The Mysterious Bell – Chapter 179
माँ। उसका चेहरा, उसकी खाँसी, वो रात जब वो एक लंबी साँस भी पूरी नहीं ले पा रही थीं और काजल उनका हाथ पकड़कर बैठी थी। डॉक्टर इसरानी की दवा का काग़ज़। फ्रिज में रखी दवा, जो बिजली जाने पर खराब हो जाती है। वो दो जाँच जो की नहीं जा सकीं क्योंकि पैसे नहीं थे। माँ की हिसाब की कॉपी, जिसके पीछे सात सौ इकहत्तर रुपये का लिफ़ाफ़ा दबा है और जिसमें लिखा है — अगर जाँच में कुछ निकले तो काजल को देना, अंकुश को नहीं।
माँ मुझे क्या समझती हैं, ये मैं जानता हूँ। वो समझती हैं कि मैं नहीं सँभाल पाऊँगा। और मैं उन्हें ये बात साबित करने से बचता आया हूँ कि वो सही हैं।
और अब ये आदमी मेरे सामने बैठा था, सिर्फ़ एक वाक्य कहने की दूरी पर, कि तुम्हारी माँ का पूरा इलाज मेरे यहाँ हो जाएगा।
“साहब,” मेरी आवाज़ निकली, पर फटी हुई निकली। “आप ये सब कह रहे हैं, और मैं जानता हूँ आप मुफ़्त में कुछ नहीं देते।”
“सही जानते हो।” वो मुस्कुराया। “मैं मुफ़्त में कुछ नहीं देता। मैं काम के पैसे देता हूँ। बस।”
“तो फिर सीधी बात कीजिए।”
“सीधी बात यह है कि तुम्हारी माँ का इलाज मेरे पास बैठे डॉक्टर से होगा — नई बस्ती का अस्पताल, जहाँ पचास बिस्तर हैं और चौबीस घंटे डॉक्टर। कोई खाँसी, कोई जाँच, कोई ऑपरेशन — पूरा। पैसा तुम्हारा नहीं लगेगा।” उसने मेरी आँख में देखा। “और तुम्हारी बहन का नर्सिंग का जो कोर्स है, उसकी फ़ीस, उसकी किताबें, उसका हॉस्टल — वो भी।”
दुकान चुप थी। बाहर भी चुप्पी थी। लोग दरवाज़े पर खड़े थे और मुझे लगा कि सब सुन रहे हैं, और मुझे लगा कि सब सिर्फ़ मेरी शक्ल देख रहे हैं, ये कि मैं क्या जवाब देता हूँ।
पीछे किसी ने पैर की खड़खड़ाई की। मैंने मुड़कर देखा।
पापा।
वो वैसे ही दरवाज़े के पास खड़े थे। एक हाथ जेब में, दूसरा हाथ — यही देखने की चीज़ थी — दूसरा हाथ उन्होंने धीरे से अपनी कमर पर रख लिया था, जैसे अचानक लगा हो कि आज कमर बहुत झुकी हुई है। उनके हाथ पर सफ़ेद निशान था। वो निशान पीतल के टुकड़े को जोड़ते वक़्त पंद्रह साल पहले आया था। उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — डर नहीं, शर्म नहीं। कुछ और। जैसे कोई आदमी अपने बेटे के सामने बैठकर अपना ही पुराना काग़ज़ देख रहा हो।
और उसी वक़्त मुझे याद आया कि पाँच साल पहले इसी आदमी की मेज़ पर मेरे पापा खड़े थे, काँपते हाथों से अँगूठा लगा रहे थे, और उनके सामने कोई नहीं था। कोई नहीं पूछ रहा था कि शंकर जी, क्या तकलीफ़ है।
टिंकू दरवाज़े के पीछे से सिर निकाले खड़ा था। उसकी आँखों में वो सवाल था जो उसने कसकर पूछा नहीं, पर जो साफ़ दिख रहा था — उस्ताद, तू मान जाएगा?
मैंने एक लंबी साँस ली।
“साहब,” मैंने कहा, “आपकी बात बुरी नहीं है। आपने जो कहा, इतना तो कोई सपने में भी नहीं देखता। पर मैं नहीं आ सकता।”
उसका चेहरा नहीं बदला।
“क्यों?”
