The Mysterious Bell – Chapter 185
“किसी पर ज़ोर नहीं,” मैंने कहा। “जो नहीं बोल सकता, वो न बोले। पर उसके लिए जगह खाली रहेगी।”
फिर मैंने सनी की तरफ़ देखा। सनी उठा। उसकी आवाज़ भारी थी, जैसे गले से निकलने से पहले रास्ता भूल रही हो।
“दफ़्तर में एक बक्सा है,” उसने कहा। “नीले कपड़े से ढका। धूल जमी है। कोई नहीं छूता। बबलू भाई भी उसे देखकर काँपते हैं।”
“क्या है उसमें?” किसी ने पूछा।
“पता नहीं,” सनी ने कहा। “पर एक काग़ज़ पर लिखा था — दफ़्तर, बक्सा, चाबी, बीस दिन, नाम। मैंने वो चीज़ छिपा ली थी। पापा को भी नहीं दिखाई।”
उसने अपनी जेब से काग़ज़ का आधा टुकड़ा निकाला। उस पर नीली मोहर थी और नीली स्याही में वही शब्द।
“अब आप ही बताइए,” उसने कहा, “मैं चोर हूँ या गवाह?”
“तू गवाह है,” मीरा ने कहा। “और गवाह चोर नहीं होता।”
सनी ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें भर आई थीं। वो बैठ गया।
फिर उस्ताद ने अपनी आवाज़ उठाई। चार शब्द बोले, बस।
“अब घंटी दिखाने का वक़्त नहीं,” उन्होंने कहा। “अब काम का वक़्त है।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा और सिर हिलाया।
“आख़िरी बात,” मैंने कहा। “आज शाम चार बजे वो मुझे अपने दफ़्तर बुला रहा है। अकेले।”
भीड़ में हलचल हुई।
“मैं जाऊँगा,” मैंने कहा।
“अकेले?” किसी ने कहा।
“मैंने उसे कहला दिया है कि मैं अकेला नहीं आऊँगा,” मैंने कहा।
“हम सब चलेंगे?” शबनम आपा ने पूछा, और उनकी आवाज़ में इतनी रुचि थी कि मुझे हँसी आ गई।
“नहीं,” मैंने कहा। “सब नहीं। दो लोग। मैं और मीरा। बाकी तुम यहाँ रहोगे।”
“क्यों?” दुबे अंकल ने पूछा।
“क्योंकि,” मैंने कहा, “अगर मैं उसके दफ़्तर में हूँ और ये गली खाली है, तो वो अपनी शर्तें मनवा लेगा। और अगर मैं वहाँ हूँ और ये गली भरी है, तो वो मुझसे नहीं, इस गली से बात करेगा।”
कुछ देर सन्नाटा रहा। फिर बंसी बाबा ने कहा — और उनकी आवाज़ भारी थी, जैसे चालीस साल से बंद थी और आज खुल रही हो।
“बेटा,” उन्होंने कहा, “जिस दिन तू ये गली छोड़कर अकेला चला, उस दिन तू लौटकर आया। हमें लौटकर सिर्फ़ बैठना आता है।”
मैं एक पल के लिए उन्हें देखता रह गया।
“तो बैठिए,” मैंने कहा। “बैठिए और चबूतरी पर बने रहिए। जब तक मैं वहाँ हूँ, ये चबूतरी मेरी सबसे बड़ी खबर है।”
सभा इसी तरह खत्म हुई। किसी नारे के साथ नहीं। किसी ताली के साथ नहीं। लोग उठे, चारपाइयाँ समेटने लगे, शबनम आपा ने गिलास इकट्ठे किए, और रफ़ीक़ की अम्मी की चारपाई फिर उनके आँगन में लौट गई।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी अब भी ठंडी थी।
“कुछ बोल,” मैंने धीरे से कहा।
और वो बोली। इतनी धीमी कि जैसे मेरे ही सीने से आ रही हो।
तेरे पास आज एक धागा है। वो आज खींचा जाएगा। जिस सिरे से तू पकड़ेगा, वो सिरा तेरा नहीं है।
“क्या मतलब?” मैंने पूछा।
पर वो चुप हो गई। और मैं जानता था कि पूछना बेकार है।
दोपहर तीन बजे के करीब।
गली में धूप तिरछी हो चली थी। दुकान के पीछे वाले कमरे में मैंने अपने हाथ धोए। पंचर वाला टब वहीं था, उसमें पानी ठंडा नहीं था, गरम भी नहीं था, बस था। मैंने कलाई तक हाथ डाले और पानी देखता रहा। उस पानी में मेरा चेहरा दिख रहा था, और उस पर वही ग्रीस के निशान थे जो सुबह से मिटाने की कोशिश में लगे थे।
चार बजे मुझे उसके दफ़्तर में होना था। तीन सवाल मेरे साथ थे — बक्सा, चाबी, और वो काली अंगूठी।
तभी बाहर से आवाज़ आई।
पहले किसी ने कुछ फेंका। फिर कोई चिल्लाया। फिर एक आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी ने गला फाड़ दिया हो।
मैंने हाथ पोंछा और बाहर दौड़ा।
गली के मोड़ पर, पत्थर के टैंक के पास, वही मोहाने वाला पुराना नल है। वो नल जब बहता है, तो पूरी गली को पता चलता है। और आज उससे पानी ऐसे बह रहा था जैसे कोई जानबूझकर बहा रहा हो।
रमेश भाई खड़े थे, उनका मुँह लाल था और हाथ में एक उलटी बाल्टी।
“कितनी बार कहूँ?” वो चिल्ला रहे थे। “तुम्हारे बच्चे सुबह से नल खोलकर भाग जाते हैं! तीन बाल्टी भरके भी नहीं बंद करते!”
