The Mysterious Bell – Chapter 184
और हम चल पड़े, सफ़ेद कार्ड जेब में, काली अंगूठी वाला आदमी दूर किसी दफ़्तर में, और एक लंबी शाम बाकी।
॥
सुबह के लगभग आठ बजे थे। गली अभी पूरी तरह जागी नहीं थी। नाली के ऊपर वाला पत्थर का पुल अब भी गीला था, किसी ने रात में बाल्टी उलट दी थी। पीपल के नीचे चबूतरी खाली पड़ी थी, और उसकी एक तरफ़ बंसी बाबा की रखी हुई लाठी अब भी वहीं टिकी थी, जैसे कल की बात अभी खत्म ही नहीं हुई हो।
मैं और मीरा गली के मोड़ से अंदर आए। मीरा के कंधे पर कैमरा लटका था और हाथ में वही फटा बैग। वो चलते-चलते बोल रही थी, जैसे उसका दिमाग़ रुकता ही नहीं।
“दस बजे सभा,” उसने कहा। “माइक नहीं लगाएँगे।”
“क्यों?” मैंने पूछा।
“क्योंकि माइक से लोग डरते हैं,” उसने कहा। “माइक पर बोलने वाला आदमी भाषण देता है। माइक के बिना बोलने वाला आदमी सच बोलता है।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। ये औरत कभी-कभी ऐसी बात कह देती थी कि मुझे लगता था, इसका दिमाग़ मेरे मुँह से पहले चलता है।
“और कुर्सियाँ?” मैंने पूछा।
“चारपाइयाँ,” उसने कहा। “गली की चारपाइयाँ। कोई मंच नहीं। कोई ऊँचा नीचा नहीं। सब ज़मीन पर।”
“उस्ताद ज़मीन पर नहीं बैठेंगे,” मैंने कहा। “उनकी कमर है।”
“तो उनके लिए चबूतरी का कोना,” मीरा ने कहा। “पर बाकी सब नीचे।”
मैं हँसा।
“तूने सब सोच लिया है,” मैंने कहा।
“मैंने नहीं सोचा,” उसने कहा। “मैंने तेरी गली को देखा है। यहाँ लोग ऊँची जगह पर बैठे आदमी की बात सुनते हैं, पर मानते उसको हैं जो उनके बराबर बैठा हो।”
हम चबूतरी के पास पहुँचे। मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी वहीं थी, ठंडी, चुप। सुबह से वो एक बार भी नहीं बोली थी, और यही बात मुझे खटक रही थी। जब वो चुप रहती थी, तो मुझे लगता था कि वो कुछ सुन रही है जो मैं नहीं सुन पा रहा।
तभी पीछे से दौड़ते हुए टिंकू आया। उसके घुटने पर पट्टी आज भी वही थी, बस उस पर नई धूल जम गई थी।
“उस्ताद!” वो हाँफते हुए बोला। “चारपाइयाँ मैंने और गुड्डू ने पीपल के नीचे लगा दीं। पाँच। और सानिया ने पानी की बाल्टी और गिलास रख दिए।”
“छह चाहिए,” मैंने कहा।
“छह नहीं हैं,” टिंकू ने कहा। “पर रफ़ीक़ की अम्मी ने कहा कि उनकी चारपाई ले लो, बस उस पर पहले दो रोटियाँ सुखानी हैं।”
“कितनी देर?”
“जितनी देर में तू एक चाय पीए,” टिंकू ने कहा।
मीरा हँस पड़ी।
“ठीक है,” मैंने कहा। “रोटियाँ सूखने दो।”
टिंकू वहीं खड़ा रह गया, जैसे उसके पास कुछ और भी है पर कहने का तरीक़ा ढूँढ रहा हो। मैंने उसे देखा।
“बोल,” मैंने कहा।
“उस्ताद,” उसने धीरे से कहा, “आज चबूतरी पर बहुत लोग आएँगे?”
“पता नहीं,” मैंने सच कहा।
“अगर कम आए तो?”