“क्योंकि ये दुकान छोटी है,” मैंने कहा, और अपनी ही आवाज़ में अचानक हल्कापन आ गया, वो हल्कापन जो मेरे अंदर बैठा हुआ है और जो मुसीबत में भी मुझे छोड़ता नहीं। “छोटी है, साहब। टेढ़ी है, टूटी है, इसका बोर्ड किसी भी दिन गिर सकता है, इसमें एक ही बल्ब है और वो भी गुनगुनाता है। पर ये मेरी है। इसे मैंने अपने हाथों से खड़ा किया है। आपके फ़्लैट में मेरा बोर्ड नहीं झूल सकता, साहब। वहाँ उसके लिए कहीं जगह नहीं है।”
रणवीर ने पल भर मेरी तरफ़ देखा, फिर हँसा।
“ये बात तुम अपने बाप से सीखे हो?” उसने पापा की तरफ़ इशारा करके कहा। “ये ‘अपनी दुकान’ वाली बात? ये सब बातें हैं, अंकुश जी। बातों से घर नहीं चलते। घर दवा से चलते हैं। किताबों की फ़ीस से चलते हैं।”
“घर भरोसे से चलते हैं, साहब।”
वो एक पल के लिए चुप हो गया।
और मुझे लगा कि मैंने इस आदमी के अंदर कहीं एक दरवाज़ा खटखटा दिया है, जो बहुत पुराना बंद पड़ा था।
“ठीक है,” वो उठ खड़ा हुआ। “मैं गुस्सा नहीं करने आया था। मैंने सोचा था, बात करूँगा। पर बात करने से कुछ ज़्यादा नहीं होता, ये मुझे पहले से पता है।”
उसने अपनी जेब से एक सफ़ेद लिफ़ाफ़ा निकाला।
बिल्कुल सफ़ेद, बिना कोई मोहर, बिना लिखा हुआ नाम। ऐसा लिफ़ाफ़ा जो किसी भी चीज़ का हो सकता है।
“इसकी ज़रूरत नहीं, साहब,” मैंने कहा।
“खोलकर देख लेना,” उसने कहा। “फिर मना करना। एक बार देख लेना। काग़ज़ भी बोलता है, अंकुश जी। और आजकल तो काग़ज़ ही बोलता है।”
उसने लिफ़ाफ़ा मेरी मेज़ पर रख दिया।
फिर वो मुड़ा और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। दरवाज़े पर उसे फिर झुकना पड़ा। उसने बोर्ड को हाथ लगाया, बिना हँसे, और बाहर निकल गया।
गली में वो रुका और एक बार पूरी गली को देखा। दाएँ से बाएँ। जैसे कोई आदमी अपना ही बाग़ देख रहा हो और सोच रहा हो कि कहाँ काटना है।
“रहमत बाबा,” उसने चबूतरी की तरफ़ कहा, “आपकी दुआ लगी रहे।”
रहमत बाबा ने जवाब नहीं दिया।
फिर रणवीर उस्ताद अली बक्श के सामने आकर रुका। उस्ताद मीरा के पास खड़े थे, मोटा चश्मा, कान पर पेंसिल।
“उस्ताद जी, तबीयत कैसी है?”
“जैसी होनी चाहिए,” उस्ताद ने कहा।
“दुकान चल रही है?”
“सिलाई चल रही है। दुकान अपने आप चलेगी।”
रणवीर हँसा और आगे बढ़ा। फिर सफ़ेद गाड़ी के पास पहुँचकर रुका, ड्राइवर ने दरवाज़ा खोला, और वो बैठने से पहले एक बार मुड़ा।
“अंकुश जी,” उसने आवाज़ ऊँची करके कहा, “जवाब जल्दी देना। मैं इंतज़ार नहीं करता। मगर तुम्हारा करूँगा।”
गाड़ी चली गई।
और गली ने साँस ली।
एक साथ। इतनी ज़ोर से कि मुझे लगा पीपल का पेड़ भी हिल गया। भोला भाई ने पेचकस निकाला, फिर जेब में डाला, फिर निकाला। शबनम आपा ने थाली उठाई और गुमटी में रख दी। मीरा ने कैमरा बंद किया और अपना माथा उस पर टिका दिया।
“उफ़,” उसने कहा।
और तभी टिंकू बोला।
“उस्ताद?”
“हाँ?”
“उस नौकरी में टॉफ़ी मुफ़्त मिलेगी क्या?”
गली हँस पड़ी।
मैं भी हँसा। सच में हँसा, वो हँसी जो डर के बाद आती है और जो डर से बड़ी होती है। शबनम आपा ने टिंकू का कान पकड़ा और कहा, “तेरे पेट में भूत बोलता है, टॉफ़ी नहीं बोलती।” टिंकू चीखा, “आपा, कान नहीं, कान के पीछे!” और गली में फिर से हँसी फैल गई।
पर मैं जानता था कि हँसी के पीछे एक चीज़ बैठी हुई थी, और वो मेरी मेज़ पर रखी थी — सफ़ेद लिफ़ाफ़ा।
पापा पहले से ही दुकान के अंदर आ गए थे। वो बिना कुछ कहे स्टूल खींचकर बैठ गए, सामने मेज़ पर लिफ़ाफ़ा पड़ा था, और वो उसे ऐसे देख रहे थे जैसे किसी जाने-पहचाने जानवर को देख रहे हों।
“पापा?”
“सुबह दस बजे क्या है?” उन्होंने पूछा।
मैं रुक गया।
“सभा है। चबूतरी पर।”
“तो इसका जवाब भी सुबह दस बजे ही माँगा जाएगा,” पापा ने धीरे से कहा। “ये आदमी गिनकर चलता है।”
वो उठे और दरवाज़ा बंद करने लगे।
“पापा, दिन है।”
“चार लोग आएँगे,” उन्होंने कहा। “इसको सिर्फ़ तीन को दिखाना है।”
तो दरवाज़ा बंद हुआ। मीरा, टिंकू, शबनम आपा, दुबे अंकल, भोला भाई अंदर। बाहर सानिया और गुड्डू पहरा देने लगे — उन दोनों को मैंने पहले कभी इतना खुश नहीं देखा, क्योंकि आख़िरकार उन्हें भी कोई असली काम मिला था।
मैंने लिफ़ाफ़ा उठाया।
हल्का था। बहुत हल्का। ऐसा हल्का जैसे अंदर कुछ न हो। मैंने किनारा फाड़ा, और मुझे लगा मेरे हाथ काँप रहे हैं और मुझे इस बात पर शर्म आई, क्योंकि जिस आदमी ने अँगूठा लगाया था उसका बेटा हूँ और मुझे काँपने की आदत नहीं है।
अंदर से दो काग़ज़ निकले।
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