The Mysterious Bell – Chapter 176
गाड़ी का पिछला दरवाज़ा खुला रहा और वो उतरा।
पहले उसके जूते दिखे। सफ़ेद, चमकते, इतने साफ़ कि गली की धूल को देखकर लगे कि वो खुद ही पीछे हट जाएगी। फिर सफ़ेद पायजामा दिखा, जिसकी नाली ज़मीन से बिल्कुल नहीं छू रही थी, और फिर सफ़ेद कुर्ता, जिस पर एक भी सिलवट नहीं थी।
वो पूरा उतरा।
लंबा था। मैंने सोचा था कि तस्वीरों में लंबा दिखता होगा। पर नहीं, वो सच में लंबा था, तस्वीरों से भी लंबा। कंधे चौड़े, हाथ आराम से किनारे पर टिके हुए, और सीना थोड़ा सा पीछे — जैसे अंदर से कोई कमान सीधी खींचकर रखी हो।
उसने चारों तरफ़ देखा।
बहुत धीरे देखा। जल्दबाज़ी में नहीं। जैसे कोई दुकानदार तराज़ू पर रखे हुए माल को नाप रहा हो। पीपल पर नज़र गई, चबूतरी पर गई, गुमटी पर गई, दुकानों के शटरों पर गई, और फिर छतों पर।
और फिर उसने हाथ जोड़ लिए।
सच में जोड़ लिए। दोनों हाथ, सीने के सामने, ठीक वैसे ही जैसे भारद्वाज भवन के बाहर लगी तस्वीर में जोड़े थे।
“राम-राम,” उसने कहा।
आवाज़ शांत थी। इतनी शांत कि मुझे लगा जैसे किसी ने पास में टीवी की आवाज़ धीमी कर दी हो।
“बंसी बाबा,” उसने कहा, चबूतरी के ऊपर देखकर। “रहमत बाबा।”
दोनों बुज़ुर्ग एक साथ सीधे हो गए। मैंने देखा — बंसी बाबा का हाथ जो पैंतालीस साल से कंधे पर रखने की जगह नहीं मिला था, वो आज खुद ही रहमत बाबा के कंधे की तरफ़ बढ़ गया और रुक गया।
“हाफ़िज़ साहब,” रणवीर ने कहा। “पंडित जी। इब्राहीम चाचा।”
वो नाम ले रहा था।
एक-एक नाम। बारी-बारी से। चबूतरी के हर बुज़ुर्ग का नाम, हर चेहरे पर ठीक उसकी तरफ़ देखकर। जैसे कोई परीक्षा से पहले रटा हुआ पाठ सुना रहा हो। और यही सबसे डरावनी बात थी — कि उसे सबके नाम पता थे।
मुझे तुमसे सच कहना है, अगर वो चिल्लाता, धमकाता, गली को खाली करने की बात करता, तो मुझे समझ आ जाता। शोर में आदमी का अंदाज़ा लग जाता है। पर यह आदमी चुपचाप नाम ले रहा था, और मेरी जेब में घंटी ठंडी हो रही थी, इतनी ठंडी कि मुझे अपनी जाँघ पर लगा हुआ लोहे का टुकड़ा महसूस हो रहा था।
मैंने कुछ नहीं कहा।
मैंने सिर्फ़ खड़े रहना चुना।
“शंकर भाई,” उसने कहा।
और मेरे अंदर कुछ ऐसा हुआ जो मैं शब्दों में नहीं कह सकता।
मैंने अपने पीछे देखा। पापा वहीं खड़े थे। मेरे बगल में, आधा कदम पीछे, जैसे हमेशा। हाथ के पीछे वो सफ़ेद निशान आज पहली बार मुझे इतनी दूर से भी दिख रहा था, जैसे उस रोशनी में वो खुद चमक रहा हो।
पापा ने जवाब नहीं दिया।
पर पापा ने नज़र नहीं चुराई। यह मायने रखता है। पाँच साल बाद पहली बार पापा ने उस आदमी से आँख मिलाई, और आँख नीची नहीं की।
बस यही होता है। आदमी चुप रहकर भी बहुत कुछ बोल जाता है।
“मैं झगड़ा करने नहीं आया,” रणवीर ने कहा, और उसने गली की तरफ़ हाथ फैलाया, बिल्कुल वैसे जैसे कोई मेज़बान अपने घर का दरवाज़ा दिखाता है। “मैं आज सिर्फ़ अपना मोहल्ला देखने आया हूँ। इतनी बुरी खबरें सुन रखी थीं कि मन नहीं माना। सोचा, खुद चलकर देख आऊँ।”
“बुरी खबरें?” यह शबनम आपा की आवाज़ थी, गुमटी के दरवाज़े से, लाल नोक वाली चिमटी हाथ में। “कौन सी खबरें, साहब?”
