The Mysterious Bell173 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 173

7 min read November 5, 2026

"बबलू भाई," मैंने कहा, "आज शाम तो निकल गई। अब रात है।"

वो एक पल चुप रहा। फिर बोला, "तो कल शाम। चार बजे। भारद्वाज भवन।"

"अकेले?" मैंने पूछा।

"अकेले," उसने कहा। "साहब ने साफ़ कहा है। कोई मीरा नहीं। कोई टिंकू नहीं। कोई बाप नहीं।"

मैं मुस्कुराया। मुझे पता है मुस्कुराना उस वक़्त अजीब लगता है, पर मैं मुस्कुराया।

"बबलू भाई," मैंने कहा, "जाकर साहब से कह दो — मैं अकेला नहीं आता।"

"साहब ने कहा है —"

"मैं जानता हूँ साहब ने क्या कहा है," मैंने कहा। "पर सुनो। मैं अकेला नहीं आता। मेरी गली साथ आएगी।"

वो चुप हो गया।

"गली?" उसने कहा। "पूरी गली?"

"पूरी गली," मैंने कहा। "जिनके पैर हैं वो पैदल आएँगे। जिनके पैर नहीं हैं वो कुर्सी पर आएँगे। जो बूढ़े हैं वो लाठी लेकर आएँगे। जो बच्चे हैं वो आगे चलेंगे। और हाँ — एक बात और। जो डरते हैं, वो भी आएँगे। सबसे आगे वही आएँगे।"

फ़ोन पर सन्नाटा।

फिर बबलू ने कुछ कहना चाहा, पर उसकी आवाज़ में वो चीज़ नहीं थी जो धमकी देती है। उसकी आवाज़ में वो चीज़ थी जिसे मैंने उस रात कभी नहीं सुना था — हड़बड़ाहट।

"मैं बात पहुँचा दूँगा," उसने कहा और फ़ोन काट दिया।

मैंने फ़ोन जेब में रखा।

मीरा ने सिर उठाया।

"क्या कहा?" उसने पूछा।

"साहब मिलना चाहते हैं," मैंने कहा। "अकेले।"

मीरा ने कुछ नहीं कहा। वो सिर्फ़ मेरी तरफ़ देखती रही।

"मैंने मना नहीं किया," मैंने कहा। "मैंने बस बता दिया कि मैं अकेला नहीं आऊँगा।"

पापा ने मेरी तरफ़ देखा। और उनका चेहरा वैसा ही था — कोई हँसी नहीं, कोई डाँट नहीं। बस एक छोटी-सी बात, जो उन्होंने बड़ी देर से कही।

"अब तू अकेला बोलता भी नहीं," उन्होंने कहा। "यही ठीक है।"

मैंने घंटी जेब से निकाली, उसे एक बार हल्का-सा दबाया, और वो बजी — पतली, साफ़, चाँदी जैसी आवाज़।

और मुझे लगा कि उस रात गली में सिर्फ़ दुकानें जागी थीं। दरवाज़े भी जागे थे।

कल सुबह दस बजे चबूतरी पर जो होगा, वो सभा नहीं होगी।

वो गली का अपना नाम पुकारना होगा।

और मैं उसमें अपना नाम भरूँगा — अपने हाथ से, अपनी आवाज़ से, और किसी के डर से नहीं।

॥

शाम छह बजे के बाद गली में एक अजीब चीज़ हुई। चीज़ कहना ठीक नहीं, पर उस वक़्त मुझे कोई और शब्द नहीं मिला। गली चुप नहीं हुई थी। गली ने बोलना बंद कर दिया था।

दोनों में फ़र्क़ होता है। चुप रहना आदमी का फ़ैसला होता है। बोलना बंद कर देना डर का काम होता है।

नाली का पानी बह रहा था, पर उसकी आवाज़ पहले जैसी नहीं थी। पीपल का पत्ता गिरा और मुझे लगा कि किसी ने दरवाज़ा बंद किया। शबनम आपा की केतली चढ़ी थी, पर सीटी नहीं बज रही थी। उस्ताद की मशीन की टिक-टिक भी उस शाम गायब थी। भोला भाई की दुकान का शटर आधा गिरा हुआ था, और वो आधा गिरा हुआ शटर ऐसे लटक रहा था जैसे किसी ने हिम्मत करके छोड़ दिया हो।

मैं अपनी दुकान के बाहर स्टूल पर बैठा था। पैर फैलाए, कोहनी घुटने पर, और हाथ में पीतल की घंटी।

मैं उसे बजा नहीं रहा था। बस उँगलियों में घुमा रहा था। जब घंटी घूमती है तो उसके अंदर की छोटी गोली खनकती है, बहुत धीमी, बहुत पतली, ऐसे जैसे कोई दूर किसी कमरे में चम्मच रख रहा हो।

तुम सोच रहे होगे कि शाम को स्टूल पर बैठकर घंटी घुमाना कैसा काम है। भाई, उस वक़्त मेरे पास इससे बेहतर कोई काम नहीं था। क्योंकि उस वक़्त गली में जो चल रहा था, वो मेरे औज़ारों से ठीक होने वाला नहीं था।

कल सुबह दस बजे चबूतरी पर सभा थी। दुबे अंकल की कुर्सी, भोला भाई की सच, सनी का आधा काग़ज़, चार अंगूठे, मीरा का कैमरा। सब तैयार था। और ठीक इसी शाम, चार बजे वाला बुलावा एक दिन आगे सरक गया था।

घंटी मेरी उँगली में ठंडी थी। मैंने उसे दबाया नहीं। पर मैं जानता था कि वो मेरे दबाने का इंतज़ार कर रही है। जैसे बूढ़ा कुत्ता दरवाज़े पर बैठा रहता है — भौंकता नहीं, बस देखता रहता है।

तभी टिंकू आया।

वो पीपल की जड़ से आया, घुटने पर पट्टी बाँधे, हाथ में लाल कवर वाली कॉपी। उसने मेरे सामने आकर एक पल मेरी घंटी देखी, फिर गली की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।

"उस्ताद," उसने कहा, "आज गली में कुछ अलग है।"

"हाँ," मैंने कहा। "आज गली ने नहाने की जगह इस्तेमाल की है।"

टिंकू ने मुझे घूरा। "क्या?"

"मतलब," मैंने कहा, "सब चुप हैं। यही अलग है।"

उसने अपनी कॉपी खोली। उसमें उसने कुछ लिखा हुआ था — माचिस की डिब्बी वाली तारीख़, नोटिस की दो गलतियाँ, नीली मोहर। उसकी लिखाई टेढ़ी थी, पर उसकी आँखें सीधी थीं।

"उस्ताद," उसने कहा, "भोला भाई के शटर पर आज कोई नोटिस नहीं आया।"

"तो?"

"तो इसका मतलब है कि आज वो काग़ज़ नहीं भेज रहे। आज वो कुछ और भेजेंगे।"

मैंने घंटी घुमाना रोक दिया।

अब सुनो, टिंकू तेरह साल का है और मुझे उससे यह बात पूछनी पड़ी। मुझे शर्म आनी चाहिए थी। आई भी। पर उस वक़्त मुझे उसकी बात सुननी थी।

"तू क्यों सोचता है ऐसा?" मैंने पूछा।

"क्योंकि उस्ताद," उसने कहा, "जब मास्टर जी मुझे बुलाते हैं, तो पहले कॉपी में मेरा नाम देखते हैं। और जिस दिन नाम नहीं देखते, उस दिन वो सीधे मेरे पास आते हैं।"

मैं कुछ नहीं बोला।

उस लड़के ने दो लाइन में वो बात कह दी जो मैं सुबह से सोच रहा था और नहीं कह पा रहा था।

उस्ताद अली बक्श अपनी दुकान के दरवाज़े पर आए। उनकी सिलाई मशीन की टिक-टिक उस शाम बंद थी, और मुझे यह पहली बार अजीब लगा। उन्होंने मोटा चश्मा नाक पर सरकाया, कान पर पेंसिल टिकाई और आसमान की तरफ़ देखा।

"हवा बदल गई," उन्होंने कहा।

"बारिश आएगी, उस्ताद?" टिंकू ने पूछा।

"बारिश नहीं," उस्ताद ने कहा। "कुछ और।"

फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "घंटी जेब में रख लो।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"दुकान के बाहर स्टूल पर बैठकर घंटी घुमाना अच्छा नहीं लगता," उन्होंने कहा। "कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जिन्हें दिखाना नहीं, बस रखना होता है।"

मैंने घंटी जेब में रखी। उन्होंने सिर हिलाया और अंदर चले गए।

पाँच मिनट बाद बबलू आया।

और मैं तुमसे कहता हूँ, जिस बबलू को मैं जानता था, वो यह नहीं था।

मैंने उसे सुबह देखा था — मोटी सोने की चेन, काले कोट में, पान चबाते हुए, गले में लॉकेट जो हिलने पर टिक-टिक करता था। आज वो गली में सिर्फ़ सफ़ेद कुर्ता पहनकर आया था। कुर्ता धुला हुआ था, पर इस्त्री किया हुआ नहीं। उसकी गर्दन खाली थी। गले में कुछ नहीं था, और खाली गर्दन उसे छोटा बना रही थी। उसके होंठों पर पान का लाल निशान नहीं था। उसके हाथ में पानदान नहीं था।

उसके हाथ खाली थे, सिवाय एक मोड़े हुए काग़ज़ के।

उसने स्टूल से दो कदम पहले आकर पैर रोके।

"अंकुश भाई," उसने कहा।

मैंने उसकी आवाज़ से पहले उसकी आँखें देखीं। आँखों में वो चीज़ नहीं थी जो सुबह थी। सुबह उसकी आँखों में चमक थी, वो चमक जो धमकी देने वाले आदमी की आँखों में होती है। आज उसकी आँखें सूजी हुई थीं। जैसे उसने रात भर नींद नहीं ली हो।

"बैठ जाओ, बबलू भाई," मैंने कहा। "स्टूल है।"

"नहीं," उसने कहा। "मैं बैठने नहीं आया।"

"पानी पी लो," मैंने कहा। "गर्मी है।"

"नहीं भाई।"

वो खड़ा रहा। स्टूल मेरे और उसके बीच में था, और वो उस स्टूल को ऐसे देख रहा था जैसे वो कोई सीमा हो। जिसे पार करना मना हो।

"साहब का संदेश है," उसने कहा।

मैंने घंटी को जेब में महसूस किया। ठंडी थी।

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