The Mysterious Bell – Chapter 194
रहमत बाबा चबूतरी पर बैठे थे, उन्होंने अपनी टोपी थोड़ी ऊपर की।
“नीलामी का नोटिस सरकार भेजती है,” रणवीर ने कहा। “कंपनी नहीं। कंपनी तो खरीदने वालों की कतार में खड़ी है, बेटा। जैसे तुम बाज़ार में खड़ी होती हो, कभी टमाटर लेने, कभी धनिया।”
“आप टमाटर की बात कर रहे हैं, साहब,” मीरा ने कहा। “और यहाँ बात एक दवाखाने की हो रही है जहाँ पचास साल से लोग इलाज करा रहे हैं। आप उस ज़मीन का क्या करेंगे?”
“अस्पताल,” रणवीर ने कहा। “नया अस्पताल। नई मशीनें। साफ़ कमरे। सोचो — इस पुरानी पीली दीवार की जगह सफ़ेद दीवार, और उस पर बड़ा सा लिखा हो, ‘नई शुरुआत, नए सपने’। क्या बुरा है इसमें?”
“और डॉक्टर इसरानी?”
“डॉक्टर साहब का इलाज है,” रणवीर ने कहा, और उसकी आवाज़ में अचानक मिठास बढ़ गई, “तो उनके लिए नई इमारत में अलग कमरा। बड़ी खिड़की। धूप। मैंने खुद कहा है।”
अंकुश के तौर पर मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसकी उँगलियाँ कैमरे पर कसी हुई थीं।
“साहब,” मीरा ने कहा, “अस्पताल की ज़मीन के काग़ज़ पर मुफ़्त इलाज के बदले अंगूठा माँगा जा रहा है। और जिस काग़ज़ पर शंकर यादव का अंगूठा है, वो कहीं और से आया है। आप इसे क्या कहेंगे?”
वहाँ हवा थोड़ी रुकी।
दुबे अंकल की कुर्सी चरचराई। टिंकू ने तार पकड़ते हुए मुझे देखा।
रणवीर ने अपना रूमाल निकाला, माथा पोंछा, फिर रूमाल मोड़कर जेब में रखा। जब उसने दोबारा देखा, उसकी आँखों में वही मुस्कान थी, पर उसके नीचे कुछ ठंडा था।
“शंकर भाई मेरे पुराने जानने वाले हैं,” उसने कहा। “जब उनकी औरत बीमार थी, मैंने उन्हें पैसे दिए। तुम पूछ सकती हो — कितने? बहुत। अस्पताल का बिल, दवा, सब। मैंने एक रुपया वापस नहीं माँगा। और जिस दिन काग़ज़ आया, मैंने उनसे कहा — शंकर भाई, ये तुम्हारी मर्ज़ी है।”
“और उनकी मर्ज़ी क्या थी?”
“उन्होंने अंगूठा लगाया,” रणवीर ने कहा, और उसने बहुत धीरे, बहुत साफ़ बोला, जैसे कोई तराज़ू पर रखकर तोल रहा हो, “अपनी मर्ज़ी से।”
पीपल के नीचे किसी ने साँस ली। बंसी बाबा ने अपनी लाठी थोड़ी आगे खिसका दी।
मेरे अंदर एक आवाज़ उठी — कि मैं बीच में बोलूँ। पर मैं चुप रहा। मीरा वहाँ अपने दम पर खड़ी थी, और मैंने उसके काम में हाथ नहीं डाला। यही फ़र्क़ होता है दोस्ती और हिमायत में।
“साहब,” मीरा ने कहा, “आपने उन्हें बताया था कि काग़ज़ में क्या लिखा है?”
“काग़ज़,” रणवीर ने कहा, और उसने हाथ फैला दिए, “काग़ज़ तो बहुत होते हैं, बेटा। तुम भी हर दिन कितने काग़ज़ देखती हो। किसी में सच, किसी में आधा सच, किसी में कोई नहीं।”
“मेरे काग़ज़ में क्या है, साहब?”
“तुम्हारे काग़ज़ में,” रणवीर ने कहा, और उसने कैमरे की तरफ़ देखा, “बहुत हिम्मत है।”
फिर वो मुस्कुराया, और उस मुस्कान में कुछ ऐसा था जो मुझे नहीं भाया।
“मीरा बेटा,” उसने कहा, “मैं तुम्हारा चैनल देखता हूँ। कभी-कभी। सच कहूँ, अच्छा काम कर रही हो। पर एक बात है। तुम्हारा चैनल छोटा है। तुम्हारा कैमरा पुराना है। तुम्हारे पास आदमी नहीं हैं। मुझे पता है तुम अकेली सब करती हो — कैमरा, आवाज़, एडिटिंग, सब।”
मीरा ने कुछ नहीं कहा।
“कंपनी को विज्ञापन चाहिए,” रणवीर ने कहा। “हर बड़ी कंपनी को चाहिए। मैं तुम्हारे चैनल पर विज्ञापन दूँगा। महीने का पचास हज़ार। बीस सेकंड का। सिर्फ़ बीस सेकंड का। और एक नया कैमरा भी — तुम्हारे इस पुराने कैमरे से तो तुम्हारी आवाज़ भी पुरानी लगती है।”
वहाँ सन्नाटा हो गया।
शबनम आपा की चिमटी उनके हाथ में रुक गई। टिंकू ने तार पकड़ते हुए मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में सवाल था — कि क्या ये सच में इतना पैसा दे रहा है?