“यही कि इस गली के लोग मिलकर कुछ नहीं करते,” उसने कहा, और मुस्कुराया। “पर मैं आया और देखा — इतने सारे लोग बाहर हैं। इतने सारे दरवाज़े खुले हैं। यह तो अच्छी खबर है।”
मेरी जेब में घंटी और ठंडी हो गई।
मुझे लगा जैसे कोई मेरी जेब में बर्फ़ का टुकड़ा रखकर चला गया हो।
वो आगे बढ़ा।
एक कदम। दो कदम।
और पूरी गली ने एक साथ साँस ली।
बच्चे पीपल के नीचे खड़े थे। टिंकू सबसे आगे था, घुटने पर पट्टी, लाल कवर वाली कॉपी छाती से लगी, और आँखें किसी भी वक़्त कुछ पूछने के लिए तैयार। उसके पीछे सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू। चारों ने दरवाज़े की तरफ़ देखा — भागने का रास्ता पहले नाप लिया, फिर आगे देखा।
रणवीर ने एक भी आदमी को नहीं डराया।
उसने बस अपनी जेब से एक डिब्बा निकाला।
चमकीला डिब्बा। छोटा, गोल, ऊपर चमकती पन्नी चढ़ी हुई। उसने ढक्कन खोला तो मुझे आज तक ऐसी खुशबू नहीं आई थी उस गली में — केसर और इलायची मिली हुई, इतनी मीठी कि लगा हवा में ही शक्कर घुल गई।
“अरे, यहाँ आओ,” उसने कहा, और टिंकू की तरफ़ नहीं, बच्चों की तरफ़ देखकर हाथ बढ़ाया। “कौन है तुम लोगों में सबसे बड़ा? तुम ही लो पहले।”
टिंकू ने हाथ आगे नहीं बढ़ाया।
उसने सीधा उस डिब्बे की तरफ़ देखा और कहा, “इसमें ज़हर तो नहीं है?”
गली में जो आवाज़ आई, वो हँसी नहीं थी। दम घुटने जैसी आवाज़ थी। शबनम आपा की चिमटी हवा में रुक गई। भोला भाई ने पेचकस कसकर पकड़ लिया। दुबे अंकल की कुर्सी का पैर पुरानी ईंट पर से खिसक गया।
मैंने सोचा, अब यह चेहरा बदलेगा।
अब इस आदमी की आँखों के नीचे वो चीज़ आएगी जो हर लालची आदमी की आँखों के नीचे आती है — गुस्सा।
पर वो हँसा।
ज़ोर से हँसा। सिर पीछे करके, गले से हँसा, इतना ज़ोर से कि उसका कंधा हिला। पूरी गली ने देखा। और यह हँसी उस मुस्कान से बिल्कुल अलग थी जो तस्वीरों में थी — यह हँसी असली थी, और यही बात सबसे ज़्यादा डरावनी थी।
“ज़हर!” उसने कहा, हँसते हुए आँख पोंछकर। “सुनो, इसे कहते हैं बुद्धि। इस गली में एक बच्चा भी बिना सोचे हाथ नहीं बढ़ाता।”
फिर उसने खुद डिब्बे से एक टॉफ़ी निकाली, ऊपर की पन्नी हटाई, और सीधे अपने मुँह में डाल ली।
वो चबाता रहा। देखता रहा। टिंकू को देखता रहा।
“देखो,” उसने कहा, मुँह में टॉफ़ी रखकर, “मैं ज़िंदा हूँ। और अगर मरा तो सारी गली गवाह है।”
टिंकू ने एक सेकंड सोचा।
फिर उसने हाथ बढ़ा दिया।
रणवीर ने उसकी हथेली पर टॉफ़ी रखी और उसके सिर पर हाथ फेरा — बहुत धीरे, बहुत सहज, जैसे वो इस काम को रोज़ करता हो।
और मैंने अपनी जेब में घंटी को और ठंडा होते महसूस किया।
क्योंकि मुझे पता था — भला आदमी टॉफ़ी देता है तो बच्चे खुश होते हैं। पर ऐसा आदमी टॉफ़ी देता है तो वो बच्चों को नहीं, उनके माँ-बाप को देख रहा होता है। वो देख रहा था कि कौन सी माँ आगे आती है, कौन सी माँ पीछे हटती है, किसका हाथ काँपता है, और किसकी आँख में डर है।
बच्चे टॉफ़ी लेते गए।
गुड्डू ने ली। रफ़ीक़ ने ली। चिंटू ने दो बार हाथ बढ़ाया और दोनों बार पीछे खींच लिया, फिर तीसरी बार ली और भागकर सानिया के पीछे छिप गया।
“तुम्हारा नाम?” रणवीर ने सानिया से पूछा।
“सानिया।”
“सानिया,” उसने दोहराया, जैसे नाम याद रखने की कोशिश कर रहा हो। “अच्छा नाम है।”
और सच कहूँ? वो याद रखेगा। वो याद रखने वालों में से है। यही उसका काम है।
मैंने बीच में आना चाहा।
मैंने सोचा — अगर मैं अभी कुछ बोलूँ, तो यह आदमी मुड़कर मुझसे बात करेगा और फिर सबका ध्यान बच्चों से हट जाएगा।
इसलिए मैं चुप रहा।
“रिकॉर्ड हो रहा है?” रणवीर ने अचानक कहा, और उसकी नज़र गुमटी के उस कोने पर गई जहाँ मीरा खड़ी थी।
मीरा का कैमरा तिपाई पर था। लाल बत्ती जल रही थी। वो कैमरे के पीछे खड़ी थी, आँखें झुकाए, होंठ कसे हुए, जैसे कोई शेर के सामने खड़ा हो और बंदूक नहीं हो।
वो डरी नहीं। मुझे यह कहना है — वो डरी नहीं। उसने कैमरे को नीचे नहीं किया।
“हाँ, साहब,” मीरा ने कहा। “रिकॉर्ड हो रहा है।”
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