The Mysterious Bell – Chapter 178
“अंकुश जी, अपनी दुकान दिखाइए। मैंने सुना है वहाँ चीज़ें अपने आप ठीक हो जाती हैं।”
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
गली पीछे खड़ी थी। सब — पापा, टिंकू, मीरा, शबनम आपा, दुबे अंकल, भोला भाई, उस्ताद, बुज़ुर्ग, बच्चे, दरवाज़ों में खड़ी औरतें।
सबने मुझे देखा।
और मेरे पीछे, मेरी ही दुकान का लकड़ी का बोर्ड, टेढ़ा टँगा हुआ, हवा में बहुत धीरे हिल रहा था।
॥
“तो?” रणवीर ने कहा। “दिखाइए ना।”
गली ने मेरी तरफ़ देखा। सबने। जैसे मैं कोई फ़ैसला लेने वाला आदमी हूँ और सब मेरे मुँह से जवाब सुनने को खड़े हैं। मेरी जेब में घंटी ठंडी पड़ी थी। बिना बजे बोलती नहीं, और मैं उसे बजाने वाला नहीं था। सामने खड़ा आदमी सफ़ेद कपड़े में था, जूते इतने साफ़ कि गली की धूल उन पर लगने से डर रही थी।
“चलिए,” मैंने कहा।
“कहाँ?”
“दुकान। आपने माँगा ना।”
वो मुस्कुराया। बहुत छोटी मुस्कान, जैसे कोई बड़ा आदमी बच्चे की बात पर मुस्कुराता है। मुझे वो मुस्कान अच्छी नहीं लगी। मुझे कोई भी चीज़ अच्छी नहीं लग रही थी उस वक़्त, पर मैं आगे बढ़ गया।
दुकान सिर्फ़ बीस कदम दूर थी। उन बीस कदमों में मैंने अपनी दुकान को पहली बार किसी और की नज़र से देखा।
टेढ़ा बोर्ड। नीचे की तरफ़ ज़ंग पकड़े हुए लोहे के कड़े। दरवाज़े पर लगी कील पर टँगा पुराना रूमाल, जिससे मैं हाथ पोंछता हूँ और जिसे धोने का वादा तीन महीने से कर रहा हूँ। अंदर से आती तेल और रबर की गंध। फ़र्श पर बिखरे छोटे पुर्ज़े, जिन्हें मैं रोज़ सोचता हूँ कि सँभाल लूँगा और रोज़ भूल जाता हूँ।
रणवीर दरवाज़े पर रुका। कद लंबा था, इसलिए उसे झुकना पड़ा। उसने बोर्ड को हाथ लगाकर थोड़ा सीधा किया, फिर हँसा।
“देखा, मैंने कहा था ना।”
“आप आज्ञा दें, अंदर आ जाएँ,” मैंने कहा। “बोर्ड ठीक करने का काम मेरा है, साहब। आपका नहीं।”
वो अंदर आया।
और मैं तुम्हें सच कहूँ, उसके अंदर आते ही दुकान बदल गई। दुकान छोटी थी, ये बात सच है। पर उस आदमी के साथ छोटी नहीं लग रही थी, बल्कि ऐसी लग रही थी जैसे किसी बड़ी चीज़ का छोटा-सा पर्दा उठ गया हो। हवा भारी हो गई। तेल की गंध कोई और गंध नहीं लग रही थी, किसी और की बनी हुई चीज़ की गंध लग रही थी। मैं जानता हूँ ये सुनने में पागलपन लगता है। पर तुम मान लो।
उसने पहले दीवार देखी।
दीवार पर औज़ार टँगे थे। पेचकस, रिंच, हथौड़ा, प्लायर, चाबियों का छल्ला, तार काटने वाला, रबर का पुराना टुकड़ा जो मैंने कभी फेंका नहीं। सब अपनी जगह पर, सब अपने हिसाब से। मेरे पापा कहते हैं कि औज़ार की जगह भूल गया तो औज़ार तुम्हें भूल जाएगा।
रणवीर ने सबसे ऊपर टँगी रिंच उतारी।
उसने हवा में घुमाया, वज़न नापा, फिर उसे ठीक वैसे ही पकड़ा जैसे मैं पकड़ता हूँ। अँगूठा ऊपर, उँगलियाँ नीचे। मैंने सोचा था कि ये आदमी औज़ार को ऐसे पकड़ेगा जैसे कोई साहब पकड़ता है, घड़ी की तरह। पर नहीं। उसने ठीक पकड़ा।
“अच्छा है,” उसने कहा।
“पुराना है, साहब।”
“पुराना अच्छा ही होता है।” उसने रिंच वापस टाँग दी, फिर बगल में टँगा पेचकस उतारा। “ये?”
