The Mysterious Bell – Chapter 190
“मैं गंभीर हूँ,” उसने कहा। “कल मैंने आपको नौकरी की बात कही थी, और आपने मना कर दिया। मुझे बुरा लगा था। आज मैं वो बात फिर कह रहा हूँ, पर अलग तरीक़े से। अंकुश भाई, आप गली के मिस्त्री नहीं हैं। आप आदमी के मिस्त्री हैं। और ऐसे आदमी मेरे दफ़्तार में बैठें, तो मेरे सौदे आसान हो जाएँ।”
“कैसे?” मैंने पूछा। मेरी आवाज़ सुनकर मुझे खुद हैरानी हुई। वो शांत थी।
“क्योंकि जहाँ लोग लड़ते हैं, वहाँ काग़ज़ सस्ता होता है,” उसने कहा, बिल्कुल सीधे। “और आप लोगों को लड़ने से रोक देते हैं। यह मेरे लिए… कीमती है।”
उसने फ़ाइल उठाई। बहुत धीरे से, जैसे कोई फूल उठाता हो।
“माँ की फाइल,” उसने कहा। “मैंने बनवाई है। अच्छे आदमी से। जो चार्ज लेता है, चार काग़ज़ बनाता है। यहाँ छह काग़ज़ हैं। जाँचें, दवाएँ, तारीख़ें, और आगे का हिसाब।”
उसने फ़ाइल खोली। पन्ने पलटे। मैंने देखा — माँ के हाथों की तस्वीर। सफ़ेद चादर। बंद आँखें। साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ।
मेरा पेट कड़ा हो गया।
“ये सिर्फ़ काग़ज़ नहीं है,” उसने कहा। “ये हिसाब है। जो आदमी इलाज का असली हिसाब जानता है, वो रास्ता भी जानता है।”
“और आप रास्ता दे रहे हैं,” मैंने कहा।
“मैं रास्ता दे रहा हूँ,” उसने कहा। “साथ में नौकरी। महीने का पैसा। फ्लैट। गाड़ी। और माँ के इलाज का पूरा हिसाब। आपको सिर्फ़ हाँ कहना है।”
उसने फ़ाइल बंद कर दी। क्लिक की आवाज़ आई। उस क्लिक में एक चीज़ थी जो मुझे चुभी।
मैंने पापा का हाथ थोड़ा कसकर पकड़ा।
“साहब,” मैंने कहा।
“हाँ।”
“आपने अभी कहा कि जहाँ लोग लड़ते हैं, वहाँ काग़ज़ सस्ता होता है।”
“कहा।”
“तो आप यह भी जानते होंगे कि जहाँ लोगों के दर्द का हिसाब रखा जाता है, वहाँ आदमी सस्ता हो जाता है।”
रणवीर की मुस्कान हिली नहीं। पर उसकी आँखें हिलीं। बहुत थोड़ा। जैसे तेल में एक बूँद पानी गिर जाए और तुरंत मिल जाए।
“मैं लोगों के दर्द का तराज़ू नहीं बनूँगा,” मैंने कहा। “मेरे पास जो है, वो थोड़ा है। एक दुकान। दो स्टूल। एक घंटी। और एक टिंकू, जो हर बात में सवाल पूछता है।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। सीधे।
“थोड़ा है, साहब। पर मेरा है। और मेरा सबसे बड़ा हिसाब यही है कि रात को मैं अपने बिस्तर पर लेटकर सो जाता हूँ। आप सो पाते हैं?”
एक सेकंड की चुप्पी आई।
उस चुप्पी में मुझे शबनम आपा की चिमटी की आवाज़ आई — क्लिक। वो थाली पर रखी गई। जैसे किसी ने फ़ैसला सुना दिया हो।
रणवीर ने फ़ाइल अपनी तरफ़ खींच ली। “अंकुश भाई, माँ का इलाज…”
“माँ का इलाज मैं चलाऊँगा,” मैंने कहा। “और अगर उसके लिए मुझे झूठ बोलना पड़े, तो वो भी नहीं करूँगा। आज सुबह माँ ने अस्पताल में खुद मुझे यही कहा है। मेरे कहने से नहीं, अपने मुँह से।”
अब रणवीर ने गाड़ी की सीट पर हाथ रखा। मैंने देखा — उसकी उँगली में वो काली अंगूठी थी। लोहे जैसी, मोटी, बिना किसी नक्काशी के।
और उसने पापा की तरफ़ देखा।
“शंकर जी,” उसने कहा। “आप कुछ कहेंगे?”
