The Mysterious Bell181 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 181

7 min read November 5, 2026

॥

उस रात मैंने सोने की कोशिश नहीं की।

दुकान के पीछे वाले कमरे में बल्ब गुनगुना रहा था, और मैं चारपाई पर बैठा था, सामने मेज़ पर वो सफ़ेद लिफ़ाफ़ा खुला पड़ा था। मैंने उसे एक बार पूरा खोलकर देखा था, फिर बंद कर दिया था, फिर फिर खोला था। जैसे कोई बंद दरवाज़ा हो जिसे खोलने का मन न हो, पर चाबी हाथ में हो तो खोलना पड़ता है।

उसके अंदर काग़ज़ थे। बहुत सारे नहीं, गिने-चुने। पर हर काग़ज़ मेरे सीने पर पत्थर की तरह रखा हुआ था।

सबसे ऊपर वो नियुक्ति पत्र था। भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की नीली मोहर, मेरा नाम साफ़ अक्षरों में छपा हुआ, महीने का पच्चीस हज़ार, भारद्वाज भवन के पीछे वाला फ्लैट, छोटी गाड़ी, और नीचे एक लाइन — जवाब दो दिन के अंदर। लौटाने पर सब पहले जैसा।

मैंने उसे एक तरफ़ रख दिया।

उसके नीचे माँ की अस्पताल की फाइल की नक़ल थी। काग़ज़ नया था, कॉपी की गंध आ रही थी, पर उस पर कोई हस्ताक्षर नहीं था। कोई तारीख़ नहीं थी। ऊपर माँ का नाम था, उम्र, और उसके नीचे दवाओं की सूची, जाँचों की सूची। दो जाँचें जो अभी तक नहीं हुई थीं — वो भी सूची में लिखी हुई थीं, जैसे हो चुकी हों। और दवाओं के आगे लिखा था कि ये महीने भर की हैं, पर नीचे महीने का कोई हिसाब ही नहीं था।

जैसे किसी ने चुपचाप अंदर आकर माँ की बीमारी का हिसाब मेरी मेज़ पर रख दिया हो, बिना एक शब्द कहे।

और उस सबके बीच वो तस्वीर थी।

मैंने उसे उठाया। वो बाहर से खींची गई थी, खिड़की की तरफ़ से। माँ बेड पर लेटी थीं, पतले हाथ, आँखें बंद, साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ। उनके बगल में पानी का गिलास था, और गिलास के पीछे दीवार पर रणवीर का वो चमकदार पोस्टर था, जिस पर वो हाथ जोड़े खड़ा था और नीचे लिखा था — नई शुरुआत, नए सपने।

मैंने तस्वीर को उलट दिया।

नीचे का हिस्सा खाली था। कोई तारीख़ नहीं। कोई नाम नहीं। जैसे किसी ने तस्वीर खींची, और फिर भूल गया कि उस पर कुछ लिखना भी था।

पर सबसे नीचे, अलग पड़े एक छोटे काग़ज़ पर, नीली स्याही में एक ही पंक्ति लिखी थी।

जवाब कल सुबह दस बजे तक। जवाब से पहले मशीन नहीं चलेगी।

मैंने उस लाइन को तीन बार पढ़ा।

फिर मैंने लिफ़ाफ़े को मोड़कर रख दिया और घंटी जेब से निकाली। पीतल, ठंडी। मैंने उसे हथेली में रखकर देखा। वो मेरी ओर देख रही थी, बिना आँख के, बिना ज़ुबान के।

“कुछ बोल,” मैंने कहा।

चुप।

“इतना तो बोल कि ये आदमी मुझसे क्या चाहता है।”

चुप।

मैंने उसे वापस जेब में रखा और चारपाई पर लेट गया। आँखें छत पर थीं, पर सोच कहीं और थी।

माँ की तस्वीर मेरे दिमाग़ से नहीं हट रही थी। वो खिड़की के बाहर से खींची गई थी। यानी जिसने खींची, वो अंदर नहीं आया। वो दरवाज़े के बाहर खड़ा रहा, और उसने अंदर झाँका, और उसने फोटो खींची, और वो चला गया।

मानो किसी ने मेरी माँ को तस्वीर बना दिया हो, और उस तस्वीर को मेरी मेज़ पर रखकर कह दिया हो — देख, मैं तेरे घर तक पहुँच सकता हूँ।

घंटी फिर ठंडी हुई।

बजी नहीं। सिर्फ़ ठंडी हुई, जैसे कोई भीतर से धीरे से कह रहा हो कि सुन रहा हूँ, पर अभी नहीं बोलूँगा।

मैंने आँखें बंद कर लीं।

सुबह जब आँख खुली, तो बाहर अभी ठीक से उजाला भी नहीं हुआ था। पर गली में हलचल थी। मैंने दरवाज़ा खोला तो सामने सानिया खड़ी थी, हाथ में लाल कवर कॉपी, और चेहरे पर वो भाव जो बच्चों के चेहरे पर तभी आता है जब उन्होंने कुछ ऐसा देखा हो जो बड़ों ने नहीं देखा।

“उस्ताद,” उसने कहा, “रात भर मोड़ पर गाड़ी खड़ी थी।”

“कौन सी गाड़ी?”

“सफ़ेद वाली नहीं,” उसने कहा। “काली थी। छोटी। उसमें कोई बैठा था और वो कभी नहीं उतरा।”

“तूने कब देखा?”