“नहीं,” मीरा ने कहा।
एक शब्द। छोटा सा।
“सोच लो,” रणवीर ने कहा।
“मैंने सोच लिया,” मीरा ने कहा। “मेरी आवाज़ बिकती नहीं, साहब।”
“बेटा,” रणवीर ने कहा, और उसकी आवाज़ अब भी मीठी थी, “हर आवाज़ की एक कीमत होती है। बस किसी को पता होती है, किसी को नहीं। तुम्हें आज नहीं पता। कल पता चलेगी।”
फिर उसने कैमरे की तरफ़ देखा और कहा —
“छोटा चैनल, बड़ी हिम्मत। मुझे अच्छा लगता है। पर बेटा, सबूत कहाँ है?”
मीरा की उँगलियाँ कैमरे पर और कस गईं।
“सबूत के बिना,” रणवीर ने कहा, “सच भी झूठ जैसा लगता है। और ऐसा लगता है, यह तुम्हें मैं नहीं बता रहा। यह तुम्हें तुम्हारा अपना काम बता रहा है। है ना?”
मीरा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
“तुमने पहले भी एक खबर की थी,” रणवीर ने कहा, बिलकुल हल्के से, जैसे कोई पुरानी बात याद करा रहा हो, “किसी टीचर की। रमा, है ना? अधूरी खबर थी। बेचारी का घर बिखर गया था। याद है तुम्हें?”
मेरा हाथ अपने आप मुड़ा।
“मैं तुम्हें दोष नहीं दे रहा,” रणवीर ने कहा। “ग़लती सबसे होती है। मैं तो बस यह कह रहा हूँ कि इस बार सोच-समझकर लिखना। क्योंकि इस बार जिसकी बात कर रही हो, वो तुमसे बड़ा नहीं, बहुत बड़ा है।”
फिर वो हम सबको देखकर हँसा। खुलकर। जैसे कोई बड़ा भाई अपने छोटे भाई-बहनों की शरारत पर हँसता है।
“अंकुश भाई,” उसने मुझसे कहा, “आपकी गली में आज भी चाय अच्छी बनती है।”
और वो मुड़ा, गाड़ी की तरफ़ चला। ड्राइवर ने दरवाज़ा खोला। उसने एक पैर गाड़ी में रखा, फिर रुककर पीछे देखा।
“मीरा बेटा,” उसने कहा, “कैमरा अच्छा है। पर जब बैटरी खत्म हो जाए, तो बता देना। मैं तुम्हें नई दे दूँगा।”
गाड़ी चली गई।
लाल बत्ती अभी जल रही थी।
मीरा ने कैमरा बंद किया, और उसके हाथ काँप रहे थे।
दुकान पर लौटकर मीरा ने कैमरे को मेज़ पर रखा और उसका छोटा सा परदा खोला।
“बैठ,” मैंने कहा।
“नहीं,” उसने कहा।
“मीरा।”
“मैं ठीक हूँ,” उसने कहा। “मैं ठीक हूँ।”
वो ठीक नहीं थी।
टिंकू दरवाज़े पर खड़ा था, हाथ में वो तार का सिरा। मैंने उसे इशारे से बाहर जाने को कहा। उसने सिर हिलाया और चला गया, पर दरवाज़े से दस कदम दूर जाकर, नाली के पुल पर बैठ गया। बच्चे कभी बड़ों की बात नहीं सुनते। वो बस वहाँ होते हैं जहाँ बात होती है।
मीरा ने रिकॉर्डिंग चलाई।
परदे पर रणवीर भारद्वाज की मुस्कान आई।
“नीलामी का नोटिस सरकार भेजती है, बेटा।”
“मैंने तुम्हारे पापा को पैसे दिए थे। एक रुपया वापस नहीं माँगा।”
“उन्होंने अंगूठा लगाया। अपनी मर्ज़ी से।”
“मैं तुम्हारे चैनल पर विज्ञापन दूँगा। महीने का पचास हज़ार।”
“छोटा चैनल, बड़ी हिम्मत। पर सबूत कहाँ है?”
मीरा ने आगे बढ़ाया। पीछे किया। फिर से चलाया।
“छोटा चैनल, बड़ी हिम्मत। पर सबूत कहाँ है?”
फिर से।
“छोटा चैनल, बड़ी हिम्मत। पर सबूत कहाँ है?”
तीसरी बार सुनते हुए मीरा ने परदा बंद कर दिया। उसकी आँखें भरी हुई थीं, पर रो नहीं रही थी। और मुझे लगा कि रोना उस वक़्त ज़्यादा आसान होता।
“कुछ नहीं है,” उसने कहा।
“क्या?”
“कुछ भी नहीं है इसमें,” उसने कहा। “एक भी धमकी नहीं। एक भी गाली नहीं। एक भी ऐसा शब्द नहीं जिसे मैं अदालत में ले जा सकूँ। सिर्फ़ मुस्कान है। सिर्फ़ ‘बेटा’ है। सिर्फ़ पैसे का ऑफ़र है। लोग इसे सुनकर कहेंगे — अरे, आदमी तो अच्छा था। लड़की ही ज़िद्दी है।”
“मीरा,” मैंने कहा।
“मुझे पता है तू क्या कहेगा,” उसने कहा। “तू कहेगा कि यही तो उसका हथियार है। मुझे पता है। सुन, मुझे सब पता है। मुझे यह भी पता है कि उसने रमा मैडम की बात क्यों उठाई।”
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