The Mysterious Bell191 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 191

7 min read November 5, 2026

“पता है,” मैंने कहा। “इसीलिए मैं घंटी से पूछने वाला था।”

और मेरी जेब में घंटी थी। ठंडी। अब भी ठंडी।

मैंने मन में उससे कुछ पूछा — कुछ नहीं, बस एक सवाल। क्या वो सच में जा रहा है, या यहाँ से शुरू कर रहा है?

घंटी ने कुछ नहीं कहा।

और मुझे लगा — यही जवाब है।

तभी उस्ताद अली बक्श की दुकान से आवाज़ आई।

पहले टिक-टिक। उनकी सिलाई मशीन। फिर वो आवाज़ बंद हो गई। और फिर उस्ताद दुकान के दरवाज़े पर आकर खड़े हुए, और उन्होंने हाथ उठाया।

बस इतना। दो उँगलियाँ उठाईं और अंदर की तरफ़ इशारा किया।

पापा ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।

“अस्पताल जाता हूँ,” उन्होंने कहा। “माँ के पास। तू आ जाना।”

“जी,” मैंने कहा।

और वो मुड़े और चल दिए। आज उनकी पीठ देखकर मुझे कुछ अजीब लगा। पाँच साल में पहली बार लगा कि वो जा रहे हैं, भाग नहीं रहे हैं।

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।

“उस्ताद के पास जा रहा हूँ,” मैंने कहा।

“मैं साथ…”

“नहीं। तू मीरा के पास रह। और नल की ईंट — वो ईंट मत फेंकना। कहीं रख लेना।”

टिंकू ने सिर हिलाया। और मैं उस्ताद की तरफ़ चल दिया।

उनकी दुकान के अंदर हमेशा जैसा ही माहौल था। कपड़ों की खुशबू। धूल और साबुन। लोहे की मशीन। दीवार पर लटके रंग-बिरंगे धागे। दुकान के पीछे वाला ट्रंक आज भी वैसे ही खुला रखा था।

उस्ताद कुर्सी पर बैठे थे, पर मशीन चल नहीं रही थी। उनके सामने कपड़े का एक टुकड़ा था, और उस कपड़े में सुई फँसी हुई थी।

“बैठ,” उन्होंने कहा।

मैं बैठ गया। उनकी मेज़ के सामने वाला स्टूल। वही स्टूल जिस पर बैठकर मैंने पहली बार गिरवी के काग़ज़ का ज़िक्र किया था।

उस्ताद ने मशीन के पास से सुई निकाली।

“देख,” उन्होंने कहा।

मैंने देखा।

सुई बीच से चटकी हुई थी। ऊपर से नीचे तक एक पतली दरार, बाल की तरह। और उसका नुकीला सिरा मुड़ा हुआ। यह सुई पहले अच्छी थी, यह साफ़ पता चलता था।

“पाँच साल से ये मशीन चल रही है,” उस्ताद ने कहा। “और यह पहली सुई नहीं है जो टूटी। चौदहवीं है।”

मैंने कुछ नहीं कहा।

“तू सोच रहा होगा कि सुई टूटना क्या बात है। सुई टूटती है, बदल दो।” उन्होंने कपड़े को हथेली पर रखा। “पर सुई ऐसे नहीं टूटती, बेटा। सुई तब टूटती है जब कपड़ा कहीं और से खिंच रहा हो।”

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

“मैं यहाँ सीता हूँ, और यहाँ से कपड़ा खिंचता है। पर असली खिंचाव कहीं और होता है। मशीन कहती है, धागा कहता है, पर जो टूटता है, वो यह छोटी सुई होती है।”

उन्होंने सुई मेरी तरफ़ बढ़ा दी।

“अब तू बता,” उन्होंने कहा। “आज गली में जो जुड़ा, वो किसकी सुई पर जुड़ा?”

मैं उनकी बात समझ रहा था, पर पूरी नहीं।

“उस्ताद…”

“जहाँ एक जोड़ बनता है,” उन्होंने कहा, “वहाँ कहीं कुछ टूटने की आवाज़ भी आती है। तूने सुनी?”

“नहीं,” मैंने सच कहा।

“इसीलिए तू अभी ज़िंदा है,” उन्होंने कहा। “जो आदमी हर जोड़ के साथ तोड़ने की आवाज़ सुनने लगे, वो जल्दी बूढ़ा हो जाता है।”

उन्होंने सुई वापस मशीन के पास रखी।

“आज तूने रमेश और नसीम को जोड़ा। दो आदमी, दो गिलास पानी, और एक सच। अच्छा काम किया।”

“फिर?”

“फिर गली में कहीं कुछ टूटा,” उन्होंने कहा। “तेरे सामने नहीं टूटा। तेरे पीछे टूटा। पर टूटा।”

मैंने गली में होने वाली हर आवाज़ याद की। शबनम आपा की चिमटी। भोला भाई का शटर। रेडियो। बच्चे। कुछ और नहीं।

“क्या टूटा?” मैंने पूछा।

“मैं नहीं जानता,” उस्ताद ने कहा। “पर मुझे पता है कि टूटा है। क्योंकि मेरी मशीन आज शाम से अजीब आवाज़ कर रही है।”

उन्होंने अपनी मशीन पर हाथ रखा, जैसे किसी बीमार बच्चे के सिर पर रखते हैं।

“यह मशीन पचास साल से मेरे साथ है,” उन्होंने कहा। “जब यह गड़बड़ करती है, तो मुझे लगता है कहीं कुछ हुआ है। और आज वो कर रही है।”

फिर उन्होंने मुझसे पूछा, “घंटी ने कुछ कहा?”

