The Mysterious Bell – Chapter 193
“पैसे नहीं लूँगा,” मैंने कहा, उसके मुँह खोलने से पहले। “ये दो मिनट का काम था।”
“मैं पैसे देने नहीं आया था,” उसने कहा।
“तो?”
“मैं यह देखने आया था,” उसने कहा, “कि आज जो आदमी गली में आया था, वो सच में यहाँ से चला गया, या फिर से आएगा?”
मैं चुप हो गया।
“तुम्हारी गली में आज शाम जो हुआ,” उसने कहा, “उसकी बात सुबह हमारी सीढ़ियों तक पहुँच गई थी। और जो बात सीढ़ियों तक पहुँचती है, वो साहब तक पहुँचती है। तुमने उसको ना कह दिया, ये ठीक किया। पर वो ना सुनकर लौटने वालों में से नहीं है।”
मैंने घंटी की तरफ़ देखा। मेज़ पर पड़ी थी। चुप।
“अंकल,” मैंने कहा। “आप साहब के दफ़्तर के सामने बैठते हैं। कभी कुछ सुना है, ऐसा जो किसी को नहीं पता?”
वो थोड़ी देर मेरे चेहरे को देखता रहा। फिर उसने टॉर्च बुझा दी, जैसे अब उसकी ज़रूरत नहीं।
“सुबह आठ बजे,” उसने कहा, “एक सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी आता है। पुराने बिजलीघर के दरवाज़े पर। दो बार खटखटाता है। फिर अंदर नहीं जाता। बाहर ही खड़ा रहता है। दो मिनट। और लौट जाता है।”
“रोज़?”
“रोज़,” उसने कहा। “पिछले बीस दिन से।”
मेरे अंदर कुछ ठंडा हुआ। बीस दिन। वही बीस दिन जो सनी के आधे काग़ज़ पर लिखे थे।
“तुम सोच रहे होगे,” बूढ़े ने कहा, “कि इसमें क्या बड़ी बात है। बड़ी बात ये है कि उस दरवाज़े के पीछे कुछ है। और जिसके पीछे कुछ होता है, उसके आगे आदमी खड़ा होकर दो बार खटखटाता है — जैसे अंदर वाले से कह रहा हो, मैं आ गया, तुम तैयार रहो।”
वो उठा। कमर सीधी करने के लिए दोनों हाथ पीठ पर रखे। फिर दरवाज़े तक आया, और रुककर बोला —
“एक बात और।”
“जी।”
“कल सुबह सात बजे जो मशीन चलनी है,” उसने कहा, “उसको चलाने वाला आदमी मुझे कल शाम नए बाज़ार में मिला था। उसने मुझसे कहा — ‘बाबा, कल सुबह पीछे वाले प्लॉट पर आ जाना। बड़ा काम है।’”
“क्या काम?”
“उसने कहा,” बूढ़े ने कहा, “कि जो मशीन गिराती है, उसके नीचे खड़े होने से अच्छा कमाई होती है। मैंने कहा, मैं जूते चमकाता हूँ, मलबा नहीं उठाता।”
वो हँसा। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।
“पर तुम्हारी गली के लोग कल वहाँ खड़े होंगे, ये मुझे पता है। इसलिए आज मैं यहाँ आया हूँ।”
“क्यों?”
“क्योंकि,” उसने कहा, “मैं पच्चीस साल से नए बाज़ार में जूते चमका रहा हूँ। और पच्चीस साल में मैंने एक बात सीखी है। जिस आदमी के पास बारह जोड़े जूते हों, वो किसी एक जोड़े के नीचे आने वाली ज़मीन को खाली नहीं छोड़ता।”
वो चला गया।
मैं दरवाज़े पर खड़ा रहा, उसे गली के मोड़ तक जाते देखता रहा। उसके जूते उस अंधेरे में भी चमक रहे थे — नहीं, चमक नहीं रहे थे, पहचाने जा रहे थे। सफ़ेद धागे के टाँके अंधेरे में भी दिखते थे।
मैंने दरवाज़ा बंद किया और घंटी उठाई।
“तूने सुना?” मैंने पूछा।
घंटी गुनगुनी थी। बहुत हल्की। जैसे कोई कहे — हाँ, सुना। पर अभी बोलने का वक़्त नहीं।
मैं चारपाई पर लेटा, और उस रात मुझे नींद नहीं आई। मेरे अंदर एक ही सवाल घूमता रहा — कि आज जोड़ की जो कीमत कटी, वो किसके हिस्से में कटी?
सुबह मुझे जवाब मिला। और जवाब मीरा थी।
सुबह साढ़े आठ बजे मीरा दुकान पर आई।
मैंने उसे देखते ही समझ लिया कि आज वो सवाल पूछने नहीं आई है। आज वो जवाब लेने आई है।
उसके बाल पहले से ज़्यादा बिखरे हुए थे। बैग कंधे से लटका हुआ था, और उसके हाथ में कैमरा ऐसे पकड़ा था जैसे कोई लाठी पकड़ता है।
“मैंने कल रात दफ़्तर फोन किया था,” उसने कहा।
“किस दफ़्तर?”
“भारद्वाज भवन,” उसने कहा। “मैंने कहा — मैं बस्ती की आवाज़ से बोल रही हूँ। मुझे साहब से बात करनी है। उन्होंने कहा, साहब व्यस्त हैं। मैंने कहा, मुझे सिर्फ़ ग्यारह बजे तक का वक़्त चाहिए। गली के मुँह पर। कैमरे के सामने।”
“और?”
