The Mysterious Bell192 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 192

7 min read November 5, 2026

मैंने जेब से घंटी निकाली।

उसे हथेली पर रखा। उसका रंग पीतल का था, पर शाम की रोशनी में वो थोड़ा गहरा लग रहा था। घिसा हुआ। पुराना। मेरे दादा का। मेरे पापा का। और अब मेरा।

वो ठंडी नहीं थी। वो गुनगुनी थी। जैसे किसी ने उसे छूकर छोड़ दिया हो।

“कुछ कहना है?” मैंने धीरे से पूछा।

घंटी ने कुछ नहीं कहा।

“ठीक है,” मैंने कहा। “तब मैं चलता हूँ।”

मैंने उसे वापस जेब में रखा और दुकान की तरफ़ चल दिया।

और चलते-चलते मेरे अंदर एक बात दब गई।

उस्ताद ने कहा था कि हर जोड़ की कीमत कहीं और से कटती है। और आज दिन में हमने पानी का झगड़ा जोड़ा था, पापा ने सबके सामने सच बोला था, रमेश ने अपनी औरत की किडनी का राज़ खोला था।

इसका मतलब कोई कीमत कटी थी।

कहाँ कटी थी?

मैंने दुकान की तरफ़ देखा।

वहाँ कुछ नहीं बदला था। बोर्ड वैसे ही टेढ़ा था। शटर आधा खुला। पीछे का बल्ब गुनगुना रहा था।

पर मुझे लगा कि मेरे पीछे कोई एक आवाज़ आई।

बहुत धीमी। बहुत दूर।

जैसे किसी ने दांतों के बीच से कहा हो — अच्छा।

॥

“अच्छा।”

वो आवाज़ मेरे कान में रह गई। जैसे किसी ने बहुत दूर से, दाँतों के बीच से कहा हो और हवा उसे उठाकर मेरे पास छोड़ गई हो।

मैं गली के बीच में खड़ा था। धूप ढल चुकी थी, पीपल की छाया लंबी होकर नाली के पुल तक आ गई थी। पीछे कहीं शबनम आपा की गुमटी से चिमटी की आवाज़ आई, और उसके बाद चाय की केतली की वो धीमी सी सीटी, जो गली की साँस जैसी लगती है।

मैंने कान पर हाथ रखा।

फिर हाथ नीचे किया।

अगर घंटी कुछ कहना चाहती थी, तो वो कह चुकी थी। अब उसका काम नहीं था। अब मेरा काम था।

मैं दुकान की तरफ़ चला।

रास्ते में सोच रहा था — उस्ताद ने कहा था कि हर जोड़ की कीमत कहीं और से कटती है। आज हमने दो चीज़ें जोड़ी थीं। रमेश और नसीम का पानी। और उससे भी बड़ी चीज़ — पापा की चुप्पी।

पापा ने आज पहली बार, सबके सामने, अपनी ज़ुबान से कहा था कि उन्होंने डर के मारे अंगूठा लगाया था। पाँच साल का बोझ, एक वाक्य में, गली के सामने रख दिया था। तुम सोच रहे होगे कि ये तो अच्छी बात है। जोड़ हुआ, बोझ हल्का हुआ। तो सुनो — जोड़ की कीमत हमेशा उसी से नहीं ली जाती जो जोड़ता है। कभी-कभी कीमत किसी तीसरे के हिस्से में आती है।

और मुझे उस वक़्त नहीं पता था कि इस बार वो तीसरा कौन है।

दुकान पहुँचकर मैंने शटर पूरा उठाया।

पीछे के कमरे का बल्ब गुनगुना रहा था। औज़ारों का ट्रंक खुला पड़ा था, उस पर नई रिंच रखी थी जिसे टिंकू छूना चाहता था और मैंने छूने नहीं दिया था। मैंने टिंकू को शाम को घर भेज दिया था। उसकी माँ आज दूसरी बार गुमटी तक आई थी, और मैंने उससे कहा था कि बेटा मेरे पास है, सुबह से शाम तक, कुछ नहीं होगा।

“कुछ नहीं होगा,” मैंने अपने आप से दोहराया। और मुझे अपनी ही आवाज़ पर हँसी आई।

मैं चारपाई पर बैठ गया। जेब से घंटी निकाली, उसे सामने मेज़ पर रख दिया। पीतल का रंग, बल्ब की पीली रोशनी में, थका हुआ लग रहा था।

“उस्ताद ने कहा था,” मैंने धीरे से कहा, “कि आज रात इस दुकान पर कोई आएगा।”

घंटी चुप।

“और उसके जूते देखने हैं।”

घंटी चुप।

“तू भी,” मैंने कहा, “बड़ी देर से चुप है।”

और तभी मुझे लगा कि घंटी गुनगुनी है। बहुत हल्की। जैसे किसी ने अभी-अभी उसे हाथ में पकड़कर छोड़ दिया हो।

मैंने उसे वापस जेब में रखा और चारपाई पर लेट गया। आँखें खुली रखीं।

रात के नौ बजे गली की आवाज़ें एक-एक करके बंद होने लगीं। शटर गिरने की आवाज़ें। किसी बच्चे का रोना। टिंकू की माँ की आवाज़ — “अब सो जा, वरना कल स्कूल नहीं जाएगा।”

स्कूल।

मुझे याद आया कि मैंने टिंकू का नाम शाम की पाठशाला में लिखवाने की बात डॉक्टर इसरानी से कही थी और अभी तक फ़ॉर्म नहीं भरा था। कल भरना है। कल के बाद भी कल होता है, यह बात मैंने उस दिन सीखी थी जिस दिन घंटी ने पहली बार मुझसे बात की थी।

साढ़े नौ बजे मेरी दुकान के सामने कोई रुका।

मैं उठ बैठा।

कदम धीमे थे। जैसे कोई बूढ़ा आदमी हो या कोई ऐसा जो पूरे दिन खड़ा रहा हो।

दरवाज़े पर एक आदमी खड़ा था। दुबला, छोटा कद, कंधे झुके हुए, हाथ में एक पुरानी टॉर्च। उसके कपड़े धुले हुए थे पर पुराने थे, और पैरों में जो जूते थे, वो मैंने पहले कभी नहीं देखे जैसे।

जूते पुराने थे, पर टूटे नहीं थे। उनके तलवे कई जगह से सिले हुए थे। मोटे धागे से। सफ़ेद धागा, काले जूते पर, जैसे किसी ने अपने हाथ से, रात में बैठकर, एक-एक टाँका लगाया हो। जूते की चमड़ी घिसी हुई थी, पर साफ़ थी। उसने उन्हें अभी पोंछा था, यह उन पर पड़ी हुई धूल की उन लकीरों से पता चलता था जो पोंछने से बनती हैं।

“भाई,” उसने कहा। आवाज़ सूखी थी। “टॉर्च देख लोगे?”

“इस वक़्त?” मैंने कहा।

“दिन में तो मैं काम पर होता हूँ,” उसने कहा। “और तुम्हारी दुकान भी दिन में खुली रहती है। दोनों एक साथ नहीं मिलते।”

मैं हँस पड़ा। बात सही थी।

“अंदर आइए,” मैंने कहा।

वो अंदर आया। चारपाई पर नहीं बैठा। फ़र्श पर, दरवाज़े के पास, एक कोने में बैठ गया, जैसे उसे आदत हो किसी के घर में कोने में बैठने की।

मैंने टॉर्च ली। पुरानी पीतल की टॉर्च थी। भारी। ढक्कन खोला तो अंदर से महक आई — पुरानी बैटरी, पुरानी धूल, और कुछ और जो मुझे पहचानी लगी। जैसे उस टॉर्च के अंदर बहुत साल पहले की कोई शाम बंद हो।

“कहाँ से लाए?” मैंने पूछा।

“नए बाज़ार से,” उसने कहा। “मैं वहीं जूते पॉलिश करता हूँ। भारद्वाज भवन के सामने। सीढ़ियों के पास।”

मेरे हाथ रुक गए।

“अच्छा,” मैंने कहा, आवाज़ सामान्य रखने की कोशिश करते हुए। “तो साहब के जूते भी आप ही चमकाते हैं?”

वो हँसा। उसकी हँसी में कुछ कड़वा था।

“साहब के जूते मैं नहीं चमकाता,” उसने कहा। “साहब के जूते कोई और चमकाता है। अपना आदमी है। मैं बाहर वालों के चमकाता हूँ। जो दफ़्तर आते हैं, जो काग़ज़ लेकर आते हैं, जो हाथ जोड़कर आते हैं।”

“और साहब के जूते?”

“साहब के पास बारह जोड़े जूते हैं,” उसने कहा, जैसे कोई हिसाब बता रहा हो। “बारह महीने, बारह जोड़े। हर महीने एक नया। पर एक जोड़ा ऐसा है जो वो कभी नहीं पहनता।”

मैंने टॉर्च के अंदर झाँका। कुछ नहीं कहा। जब किसी को कुछ नहीं कहना हो, तो सबसे अच्छा तरीक़ा है कि हाथ में कुछ पकड़ लो और बहुत ध्यान से उसे देखने लगो।

“वो जोड़ा जिसके तले में लोहा लगा है,” उसने कहा। “भारी जूते। जैसे किसी पुराने ज़माने के हाकिम के। मैंने एक बार पूछा — ‘साहब, ये पहनते क्यों नहीं?’ तो वो हँसे। और बोले — ‘जो जूते पहने जाते हैं, वो घिसते हैं। जो नहीं पहने जाते, वो रखे रहते हैं।’”

मैंने सिर उठाया।

“किसके लिए रखे होते हैं?”

“यही तो,” बूढ़े ने कहा, और उसने अपने सिले हुए जूते की तरफ़ देखा। “अपने लिए तो नहीं रखे होते।”

फिर वो चुप हो गया।

मैंने टॉर्च की बैटरी निकाली, उसके सिरे साफ़ किए, स्प्रिंग को थोड़ा सीधा किया। काम दो मिनट का था। टॉर्च जल उठी। पीली रोशनी, गली के कमरे के अंधेरे में, दीवार पर एक बड़ा सा गोला बना गई।

“निकल गई,” बूढ़े ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो आश्चर्य था जो बच्चों की आवाज़ में होता है, बड़ों की नहीं।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho