The Mysterious Bell – Chapter 187
मेरे अंदर कुछ ऐसा उठा जो बहुत दिनों से बैठा हुआ था। गुस्सा नहीं, गुस्से से भी बड़ा कुछ। जैसे कोई मेरे सीने के अंदर से मुट्ठी भरकर मेरी ज़ुबान पकड़ लेना चाहता हो और कहना चाहता हो — चिल्ला, अंकुश, चिल्ला। बोल, तेरे पापा ने अंगूठा लगाया था, हाँ लगाया था, पर तू जानता है क्यों लगाया था? तू जानता है कि उस वक़्त माँ के सिर पर क्या बीत रही थी?
और मैं चिल्ला नहीं रहा था।
मैं जानता हूँ ये कैसे होता है। गुस्सा जब आता है, तो वो दो रास्ते चुनता है। एक, तुम सामने वाले की हड्डी तोड़ देते हो। दो, तुम अपनी हड्डी अंदर तोड़ देते हो। मैंने दूसरा चुना। जीभ को दाँतों के नीचे दबाया, और उस दर्द पर ध्यान दिया।
दर्द ने मेरा दिमाग़ ठंडा कर दिया।
मैंने ईंट नीचे रखी। धीरे से। इतनी देर में मेरे हाथ पर उसकी मिट्टी की धूल जम गई थी। मैंने हथेलियाँ आपस में रगड़ीं और गली की तरफ़ देखा।
सब वहीं खड़े थे। शबनम आपा के हाथ में लोहे की चिमटी थी और उनका मुँह खुला था, जो उनके जैसी औरत के लिए बहुत बड़ी बात थी। टिंकू पीपल की जड़ से चिपका खड़ा था, आँखें बड़ी। रफ़ीक़ और सानिया मेरी दुकान के शटर के पास। मीरा का कैमरा अब भी चल रहा था, कैमरा नहीं, उसकी उँगलियाँ चल रही थीं।
दुबे अंकल अपनी कुर्सी पर बैठे थे और उन्होंने अपना सिर एक इंच भी नहीं हिलाया था।
और भीड़ के पीछे, उस्ताद अली बक्श खड़े थे। उनका मोटा चश्मा धूप में चमक रहा था और उनके होंठ एक पतली लकीर की तरह सीधे थे। उन्होंने मुझे देखा, और बहुत धीरे से सिर हिलाया।
बस, इतना ही।
कभी-कभी एक बूढ़े आदमी का एक इशारा सौ लोगों की तालियों से ज़्यादा काम कर जाता है।
मैंने अपनी कमीज़ के पल्ले से हाथ पोंछे और रमेश भाई की तरफ़ मुड़ा। मेरी आवाज़ शांत थी। शांत नहीं, शांत दिख रही थी। फ़र्क़ होता है, पर सुनने वाले को क्या फ़र्क़ पड़ता है।
“रमेश भाई,” मैंने कहा। “ये ईंट तुमने देखी?”
“कौन सी ईंट?” उन्होंने झल्लाकर कहा, पर आवाज़ पहले से हल्की थी।
“ये वाली।” मैंने उँगली से उसे दिखाया। “जो अभी मेरे हाथ में थी। नई है। लाल है। और पाइप के नीचे तिरछी रखी थी, ताकि पानी नाली की जगह गली में गिरे।”
रमेश भाई ने देखा। उनका गला हिला।
“मुझे क्या पता,” वो बोले। “मैं तो अपनी बीवी के लिए पानी भर रहा था। मुझे क्या पता कौन ईंट रखता है।”
“मुझे भी नहीं पता,” मैंने कहा। “पर एक बात पता है। ये ईंट बाहर से आई है। गली में किसी के पास नई लाल ईंट नहीं है, सिवाय उस आदमी के जो पीछे प्लॉट पर मिट्टी डाल रहा है।”
भीड़ में पहली बार हलचल हुई।
“तो झगड़ा ईंट का नहीं है,” मैंने कहा। “झगड़ा पानी का भी नहीं है। भाई, झगड़ा किसी और चीज़ का है, और वो चीज़ न तुम्हारे पास है, न नसीम भाई के पास।”
“तो किसके पास है?” रमेश भाई ने पूछा।
“उसके पास,” मैंने कहा, “जिसने ये ईंट रखवाई।”
फिर मैंने गली की तरफ़ हाथ उठाया।
“कोई नहीं जाएगा। कोई नहीं लड़ेगा। आज गली में झगड़ा नहीं बिकेगा।”
और मैं अंदर गया।
मेरी दुकान में कोने में दो स्टूल रखे थे। लोहे के नहीं, लकड़ी के, जिनके पाए घिस गए थे और जिन पर बैठने से पहले आदमी सोचता है कि कहीं ये बैठते ही न चटक जाए। उन दोनों को उठाकर बाहर लाया और दुकान के सामने, धूप में, आमने-सामने रख दिया।
पूरी गली ने देखा और मुझे लगा कि कुछ लोगों ने साँस रोक ली।
“रमेश भाई, यहाँ आइए,” मैंने कहा।
“मैं नहीं बैठूँगा,” वो बोले।
“आप बैठिए,” मैंने कहा। “बस बैठिए। मैं कुछ नहीं कहूँगा। न सीख दूँगा, न उपदेश। थोड़ी देर बस आमने-सामने बैठिए।”
“क्यों?”
“क्योंकि जब आदमी खड़ा होता है, तब उसे भीड़ दिखती है,” मैंने कहा। “बैठकर उसे सामने वाला दिखता है।”
वो झिझके। उन्होंने भीड़ की तरफ़ देखा। सब चुप थे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, मैं चुप था। फिर वो आए और बैठ गए। स्टूल ने चरचराकर कहा — बैठा, पर भारी है।
“नसीम भाई,” मैंने कहा।
नसीम भाई पहले से ही पास खड़े थे, हाथ में गीला तौलिया। वो बिना कुछ कहे आए और दूसरे स्टूल पर बैठ गए।
दोनों आमने-सामने।
बीच में कोई मेज़ नहीं, कोई काग़ज़ नहीं, कोई वकील नहीं। बस दो आदमी, दो घुटने, और उनके बीच में धूप की एक पतली पट्टी, जो पीपल की शाखाओं से छनकर आ रही थी।
मैं उनके बगल में बैठ गया। ज़मीन पर। पालथी मारकर।
और मैंने देखा कि मेरे पीछे खड़ी गली भी धीरे-धीरे बैठने लगी। पहले शबनम आपा अपनी गुमटी की बेंच पर बैठीं और चिमटी पास रख दी। फिर भोला भाई दुकान के चबूतरे पर। फिर टिंकू मेरे पीछे, ज़मीन पर। फिर वो बूढ़े काका जो सुबह चना खाते हैं। फिर दुबे अंकल, जिन्होंने अपनी कुर्सी घुमाकर मुझे देखा।
और मेरे पापा। वो नहीं हिले। वो वहीं बैठे रहे। पर उन्होंने अपना हाथ उस निशान से हटा लिया था।
“रमेश भाई,” मैंने कहा। “आप पानी भर रहे थे। रोज़ भरते हैं?”
“रोज़,” उन्होंने कहा। “सुबह।”
“रोज़ कितना?”
वो चुप हो गए।
“मैं बुरा नहीं पूछ रहा,” मैंने कहा। “मैं सिर्फ़ पूछ रहा हूँ।”
उन्होंने अपने घुटनों की तरफ़ देखा। उनके हाथों की उँगलियाँ आपस में उलझ गईं, जैसे कोई गाँठ खोलनी हो और हाथ कह रहे हों — नहीं, ये गाँठ नहीं खुलेगी।
“तीन बाल्टी,” उन्होंने कहा। “कभी चार।”
गली में कोई नहीं बोला। पर मैं जानता हूँ कि हर आदमी के दिमाग़ में एक ही सवाल घूम रहा था — दो जान के घर में तीन बाल्टी?
“हम्म,” मैंने कहा। “तीन बाल्टी। मेरे घर में माँ, पापा, काजल और मैं, चार जान, और ढाई बाल्टी।”
“मेरी बीवी को ज़्यादा पानी चाहिए,” उन्होंने कहा।
ये वाक्य उन्होंने बहुत धीरे कहा। इतना धीरे कि शायद आधी गली ने सुना, आधी ने नहीं। पर जिसने सुना, उसने कान आगे कर लिया।
“क्यों?” मैंने पूछा।
“डॉक्टर ने कहा है,” उन्होंने कहा। “किडनी में पत्थर है। दो बार दवा चली, तीसरी बार ऑपरेशन की बात हो रही है। कहते हैं पानी खूब पीए, और पानी खूब पीए तो पेशाब खुलकर आए। और पेशाब खुलकर आए तो दर्द कम हो।”
उनका गला भर आया, पर उन्होंने खाँसकर उसे दबा दिया। आदमी अपनी औरत की बीमारी बताते वक़्त ज़्यादा नहीं रोता, वो सिर्फ़ ज़्यादा खाँसता है।
“तो तीन बाल्टी,” मैंने कहा।
“तीन बाल्टी पीने के लिए नहीं हैं,” उन्होंने कहा। “दो तो नहाती है। एक पीती है। कभी उलटी हो जाती है तो चार भी।”
“और ये बात आपने किसी को नहीं बताई,” मैंने कहा।
वो चुप।
“रमेश भाई,” मैंने धीरे से कहा। “मैं जानना चाहता हूँ कि किसी को क्यों नहीं बताया। क्योंकि इस गली में अगर तुमने कहा होता कि तुम्हारी औरत बीमार है, तो शबनम आपा तुम्हें अपनी गुमटी से पानी भरने देतीं, बिना एक पैसा लिए।”
शबनम आपा ने अपनी चिमटी उठाई और फिर रख दी, जैसे कह रही हों — हाँ, देती।
“मैंने सोचा,” रमेश भाई ने कहा, और उनकी आवाज़ अब टूट रही थी, “कि सब कहेंगे — देखो, ये अपनी औरत के लिए पूरी गली का पानी पी जाता है। मैंने सोचा, कोई पूछेगा नहीं, कोई कहेगा नहीं, तो ठीक है। और… और जब भी कोई पूछता, मैं टाल देता।”
“और आज?”
“आज शर्म आई,” उन्होंने कहा। “और शर्म से मैंने झगड़ा बड़ा कर दिया। मुझे पता था गलती मेरी है। मैंने सोचा, पहले चिल्ला दूँ, फिर कोई पूछेगा तो सवाल नहीं उठाएगा।”
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