“मेरे बच्चे?” नसीम भाई सामने खड़े थे, उनकी शर्ट पर भी छींटे थे। “रमेश भाई, ये नल मैंने अपनी जेब से ठीक करवाया था। दो सौ रुपये का वॉशर, दो सौ मिस्त्री का। तुमने एक पैसा नहीं दिया!”
“और मैंने ये पक्का घेरा नहीं बनवाया तो ये नल आज तक कीचड़ में होता!” रमेश भाई ने बाल्टी नीचे पटक दी। “तुम्हें पानी की कद्र नहीं है। तुम्हारे घर में नल खुला रह जाता है और मेरे आँगन में कीचड़ भर जाता है।”
“मेरे आँगन में भी भरता है!”
“तो अपने बच्चों को सिखाओ!”
“तू मेरे बच्चों को सिखाने वाला कौन होता है?”
और फिर वो होने लगा जो गली में हर बार होता है। दो लोगों का झगड़ा धीरे-धीरे चार लोगों का हो जाता है, फिर आठ का, और फिर किसी को याद भी नहीं रहता कि पहली बात क्या थी।
एक औरत बोली, “रमेश भाई सही कह रहे हैं, कल मेरा भी आँगन भर गया था।”
दूसरे ने कहा, “नसीम भाई ने ही तो मिस्त्री को बुलाया था, हम सबने देखा।”
“देखा तो हमने यह भी है कि इस नल पर कब्ज़ा किसका है।”
“किसका कब्ज़ा? ये सरकारी नल है!”
“सरकारी चीज़ पर सबका हक़ है, पर मरम्मत का पैसा एक का!”
मैं बीच में पहुँचा। भीड़ दो हिस्सों में बँट चुकी थी, जैसे किसी ने गली के बीच चाक से लकीर खींच दी हो। मैंने हाथ उठाया।
“रुको,” मैंने कहा। “रुको, भाई, एक मिनट रुको।”
एक आवाज़ आई। पीछे से, भीड़ में से, किसी ने कहा — और उस आवाज़ में वो ज़हर था जो आज सुबह चबूतरी पर नहीं था।
“सारी गड़बड़ इसी की वजह से है।”
मैंने पीछे देखा।
“किसकी?”
“तेरी,” आवाज़ आई। “तूने साहब को गली में बुलाया। तूने उनकी गाड़ी यहाँ खड़ी करवाई। तेरे कारण आज हर आदमी के घर में सवाल है।”
कुछ लोग चुप हो गए। कुछ ने सिर हिलाया। और मैं वहीं खड़ा रह गया, क्योंकि वो आदमी सच कह रहा था, बस आधा सच कह रहा था — और आधा सच कभी-कभी पूरे झूठ से ज़्यादा भारी होता है।
मेरे अंदर से एक आवाज़ आई कि बोल, कह दे कि साहब ने मुझे बुलाया, मैंने नहीं बुलाया। बोल दे। पर मैंने मुँह नहीं खोला। क्योंकि सभा में मैंने खुद कहा था — किसी पर ज़ोर नहीं।
तभी किसी ने मेरी कमीज़ खींची। टिंकू था। उसका चेहरा लाल था और वो हाँफ रहा था, जैसे दौड़कर आया हो।
“उस्ताद,” उसने कहा। “उस्ताद!”
“बाद में, टिंकू,” मैंने कहा।
“नहीं, सुन!” उसने फिर खींचा। “नल के पास नीली शर्ट वाला आदमी ईंट रखकर गया था।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“कब?”
“थोड़ी देर पहले,” उसने कहा। “मैं छत पर था। वो आया, कुछ रखा, और चला गया। मैंने सोचा कि तेरे लिए काम की बात है।”
“कहाँ रखी?” मैंने पूछा।
“नल के नीचे,” टिंकू ने कहा। “पाइप के मुँह के पास।”
मैंने भीड़ में देखा। लोग अब भी चिल्ला रहे थे। मैंने हाथ उठाकर कहा, “टिंकू कुछ कह रहा है” — पर किसी ने नहीं सुना। रमेश भाई की आवाज़ नसीम भाई की आवाज़ पर चढ़ रही थी और दोनों के बीच एक औरत की आवाज़ घुल गई थी।
तो मैं चुपचाप नल के पास गया।
मैंने झुककर देखा।
पाइप के मुँह के नीचे, पक्के घेरे के किनारे पर, एक नई लाल ईंट रखी थी। उस पर धूल थी, पर ईंट के कोने अभी टूटे नहीं थे — ईंट कल की थी। और वो इस तरह तिरछी रखी थी कि जो पानी ऊपर से गिरे, वो सीधे नाली में न जाए, बल्कि उछलकर बाहर गली में फैले।
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