The Mysterious Bell – Chapter 188
मैंने देखा कि नसीम भाई ने अपना गीला तौलिया घुटनों पर रख लिया और उनकी आँखें रमेश भाई पर टिक गईं।
“नसीम भाई,” मैंने कहा।
“मत पूछो,” वो बोले। “मत पूछो भाई, मुझे शर्म आ रही है।”
“मैं नहीं पूछूँगा,” मैंने कहा। “पर जो बात बाहर आ जाए, वो हल्की हो जाती है।”
वो एक पल चुप रहे। फिर उन्होंने तौलिया खोल दिया, जैसे कोई आदमी तौलिया खोलकर अपना हाथ खाली कर देता है।
“मैंने नल ठीक करवाया था,” उन्होंने कहा। “तीन महीने पहले। प्लंबर लाया, दो सौ अस्सी रुपये लगे। मैंने खुद नहीं कहा, शबनम आपा ने अपनी गुमटी की गली में सबको बता दिया।”
“बात सच है,” शबनम आपा ने कहा। “बताया था मैंने।”
“और बताने के बाद,” नसीम भाई ने कहा, “मुझे अच्छा लगा। बहुत अच्छा लगा। रमेश भाई और मैं पाँच साल से साथ उन्हीं चार फुट की गली में रहते हैं। पाँच साल में मुझे तारीफ़ की बात सिर्फ़ एक बार मिली — नल वाली। और वो भी बाहर से आई, खुद के लिए नहीं।”
उन्होंने रमेश भाई की तरफ़ देखा।
“तू पानी भरता था ये मुझे दिखता था। मैंने कभी पूछा नहीं। एक बार सुबह चार बजे देखा भी — तू छोटी बाल्टी लेकर खड़ा था, बारी नहीं आई थी, और तू चुप खड़ा था। मैंने सोचा, पूछने से कहीं ये झगड़ा खत्म हो जाए, और झगड़ा खत्म हो गया तो मेरी तारीफ़ का मतलब क्या रहेगा?”
“मैं तो सोचता था,” मैंने कहा, “कि लोग अपनी तारीफ़ के लिए लड़ते हैं। आप अपनी तारीफ़ के लिए झगड़ा बढ़ा रहे थे।”
“मूर्ख हूँ,” नसीम भाई ने कहा। “पचास साल का मूर्ख।”
और फिर दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा।
वो देखना क्या था — तुम समझोगे नहीं। दो आदमी, पाँच साल की साझी दीवार से अलग, दो स्टूल पर आमने-सामने, और दोनों की आँखों में ये एहसास कि सामने वाला भी उतना ही बेवकूफ़ है।
रमेश भाई के होंठ पहले काँपे, फिर मुड़े।
नसीम भाई ने सिर झुकाया और उनके कंधे हिलने लगे।
फिर दोनों एक साथ हँसे।
वो हँसी अजीब थी। उसमें खुशी से ज़्यादा राहत थी। जैसे किसी ने बरसों से बंद पड़ी खिड़की खोल दी हो और कमरे में हवा आ गई हो, वो हवा जो पहले दरवाज़े के नीचे से सिर्फ़ करीने में आती थी।
रमेश भाई ने हाथ बढ़ाया।
नसीम भाई ने पकड़ा।
दोनों की हथेलियाँ एक साथ गीली थीं — एक बाल्टी से, एक तौलिये से — और ये शायद उस दिन की सबसे साफ़ चीज़ थी।
पीछे खड़ी गली वहीं बैठी थी, पर जैसे सबने एक साथ साँस छोड़ी हो।
और मेरी जेब में घंटी ने गुनगुनाया।
धीमा। मीठा। जैसे साइकिल की घंटी कभी किसी आँगन में बजी हो और हवा उस आवाज़ को पीछे से धकेल रही हो।
“बोल,” मैंने फुसफुसाकर कहा।
पानी नहीं बह रहा था। बात बह रही थी।
बस इतना और चुप।
और मुझे एहसास हुआ कि जेब में एक हल्की गर्माहट फैल रही है, वैसी गर्माहट जो अंदर से आती है, जल्दी से नहीं, धीरे-धीरे, जैसे शरीर में खून लौटता है।
बीस।
बीस और जुड़े।
मैंने अंदर ही अंदर हिसाब किया — दो स्टूल, दो आदमी, और एक ऐसी चीज़ जो पाँच साल से सड़ रही थी। बीस अंक। तंत्र ने बहुत नहीं दिया। पर तंत्र की बात है — वो देता ही कम है, क्योंकि उसे भरोसा होता है कि असली मज़ा देने में नहीं, कमाने में है।
“अब सुनो,” मैंने उठकर कहा, और अपनी आवाज़ में वही हल्का मज़ाक लौटा लाया जो मेरी कमीज़ की तरह मैला पर अपना था। “ये नल। इसके पाइप के नीचे जो ईंट है, वो गली में कोई फेंक नहीं रहा। कोई बाहर से आकर रख रहा है।”
“क्यों?” किसी ने पूछा।
“क्योंकि जब दो आदमी पानी पर लड़ रहे होते हैं,” मैंने कहा, “तब उनके बीच के रास्ते पर ईंट रखने वाले को कोई नहीं देखता। जो ईंट रखवाता है, उसका काम ही यही है — गली को ख़ुद पर नज़र रखने से रोक दे। हममें से कोई बाहर न देखे, हम बस एक-दूसरे को देखें।”
भोला भाई ने पीछे से कहा, “और जब हम एक-दूसरे को देखते रहेंगे, तब वो पीछे से…”
“तब वो पीछे से अपना काम करेगा,” मैंने कहा।
और तभी मुझे लगा कि मेरे पीछे कुछ हल्का-सा हिला।
मैं मुड़ा।
मेरे पापा उठ रहे थे। उठने में उन्हें वक़्त लगा — पचपन साल की कमर है, और ज़मीन से उठना उस उम्र में दो बार सोचकर किया जाता है। पर उन्होंने किसी का हाथ नहीं पकड़ा। उन्होंने ख़ुद उठना चुना।
और गली चुप हो गई। फिर से।
पर इस बार वो चुप्पी उस चुप्पी जैसी नहीं थी। इस बार सब देख रहे थे कि आदमी क्या कहेगा।
उन्होंने कमीज़ ठीक की। एक हाथ से बाल पीछे किए, जो उनकी आदत नहीं है। और फिर वो बोले — धीरे, रुक-रुक कर, जैसे हर शब्द उनके अंदर से निकलने के लिए अपनी जगह खोज रहा हो।
“अंगूठा मैंने लगाया था।”
किसी ने साँस नहीं ली।
“पाँच साल पहले। चंद्रेश के दफ़्तर में।” उन्होंने हाथ उठाकर अपनी बाईं हथेली दिखाई, जहाँ वो सफ़ेद निशान है — उस निशान पर उँगली रखी। “डर के मारे। मेरी औरत अस्पताल में थी, दवा के पैसे नहीं थे, और वहाँ कहा गया कि अंगूठा लगाओ तो इलाज शुरू। मैंने लगा दिया। मैंने अपने बेटे को नहीं बताया। पाँच साल अपने ही घर में डरकर चाय पीता रहा।”
वो रुके। और मैंने देखा कि उनकी आँखें, जो बहुत दिनों से किसी चीज़ पर टिकती नहीं थीं, इस वक़्त सामने खड़ी पूरी गली पर टिकी थीं।
“पर सुनो,” उन्होंने कहा, और इस बार उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मैंने उनमें पहले कभी नहीं सुना। “मेरा बेटा किसी की गली नहीं बेचेगा।”
कुछ लोगों ने अपनी आँखें झुका लीं।
“और मैं भी नहीं बेचूँगा,” उन्होंने कहा। “मैंने अंगूठा लगाया, ये मेरी ग़लती है। ग़लती है तो सज़ा भी मेरी। पर गली किसी की जागीर नहीं है, और ये काग़ज़ किसी की शर्त पर नहीं बिकेगा। न अंकुश के डर से, न मेरे डर से।”
एक पल पूरी गली स्तब्ध खड़ी रही।
फिर शबनम आपा ने अपनी गुमटी के पीछे मुँह घुमाया और अपनी साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछीं, ये कहकर कि “धुआँ लग गया।”
टिंकू ने अपनी नाक खींची और कहा कि यहाँ पीपल का बीज गिरा था, इसलिए।
भोला भाई ने अपनी जेब से वही फटा रूमाल निकाला और उसे सनी को दे दिया, और सनी ने उसे नहीं लिया, दोनों ने वही एक रूमाल पकड़े रखा, जैसे उसी में दोनों की आँखें सूख जाएँगी।
रमेश भाई, जो अब भी स्टूल पर बैठे थे, उठे और पापा के सामने आए।
“चाचा,” उन्होंने कहा, “मैंने सुबह ग़लत बोला।”
“सुबह मैंने भी ग़लती की थी,” पापा ने कहा। “पाँच साल पहले।”
“नहीं चाचा, आपने तो…”
“बेटा,” पापा ने कहा, और ये उनके मुँह से अजीब लगा, क्योंकि वो किसी को बेटा कहते नहीं हैं। “जो आदमी डरता है, वो ग़लती करता है। मैं डरा हुआ आदमी हूँ। पाँच साल से। बस आज पहली बार मैंने ये कह दिया।”
और फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
बस एक पल।
पर उस एक पल में जो था, वो मैं तुम्हें नहीं बता सकता। बता दूँ तो छोटा हो जाएगा।
मैंने सिर हिलाया। मैं कुछ बोल नहीं पाया। कभी-कभी बेटा अपने बाप के सामने खड़ा होता है और शब्द उसके गले में ही रह जाते हैं, और वही ठीक है।
और उसी वक़्त गली के मुँह पर कुछ हुआ।
पहले मैंने सुना — चार पहियों की वो आवाज़ जो धूल के ऊपर से आती है, जैसे कोई मोटी किताब मेज़ पर रखी गई हो।
फिर गाड़ी दिखी।
सफ़ेद। चमकदार। धीरे से आई और गली के मुँह पर, वहीं जहाँ नल है, उसके सामने रुक गई। इंजन बंद नहीं हुआ। गाड़ी ज़िंदा रही, जैसे कुत्ता पट्टे पर खड़ा हो।
खिड़की धीरे से नीचे आई।
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