The Mysterious Bell – Chapter 186
यानी वो ईंट पानी रोकने के लिए नहीं रखी गई थी। वो पानी फैलाने के लिए रखी गई थी।
मैंने वो ईंट उठाई। पानी का रुख बदला और सीधे नाली की तरफ़ गिरने लगा।
मैंने जेब से घंटी निकाली। मैंने उसे हथेली में लिया, और मेरे होंठ सिर्फ़ इतना बोले —
“सच क्या है?”
घंटी ठंडी थी। फिर उसमें से एक फुसफुसाहट आई, छोटी, दो टुकड़ों में।
दोनों के पास आधा सच है।
फिर, थोड़ी देर बाद।
ईंट नई है।
मैंने ईंट को ऊपर उठाया। भीड़ के कुछ लोगों ने मेरी तरफ़ देखा।
“ये ईंट किसने रखी?” मैंने पूछा।
कोई नहीं बोला।
“मैं पूछ रहा हूँ,” मैंने कहा, और अपनी आवाज़ थोड़ी ऊँची की। “ये नई ईंट पाइप के नीचे किसने रखी? किसने पानी का रुख बदला?”
भीड़ में कुछ लोग एक-दूसरे को देखने लगे। और तभी एक बच्चे की आवाज़ आई — रफ़ीक़ था, छोटा, जो हमेशा भीड़ में खो जाता है।
“नीली शर्ट वाला,” उसने कहा। “वो आया था। मैं उसे जानता नहीं।”
“कब?”
“तुम्हारे हाथ धोने से पहले,” रफ़ीक़ ने कहा।
मेरे हाथ धोने से पहले। यानी मैं जब टब पर था, ठीक तभी।
रमेश भाई ने मेरी तरफ़ देखा। उनका चेहरा अब भी लाल था, पर उनकी आवाज़ थोड़ी धीमी हुई।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “इससे क्या होता है? ईंट रखी थी तो रखी थी। बच्चे पानी बर्बाद करते हैं, ये सच है।”
“नसीम भाई ने मरम्मत करवाई थी,” मैंने कहा, “ये भी सच है।”
“तो?”
“तो,” मैंने कहा, “दोनों सच हैं। और दोनों सच होने के बाद भी तुम दोनों आमने-सामने खड़े हो। ये मेरा सवाल है।”
नसीम भाई ने अपना सिर झुका लिया।
“मुझे लगा वो मुझे ही दोष दे रहे हैं,” उन्होंने धीरे से कहा। “हर बार मुझे ही दोष देते हैं।”
“क्योंकि हर बार तुम्हारा बच्चा नल खुला छोड़ जाता है,” रमेश भाई ने कहा, पर अब उसमें वो ज़हर नहीं था।
“तो बोलने की जगह बंद करने की चीज़ लगा दो,” शबनम आपा ने कहा।
वो गुमटी से बाहर आ चुकी थीं, हाथ में वही लोहे की चिमटी, और चिमटी अभी गरम थी। वो भीड़ के बीच में आईं और उन्होंने चिमटी पीतल की थाली पर पटक दी। टन्न की आवाज़ से भीड़ एक कदम पीछे हट गई।
“अब सुनो सब,” उन्होंने कहा। “ये नल मेरी गुमटी से तीन कदम है। मैं रोज़ सुबह देखती हूँ कि कौन पानी भरता है और कौन भरकर छोड़ जाता है। आज मैंने इस नल पर नीली शर्ट वाला आदमी देखा।”
भीड़ में सन्नाटा छा गया।
“क्यों नहीं बोलीं?” रमेश भाई ने पूछा।
“क्योंकि मैं तुम दोनों को लड़ते देख रही थी,” शबनम आपा ने कहा, “और मुझे लगा कि पहले तुम दोनों थको, फिर मैं बोलूँ। पर तुम दोनों थकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।”
मीरा ने अपना कैमरा निकाल लिया था। उसने तिपाई नहीं लगाई, बस कैमरा हाथ में उठाया और लाल बत्ती जल गई।
और फिर वो हुआ जो मुझे डर था।
भीड़ का रुख मेरी तरफ़ नहीं, मीरा की तरफ़ मुड़ गया।
“कैमरा बंद करो!”
“इसे यहाँ क्यों बुलाया?”
“ये सब बाहर ले जाएगी, फिर हमारा नाम आएगा!”
“मेरा चेहरा मत लो!”
मीरा ने कैमरा नीचे नहीं किया। उसने सिर्फ़ इतना कहा —
“मैं तुम्हारा चेहरा नहीं ले रही। मैं उस ईंट को ले रही हूँ।”
और यही बात उस औरत में थी जो मुझे सबसे ज़्यादा पसंद थी। वो कभी भीड़ से नहीं डरती थी, बस भीड़ को गुस्सा दिलाने का तरीक़ा जानती थी, और आज उसने वो तरीक़ा जानबूझकर नहीं अपनाया।
दुबे अंकल अपनी कुर्सी से उठे। वो धीरे उठे, क्योंकि उनकी कमर में दर्द था, पर उठे। और वो सीधे गली के मुँह की तरफ़ देखने लगे।
मैंने भी उसी तरफ़ देखा।
गली के मुँह पर कुछ नहीं था। बस धूप थी, और धूल, और दूर सड़क पर से गुज़रती एक रिक्शा।
पर दुबे अंकल का चेहरा कह रहा था कि वहाँ कुछ है। या कुछ आने वाला है।
“दुबे अंकल?” मैंने धीरे से कहा।
“कुछ नहीं,” उन्होंने कहा। “बस देख रहा हूँ।”
वो बैठ गए, पर उन्होंने अपनी कुर्सी गली के मुँह की तरफ़ घुमा ली। यह छोटी हरकत थी, पर मैं जानता था कि दुबे अंकल बिना वजह कुछ नहीं करते।
मैंने ईंट नीचे रख दी और अपने हाथ पोंछे।
“सुनो,” मैंने कहा, और इस बार मेरी आवाज़ में वो चीज़ थी जो सभा में नहीं थी — थकान। “आज शाम चार बजे मैं उस आदमी से मिलने जा रहा हूँ। तुम सब यहाँ हो। अगर मैं शाम छह बजे तक न लौटूँ, तो ये गली अपने आप कुछ नहीं करेगी। तुम सब मिलकर कुछ करोगे।”
“क्या करेंगे?” किसी ने पूछा।
“मुझे नहीं पता,” मैंने सच कहा। “पर जब तुम सब मिलकर सोचोगे, तो पता चल जाएगा।”
मैं मुड़ा, ताकि दुकान की तरफ़ जाऊँ और अपनी कमीज़ बदल लूँ। चार बजे के लिए मेरे पास एक ही साफ़ कमीज़ थी, और वो भी उतनी ही साफ़ थी जितनी एक मिस्त्री की कमीज़ हो सकती है।
और तभी रमेश भाई ने वो कहा।
मुझे नहीं पता कि उन्होंने क्यों कहा। शायद इसलिए कि उनका गुस्सा अभी खत्म नहीं हुआ था और उसे किसी पर निकालना था। शायद इसलिए कि भीड़ में किसी ने उनके कान में कुछ कहा था। शायद सिर्फ़ इसलिए कि जब आदमी डरता है, तो वो सबसे कमज़ोर आदमी पर उँगली उठाता है।
उन्होंने उँगली उठाई। और वो उँगली मेरी तरफ़ नहीं थी।
वो पीछे की तरफ़ थी, जहाँ ज़मीन पर, चबूतरी से थोड़ी दूर, मेरे पापा बैठे थे।
“पूछो इनसे!” रमेश भाई ने कहा, और उनकी आवाज़ भीड़ के ऊपर चली गई। “पूछो इनसे कि इन्होंने किसके काग़ज़ पर अंगूठा लगाया था! जो आदमी अंगूठा लगाता है, वही गली बेचता है! बाकी सब तो बहाने हैं!”
और गली चुप हो गई।
पूरी गली। एक साथ। जैसे किसी ने आवाज़ का बटन दबा दिया हो।
मैंने पीछे देखा।
पापा जम गए थे। वो वैसे ही बैठे थे, हाथ घुटनों पर, पर उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। ऐसा सफ़ेद जैसा मैंने उनका चेहरा कभी नहीं देखा था। उनके होंठ हिले, पर कोई आवाज़ नहीं निकली। उनकी उँगलियाँ घुटनों पर कस गईं, और मैंने देखा कि उनका एक हाथ धीरे-धीरे उस जगह पर गया जहाँ उनकी कमीज़ के नीचे, बाएँ हाथ पर, वो सफ़ेद निशान है।
उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं देखा। उन्होंने किसी की तरफ़ नहीं देखा। वो बस वहीं बैठे रहे, और लगा जैसे पूरी गली उनके ऊपर झुक आई है।
धूप अब भी वैसी ही थी। पीपल के पत्ते अब भी हिल रहे थे। पानी अब भी नाली में गिर रहा था।
पर मेरे कान में सिर्फ़ एक आवाज़ थी — घंटी की, बहुत धीमी, जैसे दूर से आ रही हो।
अब समझा? यही धागा था।
मैंने अपनी मुट्ठी कस ली। मेरी जेब में घंटी ठंडी थी, और मेरे हाथ में वो लाल ईंट अब भी भारी लग रही थी, जैसे उसका वज़न ईंट का नहीं, किसी और चीज़ का हो।
मैंने पापा की तरफ़ देखा और धीरे से कहा, इतना धीरे कि सिर्फ़ वो सुन सकें —
“पापा।”
उन्होंने सिर नहीं उठाया।
और मैं वहीं खड़ा रह गया, चार बजे से एक घंटा पहले, गली के बीच, एक ईंट हाथ में, और यह जानकर कि आज शाम उस सफ़ेद इमारत में मुझे जिस चीज़ का जवाब देना है, वो काग़ज़ नहीं है।
वो ये चुप्पी है।
॥
गली में जो सन्नाटा था, वो आवाज़ से ज़्यादा भारी था।
रमेश भाई की उँगली अब भी हवा में थी। वो उँगली काँप रही थी, पर वो नीचे नहीं आ रही थी। आदमी जब गुस्से में होता है तो उसकी उँगली उसके दिमाग़ से पहले थकती है। और यहाँ तो दिमाग़ भी थका हुआ लग रहा था।
मेरे पापा वहीं बैठे थे, ज़मीन पर, चबूतरी से थोड़ी दूर। उनका चेहरा सफ़ेद। उनका हाथ बाएँ हाथ की उस जगह पर, जहाँ कमीज़ के नीचे वो सफ़ेद निशान है।
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