The Mysterious Bell – Chapter 180
पहला काग़ज़ मोटा था, अच्छा छपा हुआ, ऊपर नीली मोहर। भारद्वाज कंस्ट्रक्शन। नीचे बड़े अक्षरों में लिखा था — नियुक्ति पत्र। उसमें मेरा नाम था, मेरी उम्र थी, मेरे काम की लाइनें थीं, तनख्वाह थी, और सबसे नीचे लिखा था कि यह पत्र दो दिन के भीतर लौटाना है, और अगर लौटाया तो चीज़ें उसी तरह रहेंगी जैसी अब हैं।
“पढ़ो,” मीरा ने कहा।
“पढ़ रहा हूँ।”
फिर मैंने दूसरा काग़ज़ उठाया।
और मेरे हाथ रुक गए।
अगर तुमने कभी अपनी माँ की अस्पताल की फाइल नहीं देखी, तो तुम नहीं समझोगे। वो फाइल कोई किताब नहीं होती। वो एक-एक काग़ज़ पर बीमारी लिखी होती है, छोटे-छोटे अक्षरों में, और वो अक्षर पढ़ने पर कोई आवाज़ नहीं करते, पर सुनाई बहुत देते हैं।
यह उसी फाइल की नक़ल थी।
डॉक्टर इसरानी की लिखी हुई दवाएँ। दो जाँच जो की नहीं गईं, उनके काग़ज़। माँ का नाम, माँ की उम्र, माँ की खाँसी का पूरा हिसाब। और ठीक बीच में वो पीला काग़ज़ था जो मैंने अस्पताल के गलियारे में पढ़ा था — भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की नीली मोहर, मुफ़्त इलाज, तीस दिन की हद, और नीचे अँगूठे की खाली जगह।
पर यह इसी पर ख़त्म नहीं हुआ।
फाइल के साथ एक छोटी तस्वीर थी।
माँ। अस्पताल के बेड पर। पतले हाथ, आँखें बंद, साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ। तस्वीर खिड़की से खींची गई थी। बाहर से।
मेरे अंदर कुछ ठंडा हो गया।
“क्या है?” टिंकू ने पूछा। उसकी आवाज़ पतली हो गई थी।
“कुछ नहीं।”
मैं झूठ बोल रहा था और मैं जानता था, और कमरे में सब जानते थे।
और तस्वीर के नीचे, नीली स्याही से, हाथ से लिखा हुआ एक वाक्य था।
“जवाब कल सुबह दस बजे तक। जवाब से पहले मशीन नहीं चलेगी।”
मैंने वो काग़ज़ मेज़ पर रख दिया।
कमरे में कोई कुछ नहीं बोला। दुबे अंकल ने अपनी नीली कॉपी हाथ में ली और उसे खोला, फिर बंद कर दिया, जैसे कोई झूठी तसल्ली ढूँढ रहे हों। शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा और उनका मुँह कस गया, क्योंकि शबनम आपा औरत हैं और वो जानती हैं कि माँ की बात आदमी को कहाँ से काटती है।
और पापा ने वो तस्वीर उठाई।
उन्होंने बहुत देर तक देखी। फिर उन्होंने अपना चश्मा उतारा, टेप वहीं कान पर चिपका रह गया, और उन्होंने अपनी आँखें रगड़ दीं।
“इसे माँ को मत दिखाना,” उन्होंने कहा।
“नहीं दिखाऊँगा।”
“और काजल को भी नहीं।”
“नहीं दिखाऊँगा।”
पापा ने तस्वीर वापस मेज़ पर रखी, और उनके हाथ से वो फिसल गई और फ़र्श पर गिर गई। उन्होंने उसे उठाया और सीधा रख दिया, और मुझे लगा कि वही काम उन्होंने पूरी ज़िंदगी किया है — चीज़ें गिरती हैं, वो चुप्पी से उठाते हैं।
मीरा ने काग़ज़ उठाया और उसे ध्यान से पढ़ने लगी। उसके माथे पर वो सिलवटें आ गईं जो तब आती हैं जब वो कोई कमज़ोरी पकड़ लेती है।
“देखो,” उसने कहा। “तस्वीर पर तारीख़ नहीं है। और फाइल की नक़ल पर डॉक्टर के हस्ताक्षर की जगह खाली है। ये बात तुम्हें डराने के लिए है, अंकुश। दरअसल ये कोई फाइल नहीं है, यह एक चिट्ठी है।”
“फिर भी इसमें माँ के जाँच के काग़ज़ हैं,” मैंने कहा। “इतने काग़ज़ किसी के पास इकट्ठे नहीं होते। इसे किसी ने चुराया है। या किसी ने दिया है।”
दुबे अंकल ने अपनी नीली कॉपी मेज़ पर रखी।
“इसमें एक बात है जो तुम्हें देखनी चाहिए,” उन्होंने कहा। “जवाब का वक़्त सुबह दस बजे है। और सुबह दस बजे सभा है। ये दोनों अलग नहीं हैं, बेटे। ये एक ही चीज़ के दो सिरे हैं। साहब चाहता है कि कल सुबह तुम चबूतरी पर खड़े होकर यह सोचो कि माँ के इलाज का दाम क्या है।”
कमरा फिर चुप हो गया।
और तब मेरी जेब में घंटी ठंडी हुई।
