The Mysterious Bell174 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 174

7 min read November 5, 2026

"बोलो," मैंने कहा।

"साहब कहते हैं कि दुकान ठीक चल रही है," बबलू ने कहा। "दो महीने से ठीक चली है। तुम मेहनती लड़के हो। साहब तुम्हारी मेहनत की क़द्र करते हैं।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"साहब कहते हैं," वो आगे बोला, "बोर्ड नया लगवा देंगे। लोहे का। पक्का। शटर भी नया। और नए बाज़ार में एक जगह — बड़ी जगह। तुम वहाँ अपनी दुकान खोल लो। वहाँ गली से ज़्यादा ग्राहक आते हैं।"

"बबलू भाई," मैंने कहा, "साहब ने यह भी कहा कि बोर्ड मेरी दुकान पर टेढ़ा टँगा है?"

वो एक पल रुका।

"नहीं," उसने कहा। "वो नहीं कहा।"

"तो यह भी बताओ," मैंने कहा, "मेरी दुकान का बोर्ड टेढ़ा है, पर उस पर लिखा सीधा है। समझे?"

बबलू ने मुझे देखा और उसके चेहरे पर पहली बार कुछ ऐसा आया जो मैंने उस पर पहले कभी नहीं देखा था। थकान।

"अंकुश भाई," उसने कहा। "मैं सुबह से यही संदेश लेकर घूम रहा हूँ। एक बार सुन लो।"

"सुन रहा हूँ।"

उसने काग़ज़ आगे बढ़ाया।

"यह काग़ज़ है," उसने कहा। "इसे साइन कर दो। बस एक लाइन है। नाम, तारीख़, और बस।"

मैंने काग़ज़ नहीं उठाया। उसे देखा। मोटा काग़ज़ था, ऊपर नीली मोहर थी, नीचे स्याही की एक गोली जैसी खाली जगह थी — वही जगह, वही गोली, वही खाली जगह जो नीलामी के नोटिस पर थी और अतिक्रमण की चिट्ठी पर थी।

"इसमें क्या लिखा है?" मैंने पूछा।

"यही लिखा है," उसने कहा, "कि तुम्हारी दुकान तुम्हारी रहेगी। गली के लोग शांति से रहेंगे। अस्पताल के पास का काम रुक जाएगा। और बाकी सब पुरानी बातें —"

"पुरानी बातें?" मैंने कहा।

"हाँ," उसने कहा। "मतलब — नोटिस, सूची, वो चार चार अंगूठे — सब भूल जाओ। सब काग़ज़ पुराने हो जाएँगे। साहब कहते हैं, जो बीत गया सो बीत गया।"

"बबलू भाई," मैंने कहा, "मेरे पापा ने पाँच साल पहले एक कोरे काग़ज़ पर अंगूठा लगाया था। वो भी पुरानी बात हो गई।"

वो चुप हो गया।

"और भोला भाई ने पाँच साल पहले बारह हज़ार रुपये लिए थे," मैंने कहा। "वो भी पुरानी बात हो गई। और सनी ने चार महीने तक अपने बाप को यह बात नहीं बताई, वो भी पुरानी बात हो गई।"

"अंकुश भाई —"

"और तुम्हारी चेन?" मैंने कहा। "आज तुमने चेन नहीं पहनी। क्यों? क्या साहब ने कहा कि आज चेन वाली बात पुरानी है?"

बबलू ने काग़ज़ अपने सीने से सटा लिया, जैसे कोई ढाल हो।

फिर उसने वो बात कही जो वो सुबह नहीं कहता।

"साहब ने कहा है," उसने धीमी आवाज़ में कहा, "कि तुम्हारी माँ का पूरा इलाज साहब के खर्च पर होगा। बड़े अस्पताल में। भोपाल से बाहर भी, अगर ज़रूरत पड़े। जाँच, दवा, सब।"

गली में हवा भी रुक गई।

मैंने स्टूल की सींखचों पर अपनी उँगलियाँ कसीं। मुझे पता है उस वक़्त मेरा चेहरा कैसा रहा होगा, क्योंकि टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा और उसका मुँह खुला रह गया।

उस वक़्त मेरे दिमाग़ में क्या चल रहा था, बताता हूँ। मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगा।

मेरे दिमाग़ में डॉक्टर इसरानी का कमरा चल रहा था। ज़र्द दीवार। आधे पानी का गिलास। टूटा चश्मा। और उस दीवार पर बिना तारीख़ वाली एक तस्वीर, जिसमें एक औरत हँस रही थी।

मेरे दिमाग़ में माँ का फ्रिज चल रहा था, जिसमें उनकी दवा रखी थी, और जिसकी बिजली की केबल किसी ने पहले से काट रखी थी।

मेरे दिमाग़ में माँ की हिसाब की कॉपी का वो पिछला हिस्सा चल रहा था, जिसमें सात सौ इकहत्तर रुपये की लिफ़ाफ़ा दबा हुआ था और जिस पर लिखा था कि अगर जाँच में कुछ निकले तो लिफ़ाफ़ा काजल को देना, अंकुश को नहीं।

सात सौ इकहत्तर रुपये।

और सामने खड़ा आदमी पूरा अस्पताल खरीद रहा था।

मेरी साँस भारी हो रही थी। मैंने हाथ जेब में डाला और घंटी को हल्का-सा दबाया।

वो बजी। बहुत धीमी।

और उसने सिर्फ़ इतना कहा।

"यह काग़ज़ तुझे नहीं, तेरे घर को बाँधेगा।"