मैं एक पल रुका। यही सवाल मेरे अंदर भी था, बस मैं उसे मुँह से बाहर नहीं आने देता था।
“कम आए तो भी सभा होगी,” मैंने कहा। “दो आदमी हों तो भी सभा होती है। तीन हों तो भी। सभा की जान गिनती नहीं होती, टिंकू। सभा की जान यह होती है कि जो बोला गया, वो सबने सुना।”
वो सिर हिलाकर चला गया। मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
“अच्छा जवाब दिया,” उसने कहा।
“दिया तो,” मैंने कहा, “पर खुद को भी वही समझाना पड़ रहा है।”
वो कुछ नहीं बोली। बस अपना बैग सँभालकर चबूतरी पर रख दिया।
तुम सोच रहे होगे कि सभा में ऐसा क्या बड़ा हुआ। तो सुनो, सभा में बड़ा धमाका नहीं हुआ। सभा में वो हुआ जो असली चीज़ों में होता है — लोग आए, लोग बैठे, किसी ने कुछ कहा, किसी ने कुछ नहीं कहा, और फिर सब उठकर अपने-अपने काम पर चले गए। पर उस एक घंटे में गली ने अपने आप को देख लिया था। और अपने आप को देखना कभी-कभी सबसे डरावनी चीज़ होती है।
दस बजे तक चबूतरी भर गई थी।
बंसी बाबा आए, रहमत बाबा आए, दोनों अब साथ बैठते थे, बीच में कोई दूरी नहीं छोड़ते थे। हाफ़िज़ निसार अहमद आए, पंडित ब्रजकिशोर आए, और उनके आने पर मैंने देखा कि बंसी बाबा ने अपनी जगह थोड़ी सी खिसका दी, ताकि पंडित जी को छाया मिल जाए। यह छोटी बात है, पर यही छोटी बातें गली को गली बनाती हैं।
इब्राहीम चाचा आए, अपनी तस्बीह घुमाते हुए। बृजमोहन बाबा लाठी टेककर आए और पहली बार पत्थर पर नहीं, चबूतरी पर बैठे। यह देखकर मेरा गला भर आया, पर मैंने कुछ नहीं कहा। कभी-कभी चुप रहना भी एक तरह का शुक्रिया होता है।
दुबे अंकल आए। अपनी कुर्सी उठाकर लाए, क्योंकि उन्होंने एक बार कहा था कि अपनी चीज़ पर बैठकर आदमी कम झूठ बोलता है। शबनम आपा ने गुमटी से पीतल की थाली उठाई और उस पर गिलास रखकर ले आईं, साथ में एक केतली भी।
“चाय सबके लिए,” उन्होंने कहा। “पैसा कोई नहीं देगा। आज के दिन मेरी गुमटी खुली है, बस शर्त एक है — झूठ बोलने वाले को अगली बार चाय नहीं मिलेगी।”
भीड़ में हल्की हँसी फैली।
उस्ताद अली बक्श आए, अपना मोटा चश्मा कान पर टिकाए, और चबूतरी के कोने पर बैठ गए। उन्होंने मुझे देखा और सिर हिलाया। बस इतना। पर उस सिर हिलाने में एक पूरी बात थी — चल, शुरू कर।
भोला भाई आए और उनके साथ सनी आया। सनी ने आते ही पीछे की तरफ़ देखा, जैसे कोई उसे देख रहा हो। फिर वो बैठ गया, हाथ घुटनों पर रखकर।
और सबसे पीछे, चबूतरी से थोड़ी दूर, ज़मीन पर पापा बैठे थे। किसी ने उन्हें जगह दी भी, पर उन्होंने नहीं ली। वो वहीं रहे, जहाँ से सब दिखता था, पर कोई उन्हें ज़्यादा नहीं देखता था।
मैं खड़ा हुआ। मेरे हाथ में कुछ नहीं था। न काग़ज़, न कलम। बस घंटी, जेब में।
“मैं भाषण नहीं दूँगा,” मैंने कहा। “मुझे भाषण देना नहीं आता, और सच कहूँ तो भाषण सुनने का भी मन नहीं करता। मैं सिर्फ़ तीन बातें कहूँगा और फिर तुम सब बोलो।”
किसी ने कुछ नहीं कहा। पीपल के पत्ते हिल रहे थे और उनकी आवाज़ सबसे ऊँची थी।
“पहली बात,” मैंने कहा, “ये गली किसी की जागीर नहीं है। न मेरी, न उस्ताद की, न शबनम आपा की, न उस आदमी की जो सफ़ेद गाड़ी में आया। ये गली उन लोगों की है जो यहाँ सुबह उठकर चूल्हा जलाते हैं।”
“दूसरी बात,” मैंने कहा, “हमारे पास काग़ज़ हैं। बहुत काग़ज़ हैं। नोटिस हैं, मोहर है, सूची है, अंगूठे हैं। पर मैं तुमसे यह नहीं कहूँगा कि इन काग़ज़ों से लड़ो। मैं यह कहूँगा कि अब झूठ मत बोलो। अगर तुमने कभी किसी काग़ज़ पर अंगूठा लगाया है, तो उसे आज यहाँ खड़े होकर बोल दो। काग़ज़ अपने आप हल्का हो जाएगा।”
भीड़ में सन्नाटा छा गया। कोई नहीं बोला।
फिर भोला भाई उठे। उनके हाथ अब भी काँप रहे थे, पर पहले जैसे नहीं। वो खड़े हुए और बोले —
“अंकुश भाई सच कह रहे हैं। मैंने अंगूठा लगाया था। मेरी बीवी का ऑपरेशन था, मेरे पास पैसे नहीं थे, और मुझे कोरा काग़ज़ दिया गया।”
उन्होंने कुछ और कहना चाहा, पर रुक गए। उनका बेटा सनी उठा और उनके बगल में खड़ा हो गया। और यही काफ़ी था। भोला भाई ने सनी की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़, फिर बैठ गए — पर इस बार वो अकेले नहीं बैठे थे।
उसके बाद तीन और लोग बोले। किराने वाले बूढ़े काका का बेटा उठा और बोला कि उसके बाप का नाम उस सूची से हटा दिया जाए, वरना वो खुद सबके सामने सच बोलेगा। चूड़ी वाली बाई ने कहा कि उसकी दुकान पर तीन आदमी दिन भर बैठते हैं और वो डरती है, पर आज से वो उन्हें चाय नहीं देगी। और साइकिल पुर्ज़ों वाला भाई चुपचाप पीछे बैठा रहा, एक शब्द नहीं बोला। पर वो आया था। वो बैठा था। और मेरे हिसाब से उस दिन उसका बैठना ही उसका बोलना था।
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