The Mysterious Bell – Chapter 169
उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया।
मैंने उसे उँगलियों में पकड़ा। वो सूखा था, पर अंदर से भारी।
"इस पर क्या है?" मैंने पूछा।
"मैंने पढ़ा नहीं," सनी ने कहा। "मैं पढ़ नहीं पाया। डर गया था। जब मैंने उसे उठाया, तो मैंने सिर्फ़ इतना देखा कि उसमें तारीख़ें हैं। बहुत सारी तारीख़ें। और नाम। पर मैंने पढ़ा नहीं। मैंने उसे मोड़कर जेब में रख लिया। और फिर मैं उसे भूल गया।"
"पर तुमने उसे फेंका नहीं," मैंने कहा।
"ना।"
"क्यों?"
"क्योंकि," सनी ने कहा, "जिस दिन मैं उसे फेंकने लगा, उस दिन मुझे लगा कि यह काग़ज़ किसी का है। जिसका है, वो मर रहा है इसके बिना। मैं उसे नहीं फेंक पाया।"
मैंने काग़ज़ खोला।
वो फटा था, आधा था, सिर्फ़ एक कोना। उस पर नीली स्याही में कुछ लिखा था। पंक्तियाँ थीं, संख्याओं जैसी, और कुछ शब्द — "दफ़्तर", "बक्सा", "चाबी", "बीस दिन", "नाम". ऊपर एक मुहर का आधा हिस्सा छपा था, जिसके अक्षर कटे हुए थे, पर मुझे मोहर पहचानी आई — वही नीली गोल मोहर। भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की।
मैंने उसे ध्यान से देखा।
"सनी," मैंने कहा, "यह काग़ज़ अधूरा है। बाक़ी कहाँ है?"
सनी ने मेरी आँखों में देखा। उसकी आँखें अब भी लाल थीं, पर अंदर कुछ जम गया था।
"अंकुश भाई," उसने धीरे से कहा, "साहब के दफ़्तर में एक बक्सा है। मैंने उसे एक बार देखा था — एक कोने में, नीले कपड़े से ढका हुआ। मैंने एक बार — बस एक बार — देखा था। मैं चार महीने में उस दफ़्तर में कई बार गया, पर वो बक्सा एक ही जगह रहा। हर बार वही कपड़ा, वही ताला, वही धूल।"
"धूल?" मैंने कहा।
"हाँ," सनी ने कहा। "धूल। पूरे दफ़्तर में कोई धूल नहीं, पर उस बक्से पर हमेशा धूल रहती है। जानबूझकर नहीं साफ़ की जाती।"
"क्यों?"
"क्योंकि," सनी ने कहा, "उसे कोई छूता नहीं।"
भोला भाई ने उसकी तरफ़ देखा।
"मैंने कभी नहीं देखा," उन्होंने कहा।
"आप दफ़्तर में उस तरफ़ नहीं गए," सनी ने कहा।
"कौन छूता नहीं?" मैंने पूछा।
सनी ने अपने होंठ भींचे।
"बबलू भी नहीं," उसने कहा।
कमरे में हवा रुक गई।
"आज मैंने देखा," सनी ने कहा, "बबलू उस कमरे से बाहर आया, और उसके हाथ काँप रहे थे। बबलू के हाथ — जो सबका गला पकड़ता है — काँप रहे थे। वो बाहर आकर सीढ़ी पर बैठ गया, और उसने अपना पानदान निकाला, और उसके हाथ से पान का बीड़ा गिर गया। गली में गिरा। और उसने उसे उठाया नहीं। उसने नया बनाया।"
मैंने घंटी को अपनी मुट्ठी में दबाया।
मुझे लगा कि घंटी ठंडी हो रही है।
"अंकुश भाई," सनी ने कहा, और अब उसकी आवाज़ में सिर्फ़ सच्चाई थी, "मैं जानता हूँ कि यह काग़ज़ किसी काम का नहीं। यह सिर्फ़ एक टुकड़ा है। पर मैंने यह इसलिए नहीं रखा कि मुझे कोई बड़ा सच पता था। मैंने यह इसलिए रखा कि मुझे पता था — किसी दिन, किसी को, कुछ तो देना होगा। और आज वो दिन है।"
मैंने काग़ज़ उससे लिया।
"यह टुकड़ा," मैंने कहा, "किसी दिन बड़ा काग़ज़ बनेगा।"
सनी ने कुछ नहीं कहा। बस सिर झुका लिया।
फिर मैंने काग़ज़ अपनी जेब में रखा और उठा। मेरे पीछे, दरवाज़े के बाहर, पापा और मीरा खड़े थे। मीरा के हाथ में कैमरा था, पर वो बंद था। पापा लालटेन के पीछे खड़े थे, चुप।
"भोला भाई," मैंने कहा, "कल सुबह दस बजे, चबूतरी। तुम्हारी कुर्सी रखी होगी।"
"मैं आऊँगा," भोला भाई ने कहा।
"और सनी?"