“वो मेरे पापा का है।”
उसने रुककर पापा की तरफ़ देखा। पापा दरवाज़े के पास खड़े थे, हाथ जेब में, कमर झुकी हुई, चश्मा कान पर टेप से बँधा हुआ। उन्होंने रणवीर की आँख नहीं मिलाई, पर मुँह भी नहीं फेरा। बस वैसे खड़े रहे जैसे पुरानी दीवार खड़ी रहती है।
“शंकर जी,” रणवीर ने कहा, “आपके हाथ बहुत अच्छे थे। बहुत अच्छे। मुझे याद है।”
पापा ने कुछ नहीं कहा।
मेरे पेट में कुछ ऐसा हुआ जो अच्छा नहीं था। मैंने बीच में आकर कहा, “साहब, वो मेज़ पर रख दीजिए, गिर जाएगा।”
रणवीर ने पेचकस मेज़ पर रखा और अचानक मुड़कर मेरी तरफ़ देखा।
“तुम्हारे हाथ,” उसने कहा।
मैंने हाथ देखे। ग्रीस के निशान, नाखून के नीचे काली लकीरें, उँगली पर जला हुआ छोटा निशान, जो पंचर वाले टब में गरम रबर पकड़ते वक़्त लगा था।
“क्या है इनमें?”
“कुछ नहीं, साहब।”
“तुम जानते हो, आज शहर में कितने आदमी ऐसे हैं जो टूटी चीज़ देखकर उसे ठीक कर सकते हैं?” उसने कहा। “गिन लो। मैं गिन चुका हूँ। बहुत कम। और ऐसे हाथ जो टूटी चीज़ के साथ आदमी को भी ठीक कर दें — वो तो पूरे शहर में एक ही हैं।”
“आप बढ़ा-चढ़ा रहे हैं।”
“मैं बढ़ा-चढ़ा नहीं करता।” उसने मेज़ पर रखे पुराने बोल्ट को उठाया और उँगलियों में घुमाया। “मैं काम किए बिना किसी की तारीफ़ नहीं करता। यह मेरी आदत है।”
मुझे इस आदमी की बातें समझ नहीं आ रही थीं। जो आदमी मेरे पीछे पड़ा है, जो मेरी गली की ज़मीन लेना चाहता है, जिसके काग़ज़ों पर मेरे पापा ने अँगूठा लगाया — वो आदमी मेरे हाथों की तारीफ़ कर रहा था।
“साहब,” मैंने कहा, “आप आए क्यों हैं?”
वो मुस्कुराया और मेज़ के पास पड़ी स्टूल खींचकर बैठ गया। मेरी दुकान का स्टूल। मेरी दुकान में रणवीर भारद्वाज बैठा हुआ था और पूरी गली दरवाज़े के बाहर खड़ी थी, और कोई अंदर नहीं आ रहा था, और मैं अकेला उसके सामने खड़ा था।
“मैं एक बात कहने आया हूँ,” उसने कहा। “सुन लोगे?”
“सुन तो रहा हूँ।”
“तुम्हारी उम्र क्या है?”
“चौबीस।”
“चौबीस साल की उम्र में तुम यहाँ बैठकर पंचर लगाते हो,” उसने कहा। “मेरे यहाँ चौबीस साल के लड़के साइट पर पाँच-पाँच साल का तजुर्बा रखते हैं। यह ग़लत बात है, मुझे सही नहीं लगती।”
“मुझे सही लगती है।”
“क्योंकि तुम्हें पता नहीं कि सही क्या होता है।” उसने मेज़ पर बोल्ट वापस रखा। “मेरी मशीनें देखी हैं तुमने?”
“कौन सी मशीनें?”
“भारद्वाज भवन के पीछे वाला यार्ड। सीमेंट के पंप, कटर, मिक्सर, गाड़ियाँ, ग्राइंडर, दस-बारह बड़ी मशीनें, चालीस छोटी। कोई एक दिन टूटती है, तो काम तीन दिन रुकता है। तीन दिन का रुकना मेरा नुकसान नहीं है, वो उन मज़दूरों का नुकसान है जो उस दिन खाली बैठते हैं। और मेरा नुकसान तो उससे भी बड़ा होता है, पर चलो, वो बात छोड़ो।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
“स्नेह भाई नाम का एक आदमी था,” उसने कहा। “मेरा इंचार्ज। दस साल से था। पिछले महीने गुज़र गया। दिल का दौरा। अब वहाँ कोई भरोसे का आदमी नहीं है। एक लड़का है जो हिसाब जानता है, पर मशीन नहीं जानता। और एक है जो मशीन जानता है, पर ईमान नहीं जानता।”
वो रुका और मुझे देखने लगा।
“मुझे तुम्हारे जैसा आदमी चाहिए,” उसने कहा।
दुकान में एक पल के लिए बहुत शांत हो गई। मुझे अपने ही कानों पर यक़ीन नहीं हुआ।
“मैं मशीन जानता हूँ, साहब, ये आपने ठीक कहा। पर मैं अभी किसी का हरजाना नहीं बन रहा।”
“मैंने हरजाने की बात नहीं की। मैंने काम की बात की।” उसने आगे झुककर दोनों कोहनी घुटनों पर रख लिए। “महीने के पच्चीस हज़ार। बोनस अलग, जितने महीने मशीन एक दिन भी नहीं रुकी। रहने की जगह — भारद्वाज भवन के पीछे मेरे अपने फ़्लैट हैं, खाली पड़े हैं, एक तुम्हारे नाम। गाड़ी — एक छोटी गाड़ी, नई नहीं, पर अपनी।”
मेरा गला सूखने लगा।
ये वो पल था जब मुझे अपने आपसे झूठ बोलना पड़ा। मन ही मन। क्योंकि मेरे दिमाग़ में सबसे पहले जो चीज़ आई, वो ये नहीं थी कि ये आदमी मेरी गली छीन रहा है। सबसे पहले मेरे दिमाग़ में माँ आई।
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