“कहा,” मैंने कहा। “कहा — अब दो नहीं, अब तीन।”

उस्ताद की उँगली मशीन पर रुक गई।

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और उनके चश्मे के पीछे उनकी आँखें कुछ ऐसी हुईं जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थीं। डर नहीं था। वहाँ कुछ और था। जैसे कोई बूढ़ा आदमी अपने ही पुराने खेल का नतीजा सुन रहा हो।

“तीन,” उन्होंने धीरे से दोहराया।

“इसका क्या मतलब है?” मैंने पूछा।

“तीन का मतलब…” वो रुके। उन्होंने सुई उठाई, फिर रख दी। “तीन का मतलब यह नहीं कि तीन आदमी। तीन का मतलब यह भी नहीं कि तीन चीज़ें। तीन का मतलब…”

वो फिर रुके। और इस बार उन्होंने अपनी बात पूरी नहीं की।

“उस्ताद,” मैंने कहा।

“बाद में,” उन्होंने कहा। “अभी तू एक बात सुन।”

वो कुर्सी से उठे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा — और उनकी आँखें मेरी जेब पर आ गईं।

जहाँ घंटी थी।

“अंकुश,” उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में कड़क आई। “यह घंटी आज बाज़ार में मत ले जाना। किसी को दिखाना मत। किसी अंगूठे वाले के सामने मत निकालना।”

“क्यों?”

“क्योंकि जिस दिन यह घंटी बाज़ार में बजी,” उन्होंने कहा, “उस दिन रणवीर को पता चल जाएगा कि वह क्या ढूँढ रहा है।”

दुकान में चुप्पी आ गई।

मशीन से एक आवाज़ आई। जैसे किसी ने मशीन की एक दराज़ अंदर धकेली हो। उस्ताद ने कुछ नहीं किया।

“वो क्या ढूँढ रहा है?” मैंने पूछा।

“वही जो तेरे पास है,” उस्ताद ने कहा। “पर उसके पास है उसका टूटा हुआ साया। और जिस आदमी के पास टूटा हुआ साया हो, वो आदमी पूरी चीज़ ढूँढता है।”

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी उँगलियों में आई। ठंडी थी — पर अब इतनी नहीं। जैसे किसी ने उसे हल्का गरम कर दिया हो।

“उस्ताद,” मैंने कहा। “अगर वो ढूँढ ले तो?”

“तो क्या होगा,” उन्होंने कहा, “यह तू नहीं, गली तय करेगी।”

मैं उठा।

“जा,” उन्होंने कहा। “और सुन।”

दरवाज़े पर रुककर मैंने पीछे देखा।

“आज रात तेरी दुकान पर कोई आएगा,” उन्होंने कहा। “और वो कोई ग्राहक नहीं होगा।”

“कौन?”

“यह तो मुझे नहीं पता,” उन्होंने कहा। “पर जब आए, तो उसके जूते देखना।”

“जूते?”

“जूते,” उन्होंने कहा। “आदमी अपना चेहरा छुपा सकता है। नाम बदल सकता है। आवाज़ बदल सकता है। पर जूते नहीं बदलता। जो आदमी बार-बार नए जूते नहीं पहनता, वो कभी नहीं छुपता। और जो रोज़ चमकते जूते पहनता है, उसका रास्ता जूतों से पकड़ा जा सकता है।”

मैंने सिर हिलाया।

“और अंकुश,” उन्होंने कहा।

“जी।”

“आज गली ने जो बात सुनी — पापा की वो छोटी लाइन — उसे किसी को नहीं बताना। मीरा को भी नहीं। रैंडिया में नहीं। रिकॉर्डिंग में नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि कुछ बातें सुनकर अच्छी लगती हैं,” उन्होंने कहा। “और सुनकर अच्छी लगने वाली बातें बाज़ार में बिक जाती हैं।”

मैंने कुछ नहीं कहा। पर यह बात मुझे समझ आई। पापा की वो लाइन — “हमारी गली में सब ठीक है” — वो उपकार के लिए नहीं थी। वो उस आदमी के लिए बोली गई थी जो गली को बाज़ार समझकर आया था। और वो लाइन जितनी कम लोगों तक जाएगी, उतनी ही असरदार रहेगी।

मैं उस्ताद की दुकान से बाहर आया।

धूप ढल रही थी। गली में वो पीली-केसरिया रोशनी थी जो शाम को आती है, जब हर चीज़ थोड़ी पुरानी और थोड़ी अच्छी लगती है।

पीपल के नीचे बुज़ुर्ग बैठे थे। कुछ नए चेहरे भी थे और कुछ वही जो सुबह सभा में थे।

मैंने नल की ईंट की तरफ़ देखा। टिंकू ने उसे उठाकर पीपल की जड़ के पास रख दिया था। वो लाल ईंट वहाँ पड़ी थी, जैसे कोई गवाह जो कुछ बोल नहीं सकता, पर चला भी नहीं गया।

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