The Mysterious Bell168 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 168

7 min read November 5, 2026

कमरा चुप हो गया।

फिर भोला भाई ने गिलास उठाया, उसमें चाय नहीं थी, बस ठंडी मलाई थी। उन्होंने उसे मेज़ पर वापस रख दिया।

"मेरा बेटा," उन्होंने कहा, "मुझसे नहीं बोलता। दो महीने से नहीं बोलता। घर आता है, खाना खाता है, सो जाता है। माँ से बोलता है, मुझसे नहीं।"

सनी कुछ नहीं बोला।

"मैंने सोचा," भोला भाई ने कहा, "कि मैं कुछ गलत किया है। पर मैंने यह नहीं सोचा कि वो मुझे कायर समझता है।"

"मैंने कब कहा?" सनी ने कहा। अचानक, तेज़। "मैंने कभी कुछ नहीं कहा।"

"कहने की ज़रूरत नहीं थी," भोला भाई ने कहा। "आँखें बोल रही थीं।"

"तो बात करो," सनी ने कहा।

"मैं कर ही रहा हूँ," भोला भाई ने कहा।

"दो महीने बाद," सनी ने कहा।

दोनों चुप हो गए।

मैंने सामने मेज़ पर रखी माचिस की डिब्बी उठाई और उसे अपनी उँगलियों में घुमाया।

"ठीक है," मैंने कहा। "बोलना मुश्किल है। मैं जानता हूँ। मगर सुनना और भी मुश्किल है। तो हम आसान चीज़ से शुरू करते हैं।"

मैंने भोला भाई की तरफ़ देखा।

"भोला भाई," मैंने कहा, "आज सुबह मैं और मीरा तुम्हारी दुकान पर आए थे, तुमने हमें कुछ बताया था। तुमने कहा था कि तुमने बारह हज़ार रुपये लिए थे बबलू से, बीवी के इलाज के लिए, और उसके बदले एक कोरे काग़ज़ पर अंगूठा लगा दिया था। यह बात सच है?"

भोला भाई ने सिर हिलाया।

"हाँ।"

"यह बात," मैंने कहा, "तुमने अपने बेटे से कही थी?"

भोला भाई ने सनी की तरफ़ देखा। सनी अभी भी दीवार की तरफ़ देख रहा था।

"ना," भोला भाई ने कहा। "मैंने नहीं कही।"

"क्यों?"

"क्योंकि मैं शर्मिंदा था," भोला भाई ने कहा। "मैंने सोचा… मैंने सोचा कि अगर मैं इसे बताऊँगा तो ये मुझे… मुझे…" उनकी आवाज़ फँस गई। "ये मुझसे घृणा करेगा।"

सनी ने दीवार से नज़र हटाई और बाप की तरफ़ देखा।

"तुमने," उसने धीरे से कहा, "मुझसे छिपाया?"

"हाँ।"

"दो महीने?"

"दो महीने से ज़्यादा। पाँच साल।"

सनी के चेहरे का रंग उड़ गया।

"पाँच साल?" उसने कहा।

भोला भाई ने सिर हिलाया।

"पाँच साल पहले," उन्होंने कहा, "जब तुम्हारी माँ की कमर की हड्डी घिसी थी और ऑपरेशन की बात आई थी, तब मैंने वो काग़ज़… वो कोरा काग़ज़… उसी साल अंगूठा लगाया था। फिर दो महीने पहले, जब वो बबलू फिर आया, तो उसने कहा कि अब साफ़-साफ़… कि अब साथ देना पड़ेगा। और साथ देने का मतलब था — थाने में गवाही। तुम्हें बताना था। तो मैंने नहीं बताया। और तुमने देखा कि मैं चुप हो गया। तुमने सोचा कि मैं कायर हूँ।"

"मैंने सोचा," सनी ने कहा, और उसकी आवाज़ का तार टूट गया, "कि तुम डर गए हो। मैंने सोचा कि पूरी गली लड़ रही है और मेरा बाप… मेरा बाप…"

"मेरा बाप," भोला भाई ने उसकी बात काट दी, "मेरा बाप भी कायर था। मुझे पता है। मेरे बाप ने भी एक बार ऐसा ही किया था। मैंने उसे कोसा था। मैंने कहा था — बापू, तुम क्यों नहीं लड़े? और वो चुप रहे थे। मैंने उनसे दो साल बात नहीं की थी। फिर वो मरे। और मुझे पता चला कि वो क्यों चुप थे।"

कमरे में सिर्फ़ लालटेन की आवाज़ थी — धीमी, साँस जैसी।

सनी की आँखें भर आईं।

"तुमने," उसने कहा, "मुझे कभी नहीं बताया कि दादा के साथ भी…"

"क्योंकि मैं वही था," भोला भाई ने कहा। "मैं वही बाप था जिससे मैंने नफ़रत की थी। और मैं तुम्हें अपनी नफ़रत नहीं देना चाहता था।"

सनी ने अपना मुँह हाथों से ढँक लिया।

मैंने उनके बीच में कुछ नहीं कहा। कुछ देर तक सिर्फ़ लालटेन और उनकी साँसों की आवाज़ रही।

फिर सनी ने हाथ नीचे किए। उसकी आँखें लाल थीं, पर आवाज़ अब टूटी नहीं थी, बल्कि साफ़ थी, जैसे कोई तय कर ले कि अब रोना नहीं है।

"मुझे भी एक सच्ची बात कहनी है," उसने कहा।

मैंने सिर हिलाया।

"मुझे पता था," सनी ने कहा। "मुझे पता था कि तुमने अंगूठा लगाया है।"

भोला भाई ने सिर झटके से उठाया।

"क्या?"

