा नहीं खोला — आधा ही छोड़ा। मैंने मीरा को फोन किया।
“कहाँ है तू?”
“पहले ही पहुँच रही हूँ,” उसने कहा। “गली के मुँह पर हूँ। कैमरा तिपाई पर है।”
“अकेली?”
“दो लड़कों को साथ लिया है। मेरे चैनल पर काम करते हैं। हाथ में काग़ज़ हैं। बस इतना — कि अगर वो मुझे रोके, तो ये जवाब दें कि हम कुछ नहीं जानते।”
“और तू क्या कहेगी?”
“जो तय किया था,” उसने कहा। “सच की तरह।”
फोन कट गया।
मैं गली के मुँह की तरफ़ चला। पीछे से टिंकू आ रहा था। मैंने उसे रोका।
“तू पीछे रह,” मैंने कहा। “पीपल के पीछे। और अगर कुछ गड़बड़ लगे, तो घंटी बजाना।”
“अकेले?”
“अकेले नहीं,” मैंने कहा। “चारों जासूस इकट्ठे बैठना। और सानिया की कॉपी साथ रखना।”
वो दौड़कर गया।
मैं गली के मुँह पर पहुँचा तो सफ़ेद गाड़ी वहाँ खड़ी थी — थोड़ी दूर, नुक्कड़ के पास। और रणवीर भारद्वाज गाड़ी से उतर चुका था। वो गली के बोर्ड के पास खड़ा था — वही बोर्ड जिस पर साइकिल गली लिखा है, और जिसका एक कोना आज भी टेढ़ा है। उसके हाथ जुड़े हुए थे। वो उस बोर्ड को देख रहा था, जैसे कोई पुरानी तस्वीर देख रहा हो।
मीरा दस कदम दूर थी। उसका कैमरा तिपाई पर था, लाल बत्ती जल रही थी। दो लड़के दोनों तरफ़ खड़े थे, हाथ में काग़ज़।
मैं पीछे, एक दुकान के साए में रुक गया। मैंने सुना।
मीरा ने पहला सवाल किया।
“रणवीर जी,” उसने कहा, “बस्ती की आवाज़ से मीरा तिवारी। क्या मैं आपसे तीन सवाल पूछ सकती हूँ?”
रणवीर ने उसकी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वही मुस्कान आई — वही जो तस्वीरों में है। फिर उसने हाथ जोड़े।
“बेटा,” उसने कहा, “तुम मीरा हो? मैंने तुम्हारा चैनल देखा है। अच्छा काम करती हो। सच में। मुझे लगता है हमारे शहर को ऐसे ही लोगों की ज़रूरत है।”
“सवाल पूछ सकती हूँ?”
“तीन नहीं,” उसने कहा। “जितने पूछने हैं, पूछो। मेरा कोई छिपाने का मन नहीं है।”
मीरा ने कैमरे की तरफ़ देखा, फिर उसकी तरफ़।
“नूर अस्पताल की ज़मीन,” उसने कहा। “उसकी नीलामी की तारीख़ तय हो चुकी है। अस्पताल के काग़ज़ फँसे हुए हैं। आपके कंस्ट्रक्शन का नाम उस ज़मीन से जुड़ा है। सच क्या है?”
रणवीर ने हथेलियाँ जोड़कर थोड़ा ऊपर उठाया, जैसे कोई दुआ कर रहा हो।
“बेटा,” उसने कहा, “सच यह है कि मुझे उस अस्पताल से कोई मतलब नहीं है। मतलब है तो सिर्फ़ इस बात से कि वहाँ आने वाले लोगों को नई मशीनें मिलें, अच्छा इलाज मिले। वो इमारत पुरानी है। तुम खुद देख लो — टूटी खिड़कियाँ, पुरानी दीवारें। मैं तो चाहता हूँ कि वहाँ एक नई इमारत बने, जिसमें बड़ा गेट हो, बड़ी खिड़कियाँ हों, और डॉक्टर इसरानी जैसे लोगों को वो सम्मान मिले जो उनका हक़ है।”
“पर अस्पताल की ज़मीन बिक रही है,” मीरा ने कहा। “और आपका नाम उससे जुड़ा है।”
“बेटा, शहर में मेरा नाम कहाँ नहीं जुड़ा है?” उसने कहा। “मैं सड़क बनवाता हूँ, स्कूल बनवाता हूँ, मंदिर बनवाता हूँ। जहाँ काम होता है, वहाँ मेरा नाम जुड़ता है। यह बात बुरी है? या अच्छी है?”
“पापा के अंगूठे के बारे में क्या कहेंगे?”
