The Mysterious Bell – Chapter 172
पापा की आँखें भर आईं।
और मैंने देखा — पहली बार देखा — कि इंसान की आँखों में आँसू तब भी आ जाते हैं जब वो कोई बड़ी बात नहीं सुन रहा हो। कभी-कभी इंसान को बस इतना सुनना होता है कि उसे कुछ करने की ज़रूरत नहीं।
उन्होंने हाँ में सिर हिलाया।
बस सिर हिलाया। कोई शब्द नहीं। कोई आवाज़ नहीं। पर उनका सिर हिला — और मेरे पेट में जो गाँठ पाँच साल से बँधी थी, वो ज़रा ढीली हुई।
वो मेरे पीछे-पीछे अंदर आए।
कमरे में आते ही सब खड़े हो गए। भोला भाई फ़र्श से उठ गए। दुबे अंकल ने कुर्सी सरका दी।
पापा ने किसी की कुर्सी पर नहीं बैठना चाहा। वो चारपाई के पास ज़मीन पर बैठ गए। फिर उन्होंने वही पुराना पेचकस अपनी जेब में रखा और मेज़ के पैर को छूकर देखा — वो पैर हिल रहा था — और बिना किसी से कुछ कहे उसे ठीक करने लगे।
किसी ने कुछ नहीं कहा।
पर मुझे लगा कि उस रात के बाद पापा की चुप्पी का कोई और मतलब होगा। पहले वो चुप इसलिए थे कि वो कुछ छिपा रहे थे। अब वो चुप इसलिए थे कि वो कहीं बैठना चाहते थे। और चुप बैठना भी एक तरह का बोलना ही होता है।
दुबे अंकल ने अपनी कॉपी खोली।
"अब सुनो," उन्होंने कहा। "कल दस बजे चबूतरी। हमें यह नहीं भूलना कि सामने वाला भी तैयारी कर रहा है। कल सभा में क्या होगा, यह मैं नहीं बताऊँगा। पर इतना बताऊँगा कि किसके हाथ में क्या होगा।"
वो बोलने लगे, और उनकी आवाज़ ने वो रंग पकड़ा जो सिर्फ़ पुराने सिपाही की आवाज़ में होता है — न गुस्सा, न ढील, बस गिनती।
"मेरे पास नीली कॉपी है," उन्होंने कहा। "उसमें पच्चीस साल पुरानी लाइन लिखी है। मेरे पास एक पीला लिफ़ाफ़ा भी है, जिसमें सिर्फ़ एक तारीख़ है। वो मैं कल खोलूँगा। और मैं कल अपनी कुर्सी लेकर आऊँगा — क्योंकि जिस आदमी को बोलना है, उसे बैठने की जगह चाहिए होती है।"
"मेरे पास भोला भाई का कोरा काग़ज़ है," मीरा ने कहा। "जिस पर उन्होंने बिना पढ़े अंगूठा लगाया था। और उसकी बीवी के ऑपरेशन के तीन काग़ज़ भी हैं — तारीख़ हिस्सों में। और बबलू की धमकी की रिकॉर्डिंग है। पर कैमरा बंद रहेगा।"
"क्यों?" साइकिल पुर्ज़ों वाले भाई ने पहली बार अपनी आवाज़ में कोई सवाल डाला।
मीरा ने कहा, "क्योंकि कल के मंच पर कोई कैमरे के लिए नहीं बोलेगा। मैंने यह दो महीने में सीखा है। जिस दिन मैंने खबर के लिए किसी को बुलाया, उस दिन किसी की आवाज़ टूट गई। मैं वो गलती दोबारा नहीं करूँगी।"
"तो फिर सबूत?" भोला भाई ने कहा। "सबूत कैसे बनेगा?"
"सबूत हम बाद में जोड़ेंगे," मीरा ने कहा। "पहले आदमी जुड़ेगा। आदमी जुड़ा नहीं तो सबूत काग़ज़ का ढेर है।"
मैंने कहा, "टिंकू। तुम्हारे पास क्या है?"
"मेरे पास माचिस की डिब्बी है," उसने कहा, और उसे जेब से निकालकर ऊपर उठा दिया, जैसे कोई ट्रॉफ़ी हो। "जिस पर नोटिस की तारीख़ लिखी है। और मेरे पास एक और चीज़ है।"
"क्या?"
उसने कहा, "मैंने वो सब याद कर लिया है जो उस्ताद ने बोला था। तारीख़, मुहर, गवाह। मैं कल तीनों गिनूँगा। अगर कोई एक भी चीज़ छोड़ दे, मैं उठकर बोलूँगा।"
शबनम आपा ने कहा, "मेरे पास चिमटी है। और मेरे पास एक चीज़ और है — मैं गली की सबसे तेज़ ज़ुबान हूँ। कल जो आदमी बीच में बोलेगा, उससे पहले मैं बोलूँगी।"
"आपा," मैंने कहा, "आप बीच में नहीं बोलिए।"
"क्यों?"