"मुझे पता था," सनी ने कहा। "चार महीने पहले, मैं साहब के दफ़्तर में सीमेंट ढोने गया था। मैंने बबलू को एक काग़ज़ पर अंगूठा लगवाते देखा — किसी और का, बूढ़े काका का। मैंने वो काग़ज़ देखा। और मैंने उसमें तुम्हारा नाम भी पढ़ा — उस सूची में, जिसमें अंगूठे वालों के नाम हैं।"

भोला भाई के हाथ काँपने लगे।

"तुमने," उन्होंने कहा, "और मुझसे कुछ नहीं कहा?"

"मैंने कहना चाहा," सनी ने कहा, और उसकी आवाज़ फिर टूटी, "पर मैं शर्म से मर रहा था। मैं शर्म से मर रहा था क्योंकि जिस दिन मैंने वो काग़ज़ देखा, उस दिन मैंने तुमसे बात नहीं की। मैंने सोचा कि कहूँगा तो तुम टूट जाओगे। और मैं… मैं तुम्हें टूटता नहीं देख सकता था।"

"तो तुमने सोचा," भोला भाई ने धीरे से कहा, "कि चुप रहकर तुम मुझे बचा रहे हो?"

"मैंने सोचा था," सनी ने कहा। "पर मैं बचा नहीं रहा था। मैं खुद डर रहा था। मैं डर रहा था कि कहीं साहब को पता चल जाए कि मैं उस काग़ज़ को पढ़ चुका हूँ। मैं डर रहा था कि मेरी नौकरी जाएगी। और सबसे ज़्यादा, मैं डर रहा था कि तुम्हें पता चलेगा कि मैं डर रहा था।"

उसने अपना सिर झुका लिया।

"मुझे माफ़ कर दो, बाबा," उसने कहा। "मैंने तुम्हें कायर समझा। और मैं खुद उससे बड़ा कायर था।"

फिर जो हुआ, वो मैंने कभी नहीं देखा था।

भोला भाई उठे। वो मेज़ के उस पार गए, अपने बेटे के पास। उन्होंने उसका सिर पकड़ा और उसे अपने कंधे पर रख लिया।

सनी ने अपने हाथ बाप की कमर पर रखे और फूट-फूटकर रोने लगा। भोला भाई रो रहे थे, पर उनकी आवाज़ नहीं निकली। सिर्फ़ उनके कंधे हिल रहे थे, और उनकी उँगलियाँ सनी के बालों में उलझी हुई थीं।

मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली। वो चुप थी, ठंडी थी। मैंने उसे फेरा।

घंटी ने धीरे से कहा — "यह जोड़ छोटा नहीं है। यह सच्चा है।"

फिर वो कुछ देर चुप रही। और फिर बोली — "बीस अंक।"

मैंने काग़ज़ का एक पुराना टुकड़ा निकाला और उस पर मन में हिसाब लगाया। मेरे पास एक सौ अठारह थे। अब एक सौ अठारह और बीस, कुल एक सौ अड़तीस। पहला अंक अब भी बाकी था। पर आज मुझे उसकी चिंता नहीं थी। आज मुझे इस कमरे से बाहर जाना था और माँ को देखना था। पर मैं उठा नहीं।

मैंने उन्हें कुछ देर ऐसे ही रहने दिया। कभी-कभी सबसे बड़ा काम यही होता है — चुप बैठकर इंतज़ार करना।

फिर भोला भाई ने अपने बेटे का सिर धीरे से उठाया। उन्होंने अपनी जेब से एक पुराना, फटा रूमाल निकाला और सनी का चेहरा पोंछा। सनी बैठ गया।

"अंकुश," भोला भाई ने कहा, और अब उनकी आवाज़ कुछ और थी, जैसे कोई बहुत दिनों से प्यासा हो और पानी पीकर बैठा हो, "अब क्या?"

"अब," मैंने कहा, "काग़ज़। तुम्हारे पास जो भी है, सब कल सभा में देना। पर सिर्फ़ काग़ज़ नहीं। तुम्हें खुद बोलना होगा। तुम्हारी आवाज़ ही सबूत है। काग़ज़ काग़ज़ है। तुम्हारी आवाज़ — वो लोहा है।"

भोला भाई ने सिर हिलाया।

"मैं बोलूँगा," उन्होंने कहा। "अगर आवाज़ फँसेगी भी, तो काग़ज़ मेरे हाथ में होगा।"

"अच्छा।"

मैं उठने लगा, तभी सनी बोला।

"अंकुश भाई।"

मैं रुका।

उसने अपनी शर्ट की जेब में हाथ डाला। वो जेब फटी हुई थी, पर अंदर से उसने एक काग़ज़ का टुकड़ा निकाला। बहुत पुराना, बहुत फटा, किसी मोड़ से कटा हुआ, किसी जेब की धूल से सना हुआ।

"यह क्या है?" मैंने पूछा।

"यह," सनी ने कहा, और उसकी आवाज़ में डर था, "मैंने चार महीने पहले साहब के दफ़्तर से उठाया था। मैं वहाँ सीमेंट ढोता हूँ। मैंने वो काग़ज़ सिर्फ़ इसलिए उठाया था कि मुझे डर लगा — मैंने सोचा कि कहीं साहब मेरा नाम भी किसी काग़ज़ पर न लिखवा दे।"

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho