The Mysterious Bell – Chapter 183
मीरा ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
“अब मान गया या नहीं?” उसने पूछा।
“नहीं,” मैंने कहा। “अब नहीं।”
“तो तू ठीक है,” उसने कहा। “काग़ज़ देखकर डरना ठीक है। उसे छूने से पहले रुक जाना ठीक है। पर उसे उठाना ग़लत है।”
मैंने सिर हिलाया।
“अब मैं अस्पताल के काग़ज़ात वाले कमरे में जा रहा हूँ,” मैंने कहा। “डॉक्टर इसरानी से बात करनी है।”
“काजल को बता दूँ?”
“नहीं,” मैंने कहा। “वो माँ के पास रहे। माँ अकेली नहीं रहनी चाहिए।”
मीरा ने कहा, “मैं बाहर रहूँगी। काजल को बुलाती हूँ अगर ज़रूरत हो।”
“ठीक है।”
मैं अस्पताल के उस पुराने हिस्से में गया जहाँ डॉक्टर इसरानी का कमरा था। दरवाज़ा खुला था। अंदर काग़ज़ों के ढेर थे, आधे पानी के गिलास थे, टूटे चश्मे की एक डंडी रखी थी। दीवार पर एक बिना तारीख़ वाली तस्वीर टँगी थी, जिसमें एक औरत की आँखें हँस रही थीं।
डॉक्टर इसरानी कुर्सी पर बैठे थे, हाथ में पुराना स्टेथोस्कोप, जिसकी नली पर टेप लिपटा हुआ था। मैं अंदर गया तो उन्होंने ऊपर देखा, और फिर अपनी नज़र काग़ज़ों पर गिरा दी।
“डॉक्टर साहब,” मैंने कहा।
“आओ, बेटा,” उन्होंने कहा, आवाज़ में वो गर्मी थी जो साठ के पार के लोगों की आवाज़ में होती है, पर आज वो गर्मी थोड़ी उखड़ी हुई थी।
“माँ की दवा रुक गई है।”
वो एक पल के लिए रुके। फिर उन्होंने स्टेथोस्कोप नीचे रख दिया।
“मुझे पता है,” उन्होंने कहा।
“क्यों?” मैंने पूछा।
“अस्पताल की ज़मीन का काग़ज़ अटका हुआ है,” उन्होंने कहा, और फिर चुप हो गए, जैसे बहुत कह दिया हो।
“इसका माँ की दवा से क्या रिश्ता?”
“ज़मीन का काग़ज़ अटका है, तो ऊपर वाले दफ़्तर में सब कुछ अटका है,” उन्होंने कहा। “दवा की खेप भी, नई जाँच भी, नर्सिंग के काग़ज़ भी। अब तू समझ ही गया होगा।”
मैं समझ गया था।
“आपने क्यों नहीं बताया?” मैंने पूछा।
“क्या बताता?” उन्होंने कहा, और पहली बार मेरी तरफ़ देखा। “कि मुझे तीन महीने पहले एक आदमी मिला था, सफ़ेद कुर्ते में, जिसने मुझे नई इमारत में एक कमरा, एक नर्सिंग ट्रेनिंग टीम और पैंतालीस साल की नौकरी का सपना दिखाया था? और मैंने उसे सुन लिया? मैंने मना नहीं किया? बस सिर्फ़ चुप रह गया?”
“आपने कबूल किया,” मैंने कहा। “इसी लिए तो अब चुप नहीं हैं।”
वो मुस्कुराए। पर मुस्कान में वो बात नहीं थी जो उम्र के साथ आती है। उसमें शर्म थी।
“बेटा,” उन्होंने कहा, “एक डॉक्टर को सबसे ज़्यादा डर किस बात का होता है?”
“मौत का?”
“नहीं,” उन्होंने कहा। “अपने हाथ खाली हो जाने का। जब मरीज़ आता है, तो डॉक्टर के पास दवा होती है, जाँच होती है, मशीन होती है। जब इनमें से एक भी न हो, तो डॉक्टर सिर्फ़ एक आदमी रह जाता है, जो ये कहता है कि भगवान भरोसे बैठो। और मैंने वो नहीं कहा। पैंतालीस साल में एक बार भी नहीं।”
उन्होंने काग़ज़ों के ढेर में से एक पीला काग़ज़ निकाला। वो वही काग़ज़ था जो मैंने दीवार पर लगा देखा था — भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की नीली मोहर, मुफ़्त इलाज, तीस दिन की हद, खाली अंगूठा।
“ये मेरी मेज़ पर रखा है,” उन्होंने कहा। “मैंने इसे किसी को नहीं दिखाया। यहाँ तक कि अपने आप को भी नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि अगर मैं इसे देखता, तो मुझे ये मानना पड़ता कि मैंने इस काग़ज़ से डरकर माँ की दवा रोकने में मदद की है।”
“आपने मदद की?”
“मैंने रोका नहीं,” उन्होंने कहा। “और यही मदद है।”
मैं चुप रहा।
“अब क्या?” मैंने पूछा।
“अब तू जा,” उन्होंने कहा, “और मुझे कुछ देर इस कमरे में अकेला छोड़ दे। मुझे अपने आप से एक बात कहनी है।”
“क्या बात?”