"क्योंकि आप जब बोलती हैं, सब सुनते हैं," मैंने कहा। "और जब सब सुनते हैं, तो सब सिर्फ़ आपको सुनते हैं। कल हमें हर आदमी की आवाज़ चाहिए। आप अपनी आवाज़ बचाकर रखिए — उस पल के लिए जब सब डर जाएँ।"
शबनम आपा ने मुझे देखा। फिर उन्होंने कहा, "ठीक है। पर मैं उस पल को पहचान लूँगी। मुझे बताना नहीं पड़ेगा।"
"मुझे पता है," मैंने कहा।
भोला भाई ने कहा, "मेरे पास क्या है? मेरे पास सिर्फ़ एक कोरा काग़ज़ है और एक शर्म।"
"आपके पास आपका अंगूठा है," मैंने कहा। "और आपके पास सनी है।"
भोला भाई ने नीचे देखा। फिर उन्होंने कहा, "सनी कल आएगा। मैंने उससे कह दिया है। वो डर रहा था, पर उसने हाँ कर दी।"
"अच्छा किया," मैंने कहा।
"अच्छा नहीं किया," भोला भाई ने कहा, और उनकी आवाज़ टूटी। "मैंने उसे पाँच साल अकेला रखा। उसने चार महीने मेरी चुप्पी पहनी। और मैं उसे अच्छा किया कह रहा हूँ।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि कुछ जगहों पर चुप रहना सबसे ईमानदार जवाब होता है।
दुबे अंकल ने कहा, "अब एक आख़िरी बात। कल सभा में जो आदमी बोलेगा, वो अगर बीच में रुक जाए, तो उसे टोकना नहीं। सभा में सबसे बड़ी गलती यह होती है कि लोग बोलने वाले को बीच में टोक देते हैं। आदमी जब रुकता है, तो वो सोच रहा होता है। सोचने दो।"
मीरा ने कहा, "और अगर सामने वाला टोके?"
"सामने वाला टोकेगा," दुबे अंकल ने कहा। "वो टोकेगा, हँसेगा, पुरानी बात उछालेगा। हमें एक ही जवाब देना है।"
"क्या?" टिंकू ने पूछा।
"हाँ," दुबे अंकल ने कहा। "बस हाँ। जो वो कहे कि ये हुआ था — हम कहेंगे, हाँ, हुआ था। और अब माफ़ कर दिया। और बात ख़त्म।"
कमरे में सन्नाटा।
फिर मीरा ने धीरे से कहा, "यह सबसे मुश्किल काम है जो हम कल करेंगे।"
"क्यों?" टिंकू ने कहा।
"क्योंकि माफ़ी माँगने की जगह हर आदमी ढूँढ लेता है," मीरा ने कहा। "माफ़ करने की जगह कोई नहीं ढूँढता।"
मैंने घंटी हाथ में उठाई।
"घंटी," मैंने कहा, "कुछ कहना है?"
घंटी ने कहा — "डर बोल गया तो काग़ज़ हल्का हो गया।"
"और काग़ज़ हल्का हुआ तो?" मैंने कहा।
घंटी ने कहा — "दरवाज़ा हिला।"
उसके बाद घंटी चुप हो गई। पर इस बार उसकी चुप्पी वैसी नहीं थी। इस बार लगा जैसे उसने बात पूरी कर ली है और अब हमारी बारी है।
दुबे अंकल उठे। भोला भाई उठे। वो चारों लोग भी उठे — किराने वाले काका के बेटे, चूड़ी वाली बाई, रेडियो वाले बूढ़े और साइकिल पुर्ज़ों वाले भाई।
दरवाज़े पर जाते वक़्त रेडियो वाले बूढ़े ने रुककर कहा, "बेटा, मेरी लाठी का सिरा घिस गया है। कल मैं इसे बदलवा लूँगा। ऐसी लाठी लेकर मैं चबूतरी पर नहीं जाऊँगा।"
"काका," मैंने कहा, "लाठी नहीं बदलेगी। उसी से जाइएगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि वो घिसी हुई है," मैंने कहा। "और घिसी हुई लाठी बताती है कि आप बहुत दिन से खड़े हैं।"
वो हँसे। पहली बार उस रात।
जब वो चले गए, मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया। करीब आधी रात हो चुकी थी। टिंकू ट्रंक पर लेट गया था और उसकी आँखें अपने आप बंद हो रही थीं, और वो उन्हें ज़बरदस्ती खोल रहा था।
मीरा ने अपनी कॉपी खोली और उसमें कुछ लिखने लगी।
पापा मेज़ का पैर ठीक कर चुके थे। अब वो चुपचाप बैठे थे और मेरी तरफ़ नहीं देख रहे थे, पर मुझे पता था कि वो मुझे देख रहे हैं — बस आँखों से नहीं, पूरे शरीर से।
मैंने घंटी जेब में रखी।
तभी मेरा फ़ोन बजा।
उसकी घंटी वैसे ही बजती है — पुराने रेडियो की धुन जैसी। मैंने स्क्रीन देखी। नंबर नहीं था।
मैंने उठाया।
"अंकुश भाई," आवाज़ आई। बबलू पांडे। उसकी आवाज़ में आज वो चबाने की आवाज़ नहीं थी। आज उसकी आवाज़ साफ़ थी। और साफ़ आवाज़ ज़्यादा डरावनी होती है।
"बोलो, बबलू भाई," मैंने कहा।
"साहब तुमसे आज शाम मिलना चाहते हैं," उसने कहा। "अकेले।"
मैंने कमरे में देखा। टिंकू ट्रंक पर, आधा सोया हुआ। मीरा कॉपी पर झुकी हुई। पापा चुपचाप बैठे। बाहर गली में शबनम आपा की केतली की आवाज़ आ रही थी। कहीं दूर दुबे अंकल की कुर्सी का पैर फ़र्श पर टिक रहा था।
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