The Mysterious Bell – Chapter 171
"मैं नहीं आऊँगा," उन्होंने कहा। "मैं सिर्फ़ एक बात कहने आया हूँ। मेरे बाप का नाम उस काग़ज़ से हटा दो।"
कमरा चुप हुआ।
"बाप का नाम?" शबनम आपा ने कहा।
"बाप का नाम," उन्होंने कहा। "वो बूढ़े हैं। उन्हें नहीं पता कि उन्होंने किस काग़ज़ पर अंगूठा लगाया। अगर उन्हें पता चले कि उनका नाम किसी काग़ज़ पर है, तो वो रात को सो नहीं पाएँगे। और मेरे घर में सोने की जगह सिर्फ़ उनके लिए नहीं है। मेरे बच्चे भी उसी घर में सोते हैं।"
दूसरी आवाज़ आई — छोटी चूड़ी की दुकान वाली बाई। उम्र में कोई पचास के आसपास, दुबली, सिर पर दुपट्टा, हाथ में कुछ लाल धागे — जैसे वो आते-आते भी अपना काम छोड़कर नहीं आई हो।
"मेरी दुकान," उसने कहा। "मेरी दुकान में तीन आदमी बैठे रहते हैं, दिन भर। एक भी नहीं बोलता, बस बैठा रहता है। मैं जानती हूँ वो क्यों बैठते हैं। मुझसे कुछ नहीं कहते, पर मैं जानती हूँ। मेरा नाम हटा दो। मैं अकेली औरत हूँ।"
तीसरे रेडियो वाले बूढ़े थे। वो अपनी लाठी के सहारे खड़े थे और पहली बार मैंने देखा कि उनकी लाठी का निचला सिरा घिस गया है — इतना घिस गया कि लकड़ी नहीं, गोल पत्थर लगता है।
"मैं बूढ़ा हूँ," उन्होंने कहा। "मैं लड़ाई नहीं करूँगा। मैं सिर्फ़ अपनी दुकान चलाना चाहता हूँ। मेरी दुकान का नाम निकाल दो, बेटा। मेरी दुकान का भी।"
और चौथे — साइकिल के पुर्ज़ों वाली दुकान वाले भाई। उम्र में मुझसे ज़्यादा नहीं, कोई पच्चीस-छब्बीस। उन्होंने कुछ नहीं कहा। उन्होंने सिर्फ़ जेब से एक काग़ज़ निकाला, मेरी तरफ़ बढ़ाया, और हाथ वापस कर लिया।
मैंने काग़ज़ खोला।
उस पर लिखा था — मेरा नाम नहीं।
"भाई," मैंने कहा, "ये क्या है?"
"मैंने रात को लिखा," उन्होंने कहा। "मैं लिख नहीं सकता अच्छा, पर जो लिखा है वो पढ़ा जा सकता है। मेरा नाम नहीं चाहिए उस काग़ज़ पर।"
मीरा ने उन सबको देखा। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा। फिर वो बोली, और उसकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो अब तक नहीं थी — थकान।
"मैं सबको एक बात बताना चाहती हूँ," उसने कहा। "और मैं ऐसे बताऊँगी जैसे कल सुबह किसी वकील को बताती हूँ। ये काग़ज़ एक काग़ज़ नहीं है। ये एक सूची है। सूची में सात नाम हैं। अगर सात में से एक भी नाम पीछे हटता है, तो सामने वाले का वकील कहेगा — देखिए, इनके अपने लोग भी इस काग़ज़ को नहीं मानते। और जिस दिन ये बात एक बार कही गई, उस दिन बाक़ी छह नाम भी हिल जाएँगे। सूची की जान उसके नाम नहीं होते। सूची की जान उसकी गिनती होती है। गिनती टूटी, तो सूची टूटी।"
"तो क्या करें?" रेडियो वाले बूढ़े ने कहा। "जो डरता है, वो डरता है। डर को कोई मना कर सकता है क्या?"
"नहीं," मीरा ने कहा। "डर को मना नहीं किया जा सकता। पर डर को काग़ज़ से हटाया ज़रूर जा सकता है।"
कमरे में सन्नाटा।
मैंने उस सन्नाटे को दो सेकंड रहने दिया। अच्छा सन्नाटा लग रहा था। फिर मैं बोला।
"मैं किसी को नहीं खींचूँगा।"
सबने मेरी तरफ़ देखा।
"सुनो," मैंने कहा। "मैं तुम चारों से एक भी चीज़ के लिए नहीं कहूँगा कि तुम काग़ज़ पर अपना नाम लिखो या मत लिखो। कल दस बजे चबूतरी पर जो होगा, वो इस काग़ज़ से शुरू नहीं होगा। वो तुम्हारी आवाज़ से शुरू होगा। और मैं तुमसे एक ही बात कहूँगा — तुम काग़ज़ पर नाम मत लिखो। तुम सिर्फ़ सच बोलो।"
"सच बोलने से क्या होगा?" चूड़ी वाली बाई ने कहा।
"देखिए," मैंने कहा, "आपकी दुकान में तीन आदमी दिन भर बैठते हैं, और आप जानती हैं वो क्यों बैठते हैं। यही सच है। आप कल अगर चबूतरी पर खड़ी होकर सिर्फ़ इतना कह दें — मेरी दुकान पर तीन आदमी बैठते हैं और मैं डरती हूँ — तो ये काग़ज़ पर नाम लिखने से बड़ा सच है। क्योंकि काग़ज़ को कोई देख नहीं रहा। गली देख रही है।"
चूड़ी वाली बाई ने अपने हाथ में लिपटे लाल धागे को देखा।
"मैं डरती हूँ," उसने धीरे से कहा। "बस यही कहूँगी।"
"बहुत है," मैंने कहा।
किराने वाले काका के बेटे ने कहा, "और अगर मैं सिर्फ़ ये कहूँ कि मेरे बाप ने अंगूठा लगाया था और मुझे नहीं पता था?"