“यही,” उन्होंने कहा, “कि एक काग़ज़ ने मुझे एक बीमार औरत से ज़्यादा डरा दिया।”
मैं दरवाज़े तक गया। फिर रुका।
“डॉक्टर साहब,” मैंने कहा, “आपकी बीवी की तस्वीर है ना दीवार पर?”
वो एक पल के लिए रुके। फिर उन्होंने गर्दन हिलाई।
“वो कहती थी,” उन्होंने कहा, “कि इस अस्पताल की दीवारें पीली रहेंगी, तो लोग कम डरेंगे।”
“तो दीवार पीली रखिए,” मैंने कहा। “और काग़ज़ को दराज़ में रख दीजिए।”
वो मुस्कुराए। इस बार मुस्कान में थोड़ी देर टिकी।
मैं बाहर निकला। गलियारे में घंटी हिली, और मैं एक पल के लिए रुक गया।
मैंने उसे जेब से निकाला। अभी भी ठंडी थी। पर मेरे कान में एक आवाज़ आई, बहुत धीमी, इतनी धीमी कि जैसे कोई दूसरे कमरे से बोल रहा हो।
ये काग़ज़ नहीं है। ये कर्ज़ है।
मैंने घंटी को हथेली में बंद कर लिया।
“मुझे पता है,” मैंने धीरे से कहा।
फिर मैं सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा।
नीचे उतरकर मैंने बाहर का दरवाज़ा खोला और अस्पताल के गेट की तरफ़ चला। वहाँ बबलू खड़ा था।
मुझे देखकर वो मुस्कुराया। उस दिन वो सोने की चेन नहीं पहने था। उसके गले में कुछ भी नहीं था, और यही सबसे ज़्यादा डरावना था। जो आदमी अपना सबसे प्यारा टुकड़ा भी नहीं पहने, वो किसी और के लिए आया होता है।
“अंकुश भाई,” उसने कहा। “साहब ने ये भेजा है।”
उसने एक छोटा सफ़ेद कार्ड मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने उसे नहीं लिया। उसने मेरी मुट्ठी में रख दिया।
मैंने कार्ड खोला।
उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी, नीली स्याही से, साफ़ अक्षरों में —
आज शाम चार बजे। भारद्वाज भवन। अकेले।
तीन शब्द थे जो सबसे ज़्यादा चुभे।
अकेले।
मैंने कार्ड मोड़कर जेब में रखा और बबलू की तरफ़ देखा।
“उससे कह देना,” मैंने कहा, “कि मैं आऊँगा। पर अकेला नहीं।”
बबलू हँसा।
“साहब ने कहा था कि तू यही बोलेगा,” उसने कहा, और अपनी गाड़ी की तरफ़ बढ़ गया।
मैं अस्पताल के गेट पर खड़ा रहा। पीछे से मीरा आई और कार्ड मेरे हाथ से ले लिया।
“क्या लिखा है?” उसने पूछा।
“चार बजे भारद्वाज भवन, अकेले,” मैंने कहा।
वो देर तक कार्ड को देखती रही। फिर उसने कहा —
“तू अकेला नहीं जाएगा।”
“जानता हूँ,” मैंने कहा। “पर एक बात समझ ले। ये कार्ड मुझे देने से पहले उसने मेरी माँ की दवा रोकी है। इसका मतलब ये है कि उसने ये कार्ड दवा रोकने से पहले लिखा था।”
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
“मतलब वो जानता था कि मैं सुबह दवा रुकवाकर आऊँगा,” मैंने कहा।
“या वो जानता था कि दवा रुकेगी,” मीरा ने कहा, “और वो तुझे यहाँ बुलाकर ये कार्ड देने का इंतज़ार कर रहा था।”
मैंने सिर हिलाया।
“अब तू क्या करेगा?” उसने पूछा।
“पहले सभा,” मैंने कहा। “फिर भारद्वाज भवन।”
“दस बजे?”
“हाँ,” मैंने कहा। “दस बजे चबूतरी। गली का जवाब।”
“और चार बजे?”
“चार बजे वो मेरा जवाब सुनेगा,” मैंने कहा।
मैंने अस्पताल की पीली दीवार की तरफ़ देखा। वो दीवार अब भी खड़ी थी। ऊपर पहली मंज़िल की खिड़की से माँ दिख रही थीं, काजल उनके बगल में खड़ी थी। दोनों नीचे देख रही थीं।
मैंने हाथ उठाया।
माँ ने भी हाथ उठाया।
काजल ने भी।
और मैंने मन में ठान लिया कि सुबह दस बजे चबूतरी पर, और शाम चार बजे उस सफ़ेद इमारत में, मैं उस आदमी को यही दिखाऊँगा — कि मेरे पास एक हाथ उठाकर हवा में लहराने के लिए दो लोग हैं। और वो उसके पास नहीं हैं।
मैंने घंटी जेब में वापस रखी। वो अब भी ठंडी थी। पर इस बार ठंडक में एक बात थी जो पहले नहीं थी — सब्र।
मैंने मीरा से कहा, “चल, चबूतरी चलें। सभा की तैयारी करनी है।”
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