सनी ने सिर उठाया।
"मैं भी आऊँगा," उसने कहा। "मैं उस सूची के बारे में बोलूँगा, जो मैंने देखी थी। मैं बबलू के दफ़्तर के बारे में बोलूँगा। जो मैं जानता हूँ, सब।"
भोला भाई ने अपने बेटे के कंधे पर हाथ रखा। और सनी ने अपना हाथ उनकी कमर पर रखा।
दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे, और मुझे लगा कि मैंने पाँच साल से बंद एक कमरे का दरवाज़ा खुलते देखा है।
मैं बाहर निकला।
मीरा मेरे साथ चली।
"अंकुश," उसने धीरे से कहा, जब हम दुकान से थोड़ा दूर आए, "तुमने कुछ किया। उनके अंदर कुछ टूटा।"
"मैंने कुछ नहीं किया," मैंने कहा। "मैं बस बैठा। उन्होंने खुद किया।"
"तुम ऐसा हर बार कहते हो," उसने कहा।
"क्योंकि हर बार ऐसा ही होता है," मैंने कहा।
हम पीपल के पास पहुँचे।
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली।
"घंटी," मैंने कहा, "सनी ने जो काग़ज़ दिया, वो क्या है?"
घंटी कुछ देर चुप रही। फिर बोली — "काग़ज़ नहीं। दरवाज़ा।"
"किसका?"
"जिसका नाम उस पर नहीं लिखा," घंटी ने कहा। "फिर भी वो उसका है।"
"कौन?"
घंटी ने कोई जवाब नहीं दिया।
"घंटी," मैंने फिर कहा, "बक्सा किसका है?"
घंटी ने धीरे से कहा — "उसका। जो तुम्हारे नाम की जगह भरेगा।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"मतलब?"
"उस बक्से के अंदर," घंटी ने कहा, "वो रखा है जो तुम्हें तुम्हारे घर से जोड़ता है।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
वो पीपल के नीचे खड़े थे, उनका चेहरा लालटेन की रोशनी में आधा रोशन, आधा अंधेरे में। उनके हाथ में वो पीतल का टुकड़ा था। वो मेरी तरफ़ देख रहे थे, और उनकी आँखों में एक नई चीज़ थी — डर नहीं। इंतज़ार। जैसे कोई पच्चीस साल से किसी दरवाज़े के बाहर खड़ा हो और अब अंदर जाने का वक़्त आ गया हो।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
"पापा," मैंने कहा, "यह काग़ज़ देखिए।"
उन्होंने काग़ज़ पकड़ा।
उनकी उँगलियाँ उस पर रुकीं। उन्होंने उसे लालटेन के नीचे किया। उन्होंने उस फटे कोने को देखा, उस नीली मोहर को देखा, उन पंक्तियों को देखा।
और फिर पापा ने कुछ कहा, बहुत धीरे से, जैसे कोई खुद से बोल रहा हो।
"यह मेरा काग़ज़ नहीं है," उन्होंने कहा। "यह उसका है। यह उस काग़ज़ का आधा हिस्सा है, जिसे मैंने अंगूठा लगाने वाले दिन उस मेज़ पर देखा था।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"यह वो काग़ज़ है," पापा ने कहा, "जिसे वो तीसरा आदमी चमकते जूतों वाले अंधेरे कोने से लेकर आया था।"
मेरी साँस रुक गई।
"और उस काग़ज़ के बाक़ी हिस्से," उन्होंने कहा, "उस बक्से में हैं जो कोई नहीं छूता।"
रात की हवा चली।
मैंने घंटी फिर बजाई।
घंटी ने कहा — "अब तुम जान गए। अब देर मत करो।"
मैंने पीपल के नीचे खड़े बुज़ुर्गों को देखा — बंसी बाबा, रहमत बाबा। चबूतरी पर हाफ़िज़ बाबा और पंडित जी। शबनम आपा की गुमटी की तरफ़ से लालटेन की रोशनी। दुबे अंकल की कुर्सी पर बैठे।
और मुझे लगा कि आज रात गली सो नहीं रही। गली जाग रही है।
"कल सुबह," मैंने चारों तरफ़ देखते हुए कहा, "दस बजे। चबूतरी। हर आदमी अपना काग़ज़ लेकर आएगा। हर आदमी अपनी आवाज़ लेकर आएगा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तुमने सभी को नहीं बताया," उसने कहा। "तुमने यह नहीं बताया कि कुछ बक्से का भी है जो हमें खोलना है।"
"क्योंकि वो मैं खुद खोलूँगा," मैंने कहा।
"कैसे?"
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "पर मुझे इतना पता है — अगर वो बक्सा उसके दफ़्तर में है, तो मुझे उस दफ़्तर में जाना पड़ेगा।"
मीरा ने सिर हिलाया।
"मैं साथ चलूँगी," उसने कहा।
"तुम्हारे पास कैमरा है," मैंने कहा।
"कैमरा," उसने कहा, "अभी नहीं। अभी मैं सिर्फ़ आँखें हूँ। कैमरा बाद में आएगा।"
मैंने घंटी को जेब में रखा।
पीपल के नीचे, चबूतरी की तरफ़ से, टिंकू की आवाज़ आई।
"उस्ताद!" वो दौड़ता हुआ आया। उसके घुटने की पट्टी ढीली हो रही थी, चश्मा नहीं था, हाथ में माचिस की डिब्बी थी। "उस्ताद!" वो लालटेन के नीचे आया और रुका। "बबलू की सफ़ेद गाड़ी फिर आई। मोड़ पर रुकी। पर इस बार कोई नहीं उतरा।"
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