“और उन्होंने कहा,” मीरा ने कहा, “साहब आएँगे।”
मैंने औज़ार वापस ट्रंक में रखा।
“मीरा,” मैंने कहा।
“मुझे पता है तू क्या कहेगा,” उसने कहा। “कि जो आदमी मुस्कुराकर आता है, उसके सामने कैमरा रखना खतरनाक है। मुझे पता है। पर सुन, मैं पाँच साल से खबरें बना रही हूँ। और पाँच साल में मैंने एक बात सीखी है — जो आदमी कैमरे से डरता नहीं, वो कैमरे के सामने ही कुछ ऐसा कह जाता है जो वो काग़ज़ों में नहीं लिखता। मुझे वही चाहिए।”
मैंने उसकी आँखों में देखा। उनमें डर था। और डर के पीछे एक चीज़ और थी, जो डर से बड़ी थी।
“ठीक है,” मैंने कहा।
वो रुक गई। “तू मना नहीं करेगा?”
“करूँगा,” मैंने कहा। “जब वक़्त आएगा। पर अभी नहीं। अभी मैं यह देखना चाहता हूँ कि तेरे कैमरे के सामने वो क्या कहता है।”
“क्यों?”
“क्योंकि,” मैंने कहा, “वो मुझसे नौकरी की बात करता है, फाइल दिखाता है, गाड़ी से उतरता है। पर मुझे यह नहीं पता कि वो अपने बारे में क्या सोचता है। और आदमी अपने बारे में सबसे ज़्यादा वहीं बोलता है, जहाँ वो सोचता है कि ये बात दूर तक जाएगी।”
टिंकू दौड़ता हुआ आया। उसके घुटने पर नई पट्टी थी, और हाथ में एक छोटी सी कॉपी।
“दीदी,” उसने कहा, “मैं कैमरा पकड़ूँगा?”
“तू तार पकड़ेगा,” मीरा ने कहा। “कैमरा मैं पकड़ूँगी।”
“तार पकड़ने में क्या बात है,” टिंकू ने कहा। “उस्ताद, आप बोलो ना।”
“तार पकड़ने वाला सबसे ज़रूरी आदमी होता है,” मैंने कहा। “अगर तार खिंच गई तो कैमरा बेकार।”
टिंकू ने वो बात ऐसे सिर हिलाकर मानी जैसे उसे ज़िंदगी का सबसे बड़ा राज़ मिल गया हो।
ठीक ग्यारह बजे, हम गली के मुँह पर खड़े थे।
नीम के पेड़ के नीचे मीरा ने तिपाई खोली और कैमरा उस पर कस दिया। लाल बत्ती जल उठी। दुबे अंकल अपनी कुर्सी घसीटकर थाने के बाहर ले आए थे, और उस कुर्सी के पैर के नीचे पुरानी ईंट का टुकड़ा रख दिया था ताकि वो हिले नहीं। शबनम आपा गुमटी के बाहर आकर खड़ी हो गईं, हाथ में चिमटी। बच्चे पीपल के नीचे जमा थे — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू — और सबके चेहरे पर वो भाव था जो बच्चों के चेहरे पर तब आता है जब वो जानते हैं कि आज कुछ बड़ा होने वाला है पर कोई उन्हें बता नहीं रहा।
ग्यारह बजकर सात मिनट पर सफ़ेद गाड़ी गली के मुँह पर आकर रुकी।
ड्राइवर उतरा, दरवाज़ा खोला। रणवीर भारद्वाज उतरा।
आज भी सफ़ेद कपड़े। आज भी वही चमकते जूते। पर आज उसके हाथ में कोई फाइल नहीं थी, कोई लिफ़ाफ़ा नहीं था। सिर्फ़ एक छोटा सा पीतल का डिब्बा था, जिसे उसने उतरते ही ड्राइवर को वापस दे दिया, जैसे अब उसकी ज़रूरत नहीं।
उसने हम सबको देखा। फिर मुस्कुराया। वो मुस्कान ऐसी थी जैसे किसी ने दीवार पर सफ़ेदी कर दी हो — सब कुछ ढक जाता है, दीवार भी, दरार भी।
“मीरा बेटा,” उसने कहा। “तुम्हारी आवाज़ फोन पर भी अच्छी लगती है। सामने तो और अच्छी लग रही है।”
“साहब,” मीरा ने कहा, “ये कैमरा चालू है। जो भी बोलेंगे, रिकॉर्ड होगा।”
“चालू ही रखो,” उसने कहा। “मैं छुपाने वालों में से नहीं हूँ। मुझे तो अच्छा लगता है कि लोग मेरी बात सुनें। बैठेंगे नहीं?”
“हम खड़े ठीक हैं,” मीरा ने कहा।
“ठीक है,” उसने कहा, और वो वहीं नीम के पेड़ के नीचे खड़ा हो गया। हाथ पीछे बाँध लिए, जैसे कोई मालिक अपनी दुकान का मुआयना कर रहा हो।
मीरा ने सीधा सवाल किया।
“साहब, नूर अस्पताल की ज़मीन की नीलामी का नोटिस आया है। उस पर आपकी कंपनी की मोहर है। सच है?”
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