बिना बजे नहीं बोलती, ये मैं जानता हूँ। पर उस वक़्त मैंने अपना हाथ उस फाइल पर रखा था और जेब में घंटी ने एक हल्की सी झुरझुरी दी, और मेरे कान में एक छोटा वाक्य आया। बस एक।
“काग़ज़ में तेरी माँ नहीं, तेरा डर लिखा है।”
मैंने हाथ खींच लिया।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। “उस्ताद, सुबह दस बजे हम चबूतरी पर जा रहे हैं ना?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके घुटने पर पट्टी बँधी थी, हाथ में लाल कॉपी, और जेब में वो माचिस की डिब्बी जिस पर उसने नोटिस की तारीख़ लिखी थी। उसका डर उसने कभी मुझसे नहीं छिपाया, और इसीलिए मुझे उससे सच बोलना पड़ता है।
“जा रहे हैं,” मैंने कहा। “और सुबह दस बजे हम वहीं होंगे। उससे पहले मैं ये लिफ़ाफ़ा वापस नहीं करूँगा। उससे पहले मैं कुछ नहीं करूँगा।”
“पर उसने लिखा है—”
“उसने बहुत कुछ लिखा है,” मैंने कहा। “उस आदमी ने अपनी तस्वीर के नीचे भी लिखवा रखा है कि वो समाजसेवी है। लिखने से सच नहीं हो जाता।”
मैंने फाइल उठाई और उसे मोड़कर अपने सीने से लगा लिया।
फिर मैंने वो तस्वीर उठाई और उसे भी उसी में रख दिया। माँ की तस्वीर मेरी जेब में थी, और घंटी भी मेरी जेब में थी, और मुझे लगा कि आज मेरी जेब में बहुत भारी चीज़ है।
दरवाज़ा खोलते वक़्त बाहर की धूप आँखों में लगी। गली में लोग खड़े थे। बच्चे पीपल पर बैठे थे। चबूतरी पर बुज़ुर्ग थे और उनमें से कोई भी जाने को तैयार नहीं था। जैसे पूरी गली ने तय कर लिया हो कि आज घर नहीं जाएँगे।
मैंने सफ़ेद लिफ़ाफ़ा अपनी जेब में डाला और बाहर देखा।
गली के मुँह पर सफ़ेद गाड़ी अभी नहीं आई थी, पर चारों जासूसों ने पहले ही खबर दे दी थी कि मोड़ पर एक गाड़ी रुकी है और उसमें कोई बैठा है और वो हमारी तरफ़ देख रहा है।
मीरा ने अपना बैग उठाया।
“अंकुश,” उसने धीरे से कहा, “एक बात पूछूँ?”
“पूछो।”
“तू एक पल के लिए मान गया था ना?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“हाँ,” मैंने कहा। “एक पल के लिए मान गया था।”
“मुझे पता है,” उसने कहा। “मैं कैमरे से देख रही थी। तेरी आँखें बदल गई थीं।”
“और फिर?”
“फिर तेरे पापा ने हाथ कमर पर रखा,” उसने कहा। “और तू ठीक हो गया।”
मैं हँसा। “तू पत्रकार है, डॉक्टर नहीं।”
“पत्रकार को सब कुछ आना चाहिए,” उसने कहा, और वो आगे बढ़ गई।
मैं दुकान के बाहर खड़ा रहा। बोर्ड ऊपर टेढ़ा टँगा था, और मैंने उसे देखकर सोचा — आज नहीं, कल सुबह के बाद। आज बोर्ड नहीं।
और मेरे दिमाग़ में एक ही बात चल रही थी। कल सुबह दस बजे चबूतरी पर सभा है। और कल सुबह दस बजे तक जवाब माँगा गया है।
दोनों एक ही वक़्त पर।
उस आदमी ने वक़्त नहीं चुना था। उसने वक़्त बनाया था।
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली और उसे हथेली में रखकर देखा। पीतल, ठंडी, चुप। उसने आज बहुत कम बोला था और जो बोला था, वो भी मेरे कान में चुभ गया था।
मैंने उसे हल्का हिलाया। बजी नहीं। मैंने फिर हिलाया। बजी नहीं।
“सुन,” मैंने धीरे से कहा, “कल सुबह दस बजे मुझे काग़ज़ का जवाब देना है या गली का?”
घंटी चुप रही।
मैंने उसे जेब में वापस रखा और लिफ़ाफ़े को सीने से लगाया, और मैंने खुद से कहा कि सुबह दस बजे, चबूतरी पर, पूरी गली के सामने, अगर कोई मुझसे पूछे कि मेरी माँ का इलाज किस चीज़ से होगा — तो मैं काग़ज़ से नहीं, गली से जवाब दूँगा।
पर उससे पहले एक रात बाकी थी।
और उस रात शहर में एक आदमी हमारे बारे में कुछ नहीं सोच रहा था। वो अपने दफ़्तर में बैठा, नीले कपड़े से ढके बक्से को देख रहा था, और मेरी माँ की फाइल की दूसरी नक़ल अपनी मेज़ पर रखे हुए था, और उसकी उँगली में काली अंगूठी थी, जो काग़ज़ पर धीरे-धीरे टिक-टिक कर रही थी।
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