रहा। रणवीर भारद्वाज एक पल के लिए चुप हुआ।
मैंने उसके चेहरे को देखा। मुस्कान वहीं थी। पर आँखों में कुछ हिला। बहुत थोड़ा। जैसे पानी में पत्थर नहीं, बस एक पत्ता गिरा हो।
“शंकर यादव?” उसने कहा। “पाँच साल पुरानी बात है, बेटा। काग़ज़ के काम में कभी-कभी कुछ ऐसा हो जाता है। कोई अंगूठा लगाता है, कोई हस्ताक्षर करता है। पर मैं तुमसे एक बात कहूँ — मैंने आज तक किसी से ज़बरदस्ती अंगूठा नहीं लगवाया। और जो शंकर भाई हैं, वो खुद बोल सकते हैं। उन्होंने आज सबके सामने कह दिया ना? कि उन्होंने अंगूठा लगाया? तो फिर सवाल कहाँ रहा?”
“अगर वो डर की वजह से लगाया गया हो तो?”
रणवीर ने सिर हिलाया, जैसे कोई बुज़ुर्ग बच्चे की बात सुन रहा हो।
“बेटा,” उसने कहा, “डर बहुत बड़ी चीज़ है। डर से लोग शादी कर लेते हैं, डर से लोग नौकरी छोड़ देते हैं, डर से लोग अपने बच्चों को भी कुछ कह देते हैं। अब अगर कोई पाँच साल बाद कहे कि उसने डर की वजह से अंगूठा लगाया, तो मैं क्या करूँ? उसके डर का इलाज मेरे पास नहीं है। मैं तो बस इतना कहूँगा — जो काग़ज़ है, वो सच है। और जो आदमी है, वो अब खुद सच बोल रहा है। बाकी तुम तय करो।”
मीरा ने अगला सवाल पूछा। उसकी आवाज़ थोड़ी ऊँची थी, पर काँप नहीं रही थी।
“और अस्पताल के बाहर लगा वो बोर्ड? जिस पर लिखा है कि ज़मीन भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की है और अस्पताल के काम का आख़िरी दिन?”
रणवीर ने सिर हिलाया।
“वो बोर्ड मैंने नहीं लगवाया,” उसने कहा। “मेरी कंपनी ने लगवाया। काग़ज़ी काम में कभी-कभी बोर्ड लग जाते हैं। हो सकता है वो गलती से लग गया हो। मैं आज ही हटवा दूँगा।”
“आप झूठ बोल रहे हैं?”
यह बात मीरा ने बहुत सीधे कही। सीधे, बिना झिझक। मैंने देखा कि उसके दोनों लड़के घबरा गए और एक कदम पीछे हटे।
पर रणवीर नहीं हिला।
उसने मीरा की तरफ़ देखा। और फिर वो हँसा। नीची, गुनगुनी हँसी। वो हँसी जो आदमी तब हँसता है जब कोई उसे नीचा दिखाने की कोशिश कर रहा हो और वो जानता हो कि वो नहीं होगा।
“बेटा,” उसने कहा, “तुम पत्रकार हो। तुम्हें ऐसा सवाल पूछने का हक़ है। और मुझे बुरा भी नहीं लगा। असल में मुझे अच्छा लगा। जानते हो क्यों? क्योंकि आजकल लोग सवाल नहीं पूछते। सब सिर्फ़ सुनते हैं, मान लेते हैं, और शेयर कर देते हैं। तुमने पूछा। यह अच्छी बात है।”
फिर वो थोड़ा आगे आया। एक कदम।
“पर बेटा, तुम्हें एक बात समझनी चाहिए,” उसने कहा। “सवाल पूछना एक चीज़ है। और सवाल को साबित करना दूसरी। तुमने यह पूछा कि मैं क्या झूठ बोल रहा हूँ। बहुत अच्छा। अब मैं तुमसे पूछता हूँ — तुम्हारे पास क्या है? एक काग़ज़ है, जिस पर मोहर है, पर तारीख़ नहीं। एक नोटिस है, जिस पर हस्ताक्षर है, पर गवाह नहीं। एक लिफ़ाफ़ा है, जिसमें कुछ है, पर भेजने वाले का नाम नहीं। अब तुम अदालत में क्या दिखाओगी? मोहर? मोहर तो मैं अपनी मोहर कहीं भी लगा सकता हूँ। हस्ताक्षर? हस्ताक्षर तो मेरे वकील के हैं, मेरे नहीं। और नाम? बेटा, बिना नाम का काग़ज़ काग़ज़ नहीं, कचरा है।”
मीरा चुप रही।
“तुम्हारी हिम्मत अच्छी है,” रणवीर ने कहा। “सच में। छोटा चैनल, बड़ी हिम्मत। पर एक बात है। बस्ती की आवाज़ — कितने लोग देखते हैं तुम्हारा चैनल? दो हज़ार? तीन हज़ार?”
“उससे क्या?”
“उससे यह कि मैं तुम्हारे चैनल को बड़ा कर सकता हूँ।” उसने जेब से एक कार्ड निकाला — सफ़ेद, चमकदार। “भारद्वाज कंस्ट्रक्शन अपने सारे विज्ञापन दे सकता है तुम्हारे चैनल को। अख़बार में भी जगह दिलवा सकता हूँ। तुम जैसी लड़की को छोटी गली में नहीं रुकना चाहिए। सोचो — तुम्हारी आवाज़ शहर के हर कोने तक पहुँचे। बस एक शर्त।”
“क्या शर्त?”
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