घंटी ने ऐसा कहा और चुप हो गई।

मैंने हाथ जेब से बाहर निकाला। मेरी उँगलियाँ अब साफ़ थीं। मुझे पता है यह अजीब लगेगा, पर उस वक़्त मुझे अपनी माँ की बीमारी से ज़्यादा एक चीज़ दिख रही थी — वो औरत जिसकी तस्वीर पर तारीख़ नहीं थी। अगर मैं आज यह काग़ज़ साइन कर देता, तो कल उस दीवार पर टाँगने के लिए एक और तस्वीर आती। और उस तस्वीर में बिना तारीख़ वाली औरत नहीं होती। उस तस्वीर में रणवीर भारद्वाज होता, हाथ जोड़े हुए, और नीचे लिखा होता — नई शुरुआत, नए सपने।

"बबलू भाई," मैंने कहा।

"हाँ।"

"यह काग़ज़ मेरी दुकान के बारे में है?"

"हाँ।"

"तो इसमें साइकिल गली का नाम क्यों लिखा है?"

उसने काग़ज़ की तरफ़ देखा। उसने पढ़ा नहीं। उसे पता था कि उसमें क्या लिखा है।

"यह बस एक लाइन है," उसने कहा। "काग़ज़ की भाषा होती है।"

"काग़ज़ की भाषा होती है," मैंने कहा। "और तुम्हारी भाषा? तुमने सुबह मेरी गर्दन पकड़ी थी। आज काग़ज़ पकड़ा रहे हो। दोनों में फ़र्क़ क्या है?"

"अंकुश —"

"बबलू भाई, मैं तुम्हारे साथ झगड़ा नहीं कर रहा," मैंने कहा। "मैं तुम्हें एक बात समझा रहा हूँ। आज तुमने चेन नहीं पहनी, क्योंकि आज तुम्हें पता है कि यह काग़ज़ माँगने आना चेन पहनकर नहीं आना है। आज तुम यह काग़ज़ ऐसे लाए हो जैसे कोई माफ़ी माँगने आया हो। पर यह माफ़ी नहीं है। यह वही काग़ज़ है जो सुबह शटर के नीचे पड़ा मिला था। बस आज यह तुम्हारे हाथ में है और तुम्हारी चेन उतर गई है।"

बबलू ने काग़ज़ नीचे कर लिया।

"मेरी बात सुनो," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो चीज़ नहीं थी जो धमकी देती है। उसकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो कोई घर छोड़कर भागते वक़्त कहता है। "मैं तुम्हें सिर्फ़ इतना कहता हूँ — सोच लो। सोचने में कोई पाप नहीं है।"

"मैंने सोच लिया," मैंने कहा।

"अभी नहीं। आज रात सोच लो।"

"मैंने सोच लिया, बबलू भाई," मैंने कहा। "जो काग़ज़ गली को तोड़ने के लिए आता है, उस पर मेरा नाम नहीं लगेगा। चाहे उस पर कितनी नीली मोहर हो, चाहे उसे कितने बड़े आदमी ने भेजा हो, चाहे उस काग़ज़ के साथ मेरी माँ का इलाज ही क्यों न बँधा हो, मेरा नाम नहीं लगेगा।"

मैंने उसका हाथ धीरे से नीचे किया। काग़ज़ को नहीं छुआ। सिर्फ़ उसका कलाई छुआ, इतना कि वो हाथ नीचे हो जाए।

"तुम साहब से कह दो," मैंने कहा, "कि मैं साइन नहीं करूँगा। पर एक और बात कहना — मैं साहब से मिलूँगा। कल नहीं। आज। जब वो चाहें, जहाँ वो चाहें। पर मैं अकेला नहीं आऊँगा।"

बबलू ने मेरी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर एक पल कुछ ऐसा आया, जैसे वो कुछ कहना चाहता हो और नहीं कह पा रहा हो।

तभी उसकी जेब में फोन बजा।

और मैंने वो देखा जो मैं कभी नहीं भूलूँगा।

बबलू ने फोन निकाला, स्क्रीन देखी, और दो कदम पीछे हट गया। नीचे आया नहीं। पीछे हट गया। ऐसे जैसे कोई बच्चा मास्टर के सामने खड़ा हो।

उसने फोन उठाया।

"जी साहब," उसने कहा। और उसकी आवाज़ अचानक छोटी हो गई थी। इतनी छोटी कि आज से पहले मैंने उसे ऐसी आवाज़ में नहीं सुना था। "जी साहब, बात कर ली। जी। पर साहब, वो कह रहे हैं कि वो अकेले नहीं —"

वो रुका। फोन पर कुछ कहा गया। लंबा नहीं, छोटा। बस कुछ शब्द।

और फिर बबलू ने वो कहा जिसके लिए शब्द हैं पर मुझे लगा जैसे गली में हर दरवाज़ा अपना कान बाहर निकाल रहा हो।

"जी साहब। गली के मुहाने पर। अभी।"

उसने फोन बंद किया।

उसने मेरी तरफ़ देखा। और उसकी आवाज़ में अब वो नौकर वाली चीज़ भी नहीं थी। बस थकान थी।

"साहब खुद आ रहे हैं," उसने कहा। "गली के मुहाने पर। अभी।"

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