“मैंने छत से देखा,” उसने कहा, “रात को दो बजे पानी पीने उठी थी।”

मैं हँसा। “तू पानी पीने उठी थी या गाड़ी देखने?”

“दोनों,” उसने कहा, और कॉपी खोलकर दिखाने लगी कि उसने कितने बजे क्या देखा, किस शक्ल की गाड़ी थी, कितने आदमी बैठे थे।

मैंने उसका सिर सहलाया। “तू ठीक है।”

वो मुस्कुराकर भाग गई।

मैंने दुकान का शटर उठाया ही था कि फोन बजा।

काजल का नाम आ रहा था।

मैंने उठाया।

“अंकुश,” उसकी आवाज़ दबी हुई थी, जैसे किसी कोने में खड़ी होकर बोल रही हो, “तू अस्पताल आ जा। जल्दी।”

“क्या हुआ?”

“दवा की नई खेप रुक गई है,” उसने कहा। “फार्मेसी वाला कह रहा है कि काग़ज़ में कुछ गड़बड़ है। और डॉक्टर इसरानी सुबह से मुझसे नज़र नहीं मिला रहे। मैंने दो बार बात की कोशिश की, वो काग़ज़ों में सिर डालकर बैठे रहे।”

मेरा हाथ फोन पर कस गया।

“काग़ज़ में क्या गड़बड़?”

“पता नहीं,” उसने कहा। “फार्मेसी वाले ने सिर्फ़ इतना कहा कि ऊपर से हिदायत आई है कि नई खेप जारी न की जाए जब तक काग़ज़ साफ़ न हो। अंकुश, माँ की दवा कल खत्म हो रही है।”

मैंने एक पल को आँखें बंद कर लीं।

वो काग़ज़ मेरी मेज़ पर रखा था। वो नियुक्ति पत्र मेरी मेज़ पर रखा था, और उसी वक़्त अस्पताल में माँ की दवा रुक गई थी।

मानो किसी ने दोनों तरफ़ से दरवाज़े बंद कर दिए हों।

“तू वहीं रुक,” मैंने कहा। “मैं आ रहा हूँ। दस मिनट।”

“अंकुश,” उसने कहा, आवाज़ और धीमी हो गई, “माँ को पता चल गया है।”

मैं कुछ नहीं बोला।

“मैंने नहीं बताया,” उसने कहा। “मैंने सिर्फ़ इतना कहा कि देर होगी। पर उन्हें समझ आ गया। और अब वो… वो कुछ और ही कह रही हैं।”

“क्या कह रही हैं?”

“तू आ जा,” उसने कहा। “फोन पर नहीं।”

फोन कट गया।

मैंने शटर नीचे गिराया, आधा ही, और गली की तरफ़ भागा। रास्ते में शबनम आपा की गुमटी से मीरा निकली, हाथ में कैमरा और वही फटा बैग। वो मेरे चेहरे को देखकर रुक गई।

“क्या हुआ?” उसने पूछा।

“अस्पताल,” मैंने कहा। “दवा रुक गई।”

वो एक शब्द भी नहीं बोली और मेरे पीछे चल दी।

अस्पताल पहुँचकर मैं सीधे पहली मंज़िल पर गया। माँ का बेड खिड़की के पास था। काजल बगल में खड़ी थी, हाथ में नर्सिंग की मोटी किताब दबी हुई थी, जैसे उसे बचाने के लिए लाई हो। माँ बैठी थीं, साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ, और उनके चेहरे पर वो भाव था जो मैंने शायद तीन बार ज़िंदगी में देखा था — सबसे पहली बार तब जब पापा ने दुकान बंद की थी।

मैंने दरवाज़े से अंदर झाँका।

“माँ…”

“अंदर आ,” उन्होंने कहा। आवाज़ तेज़ थी। बीमार थी, पर तेज़ थी।

मैं गया। काजल ने मेरी तरफ़ देखा, आँखों में कुछ था जो माँ के सामने नहीं कहा जा सकता था।

“बता,” माँ ने कहा। “वो काग़ज़ क्या है?”

“माँ, अभी—”

“अभी नहीं का ज़माना नहीं है,” उन्होंने कहा। “मैं बीमार हूँ, बहरी नहीं। तू सुबह से ऐसा चल रहा है जैसे किसी ने तेरे पीछे आग लगा दी हो। काजल दो बार रो चुकी है और मुझे ये कह रही है कि आँख में कुछ गिर गया। मेरी आँख में कुछ नहीं गिरा। मेरी आँख के सामने मेरा बेटा और मेरी बेटी दोनों झूठ बोल रहे हैं।”

काजल ने नीचे देखा।

मैंने सफ़ेद लिफ़ाफ़ा जेब से निकाला और माँ के सामने रख दिया।

“ये क्या है?” उन्होंने पूछा।

“वो आदमी भेजा है,” मैंने कहा। “रणवीर भारद्वाज। दुकान पर खुद आया था।”

माँ ने लिफ़ाफ़ा उठाया, खोला, नियुक्ति पत्र देखा, फिर फाइल की नक़ल देखी, फिर तस्वीर देखी। तस्वीर देखकर उनका हाथ रुक गया। उन्होंने उसे उँगली से सहलाया, जैसे अपने ही चेहरे को छू रही हों, और फिर उसे वापस रख दिया।

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