"तो भी बहुत है," मैंने कहा।
रेडियो वाले बूढ़े ने अपनी लाठी को ज़मीन पर दो बार टिकाया। फिर उन्होंने कहा, "मैं इतना कहूँगा कि मैं पिछले दो महीने से अपनी दुकान का शटर आधा गिराकर बैठता हूँ। और मैं किसी को नहीं बताता कि क्यों। मैं अब बताऊँगा।"
"तो ये हुआ," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो थकान हट गई थी। "पर एक बात साफ़ कर दूँ। तुम तीन लोग जो बोलोगे, वो काग़ज़ से कमज़ोर नहीं — काग़ज़ से अलग है। पर उसके लिए तुम्हें बोलना पड़ेगा। चुप रहकर कोई सच बड़ा नहीं होता।"
साइकिल पुर्ज़ों वाले भाई ने अब तक कुछ नहीं कहा था। वो खड़ा था, हाथ जेब में, आँखें ज़मीन पर।
"भाई," मैंने कहा। "तुम्हारी बारी।"
"मैं नहीं बोलूँगा," उन्होंने कहा।
"ठीक है," मैंने कहा।
"तुमने इतनी जल्दी हाँ क्यों कर दी?" उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में गुस्सा आ गया — वो गुस्सा जो डर के ऊपर पहनी जाने वाली शर्ट होती है।
"क्योंकि तुम्हारा हाथ काँप रहा है," मैंने कहा। "और काँपते हाथ से मैं कोई वादा नहीं लेता।"
वो चुप हो गए।
"पर एक बात सुन लो," मैंने कहा। "जिस दिन तुम बोल सको, उस दिन चबूतरी पर तुम्हारे लिए जगह खाली रखी होगी। खाली कुर्सी नहीं — जगह। मैं कुर्सी नहीं रखवाता, वो बात मुझे अच्छी नहीं लगती। पर जगह रहेगी।"
उन्होंने कुछ नहीं कहा। पर उनका हाथ जेब से बाहर आया और वो अपने दोनों हाथ पीछे बाँधकर खड़े हो गए — जैसे कोई सिपाही सुन रहा हो।
शबनम आपा ने केतली उठाई और तीन गिलास में चाय डाली। उन्होंने पहला गिलास दुबे अंकल को दिया, दूसरा भोला भाई को, तीसरा मीरा को।
"और मेरा?" मैंने कहा।
"तुम्हारा गिलास नहीं है," उन्होंने कहा। "तू बोलता ज़्यादा है, पीता कम है।"
टिंकू हँसा। उस हँसी में कमरे की हवा थोड़ी हल्की हुई।
तभी मैंने देखा।
दरवाज़े के बाहर, अंधेरे में, कोई खड़ा था।
मैं उठा और बाहर गया।
पापा खड़े थे।
वो दरवाज़े से तीन कदम दूर, दीवार के सहारे, हाथ में एक पुराना पेचकस पकड़े हुए। उन्होंने शर्ट नहीं बदली थी। चश्मा उसी टेप से बँधा था। और उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने बहुत कम देखी थी — बस एक बार, उस रात, जब उन्होंने साइकिल देखकर कहा था, इसे मत बेचना।
वो अंदर नहीं आ रहे थे।
मैं समझ गया क्यों। अंदर उन लोगों की बातें चल रही थीं जिन्होंने अंगूठा लगाया था। और वो खुद उसी काग़ज़ पर अंगूठा लगाने वाला आदमी थे। वो अंदर आते, तो लगता कि वो अपनी सफ़ाई देने आए हैं। और वो सफ़ाई नहीं देने आए थे। वो बस सुनना चाहते थे।
मैं उनके पास गया।
"पापा," मैंने कहा।
"मैं सुन रहा था," उन्होंने कहा। "मैं सुन रहा था कि तू किसी को ज़बरदस्ती नहीं खींच रहा।"
"नहीं खींच रहा," मैंने कहा।
उन्होंने सिर हिलाया।
"अंदर क्यों नहीं आ रहे?" मैंने पूछा।
उन्होंने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस पेचकस को एक हाथ से दूसरे हाथ में बदला। और मुझे लगा कि वो अंदर न आने की वजह नहीं बता पा रहे, क्योंकि वजह बताने के लिए उन्हें वो शब्द बोलना पड़ेगा जो वो पाँच साल से नहीं बोले — मैंने अंगूठा लगाया था।
"पापा," मैंने कहा। "आपको बोलने की ज़रूरत नहीं।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"आपको किसी को कुछ समझाने की ज़रूरत नहीं," मैंने कहा। "आपको काग़ज़ दिखाने की ज़रूरत नहीं। आपको किसी से माफ़ी माँगने की भी ज़रूरत नहीं — वो तो हम बाद में देखेंगे, जब आपका मन हो। बस मेरे साथ बैठ जाइए। बस इतना।"
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