पापा ने मेरा हाथ छोड़ा।
मेरे अंदर कुछ सिकुड़ा। डर नहीं, कुछ और। जैसे बच्चा होने पर अब्बू का हाथ छूट जाए और आपको पता न हो कि अब वो क्या करेंगे।
पापा आगे बढ़े। एक कदम। दो कदम। वो गाड़ी की खिड़की के बिल्कुल सामने आकर खड़े हो गए।
और उन्होंने उसकी आँखों में देखा।
पाँच साल बाद। आज सुबह गली में भी उन्होंने उसकी आँखों में देखा था, पर वो भीड़ में था, वहाँ कुछ छुपाया जा सकता था। यहाँ भीड़ नहीं थी। यहाँ सिर्फ़ एक खिड़की थी, और उस खिड़की के अंदर एक आदमी बैठा था जो उन्हें पाँच साल से जानता था।
और पापा ने कहा। बहुत छोटा। बहुत धीमा। पर इतना साफ़ कि गली के मुँह तक गया।
“साहब, हमारी गली में सब ठीक है।”
रणवीर रुका।
“बेटा जो करेगा, ठीक करेगा,” पापा ने कहा। “और मैं उसके साथ हूँ।”
रुक गए। बोझ उतर गया। पूरा नहीं, थोड़ा — पर इतना कि वो सीधे खड़े रह सकें। पाँच साल से जो कमर झुकी हुई थी, वो आज थोड़ी सीधी थी।
मुझे लगा रणवीर कुछ कहेगा। कोई तीखी बात, कोई हँसी, कोई उपकार का लिहाज़।
उसने कुछ नहीं कहा।
उसका चेहरा नहीं बदला। मुस्कान वहीं रही। आँखें वहीं रहीं। हाथ वहीं रहा।
पर मैंने उसकी उँगली देखी।
काली अंगूठी वाली उँगली।
वो सीट पर टिकी थी, और अचानक उसके नाखून के नीचे से एक बूँद निकली।
काली।
एक बूँद। धीरे से गिरी, सफ़ेद सीट पर। फिर दूसरी। फिर तीसरी।
धीरे-धीरे। जैसे कोई नल बूँद-बूँद टपकता हो, पर यहाँ कोई नल नहीं था।
बूँदें सीट पर गिर रही थीं और मैं देख रहा था कि वो सूख नहीं रही थीं। वो फैल नहीं रही थीं। वो बस वहीं रह रही थीं, छोटे-छोटे काले धब्बे बनकर।
गाड़ी में से आने वाली ठंडी हवा अचानक मुझे और ठंडी लगी।
मैंने पीछे मुड़कर गली को देखा। शबनम आपा ने भी वो देखा होगा? मीरा ने अपना कैमरा नीचे कर दिया था, पर उसकी आँखें गाड़ी पर थीं।
रणवीर ने अपना हाथ उठाया। उसने उन बूँदों को देखा। उसकी मुस्कान नहीं बदली। उसने अपनी जेब से एक रूमाल निकाला — सफ़ेद, इस्तेमाल न किया हुआ — और उसने बूँदों को सीट पर ही पोंछ दिया।
पोंछकर उसने रूमाल जेब में डाल लिया।
“देखिए,” उसने कहा, बहुत हल्की आवाज़ में। “गाड़ी भी कुछ छोड़ जाती है।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
“अंकुश भाई,” उसने कहा। “एक बार और सोच लीजिए। जवाब मेरे पास नहीं, उस खाली मेज़ के नीचे है। जहाँ से आपने लिफ़ाफ़ा उठाया था। जब तक वो जवाब नहीं आया, मैंने मशीन नहीं चलवाई। यह मेरा वादा है। पर वादे की भी एक तारीख़ होती है।”
उसने खिड़की उठाई।
शीशा ऊपर आया, धीरे-धीरे, जैसे कोई पर्दा गिर रहा हो। फिर गाड़ी का इंजन भरा। फिर गाड़ी आगे बढ़ी और गली के मुँह से निकलकर सड़क पर मुड़ गई।
धूल उठी। गाड़ी के पीछे से धूल उठी और वो धीरे-धीरे गली पर बैठ गई।
बबलू वहीं खड़ा रह गया।
उसने मेरी तरफ़ देखा। आज उसके गले में सोने की चेन नहीं थी। पानदान नहीं था। वो सिर्फ़ काली शर्ट में खड़ा था, और उसके हाथ में कुछ नहीं था — सिर्फ़ मुड़ी हुई उँगलियाँ।
“अंकुश भाई,” उसने कहा।
“हाँ।”
“वो आज खाली हाथ गया।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
“ये अच्छी बात नहीं है,” बबलू ने कहा।
उसकी आवाज़ में डर था, और वो डर मुझे समझ आया। बबलू जानता था कि रणवीर खाली हाथ लौटता नहीं है। खाली हाथ लौटने का मतलब यह होता है कि उसने कुछ और तैयार कर लिया है।
बबलू ने सिर हिलाया, फिर धीरे-धीरे गली की तरफ़ चल दिया। आज उसकी चाल में वो घमंड नहीं था। थका हुआ आदमी था, जो लौटकर अपनी जगह जा रहा था।
मैं गली की तरफ़ मुड़ा।
और गली ने साँस ली।
एक साथ। जैसे किसी कमरे में बहुत देर से रुका हुआ पंखा चल पड़ा हो। दुबे अंकल अपनी कुर्सी पर बैठ गए, पर पहले उन्होंने अपनी कॉलर ढीली की। शबनम आपा ने चिमटी उठाकर थाली पर मारी — एक ज़ोर की आवाज़ — और फिर उस गुमटी से आवाज़ आई, “जो भी पीना है, पी लो। आज चाय का पैसा नहीं लूँगी।”
मीरा दौड़कर आई।
“क्या कहा?” उसने पूछा। “सब खत्म हो गया? कुछ कहा उसने?”
“कुछ नहीं,” मैंने कहा। “नौकरी दी। फ़ाइल दिखाई। मैंने मना किया। पापा ने एक लाइन बोली। और वो चला गया।”
मीरा मेरी तरफ़ देखती रही। “बस?”
“बस।”
उसने धीरे से कहा, “अंकुश, जो आदमी अपना गुस्सा रोक लेता है, वो डरने वाली बात है।”
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