The Mysterious Bell167 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 167

7 min read November 5, 2026

उन्होंने एक काग़ज़ की तरफ़ इशारा किया।

"यहाँ नाम की जगह खाली है," उन्होंने कहा। "क्यों? क्योंकि जब वो जगह भरेगा, तब उसे पता होगा कि उसने किसे पकड़ा है। अभी वो इंतज़ार कर रहा है। अभी वो देख रहा है — कौन घबराता है, कौन शटर गिराता है, कौन भागता है। जो सबसे पहले घबराएगा, उसका नाम उस जगह भरा जाएगा।"

मेरे पेट में ठंड उतर गई। जैसे कोई बर्फ़ का टुकड़ा सीधे नाभि पर रख दे।

"तो हमें क्या करना चाहिए?" मैंने पूछा।

उस्ताद ने काग़ज़ उठाया। उन्होंने उसे मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"लड़ना है," उन्होंने कहा, "तो यह मत पूछो कि इसमें क्या लिखा है। यह पूछो — इसमें किसका नाम भरा जाना था।"

कमरे में सन्नाटा।

मीरा ने धीरे से कहा, "किसका नाम?"

उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा।

"हाँ," उन्होंने कहा। "हर काग़ज़ जो खाली नाम के साथ आता है, वो किसी का नाम लेकर आता है। बस उसने उसे अपने पास रखा है। वो नाम किसी ऐसे आदमी का है जिसने कुछ किया है। जो डरा है। जो चुप है। जो गली में बैठा है और सोच रहा है कि कोई उसे देख नहीं रहा। वो नाम ढूँढो। वो नाम मिल गया, तो यह काग़ज़ काग़ज़ नहीं रहेगा। यह बन जाएगा — उसका अपना अंगूठा।"

मैंने काग़ज़ पकड़ा।

मेरे हाथ में काग़ज़ था, पर मुझे लगा कि मेरे हाथ में एक ज़िंदा चीज़ है। जो साँस ले रही है। जो मेरी तरफ़ देख रही है। जो कह रही है — अब तुम बताओ, मेरे अंदर किसका नाम भरा जाएगा।

मीरा ने दोनों काग़ज़ फिर पास-पास किए।

और उसकी उँगली फिर उसी जगह रुकी।

"अंकुश," उसने कहा।

उसकी आवाज़ बदल गई थी। वो टिप्पणी करने वाली आवाज़ नहीं थी। वो पत्रकार की आवाज़ नहीं थी। वो ऐसी आवाज़ थी जो खुद को रोक रही हो।

"क्या?" मैंने कहा।

उसने नीलामी के नोटिस को उठाया। उसने उसे लैंप के नीचे किया।

"इसमें सूची है," उसने कहा। "जिन जगहों की नीलामी होनी है, उनकी सूची। मैंने इसे पहले पढ़ा था, पर मैंने नंबर नहीं देखे। मैंने सिर्फ़ नाम देखे थे।"

उसने अपनी उँगली उस सूची पर रखी और नीचे सरकाई।

"एक। दो। तीन। चार। पाँच। छह।"

उसकी उँगली रुकी।

"सात," उसने कहा।

वो ऊपर देखने लगी।

"अंकुश," उसने कहा, "सात नंबर की सूची में तुम्हारी दुकान है।"

मैं हिला नहीं।

"और," उसने कहा, और उसकी आवाज़ और धीमी हो गई, "सात नंबर की तारीख़ कल है।"

दुकान के बाहर सिलाई मशीन की आवाज़ आई। टिक। टिक। टिक।

उस्ताद ने अपनी सुई उठाई। उन्होंने उसे हवा में रखा। फिर उन्होंने उसे मेज़ पर रख दिया, बहुत धीरे से, जैसे कोई आख़िरी टाँका लगा रहा हो।

"तो," उन्होंने कहा, "अब तुम जान गए कि नाम की जगह किसके लिए खाली है।"

मैंने काग़ज़ को देखा।

उस खाली जगह को देखा।

और मुझे लगा कि वो जगह मेरी तरफ़ देख रही है। बहुत देर से। बहुत चुपचाप।

॥

काग़ज़ हाथ में लेकर मैं उस्ताद की दुकान से निकला तो बाहर की हवा बदली हुई थी। शाम ढल रही थी और गली की मिट्टी में वो ठंडक आ रही थी जो बारिश से पहले आती है। पीपल के पत्ते बिना हवा के भी हिल रहे थे, जैसे कोई उन्हें अंदर से झिंझोड़ रहा हो।

मीरा मेरे पीछे आई और उसने अपना कैमरा बैग कंधे पर ठीक किया।

"तुम ऐसे चल रहे हो," उसने कहा, "जैसे पैरों में चप्पल नहीं, किसी का नाम बँधा हुआ है।"

"नाम नहीं," मैंने कहा। "तारीख़ बँधी हुई है। कल की। और उस तारीख़ में मेरी दुकान सातवें नंबर पर है। मतलब उन्होंने तय कर लिया है कि कहाँ से शुरू करना है।"

पापा मेरे साथ चल रहे थे, चुप। उनके हाथ में वो पीतल का टुकड़ा था जो उन्होंने सुबह मेरी मुट्ठी से निकालकर अपनी जेब में रख लिया था। वो अब भी उनकी जेब में था, पर उनकी उँगलियाँ उस पर बनी हुई थीं, जैसे कोई घर से निकलते वक़्त चौखट को छू लेता है।

"अंकुश," मीरा ने धीरे से कहा, "तुम्हें याद है उस्ताद ने क्या कहा था? जो सबसे पहले घबराएगा, उसका नाम उस जगह भरा जाएगा।"

"हाँ।"

"तो उस जगह तुम्हारा नाम नहीं भरा जाएगा," उसने कहा। "क्योंकि तुम घबरा नहीं रहे। तुम गुस्सा हो रहे हो। ये दोनों अलग चीज़ें हैं।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तुम पत्रकार हो," मैंने कहा। "तुम्हें ऐसी बातें कहनी चाहिए जो सबूत से साबित हों।"

"मैं पत्रकार हूँ," उसने कहा, "इसीलिए मैं जानती हूँ कि कौन सा आदमी टूटने वाला है और कौन सा आदमी टूटकर भी दूसरों को जोड़ देगा। तुम दूसरे वाले हो।"

हम गली के मोड़ पर पहुँचे। वहाँ से भोला भाई की दुकान दिखती थी — छोटी सी, टीन की छत, बाहर लोहे का एक टेबल जिस पर वो रेडियो और पंखे रखकर ठीक करते हैं। आज उस टेबल पर कुछ नहीं था। सिर्फ़ एक लालटेन जल रही थी, धीमी, और उसकी रोशनी में दुकान के अंदर दो लोग बैठे दिख रहे थे।

दो लोग, आमने-सामने, दोनों चुप।

मैंने पापा की तरफ़ देखा।

"तुम यहीं रुको," मैंने कहा। "मैं अंदर जाता हूँ। अगर भोला भाई बोले तो।"

पापा ने सिर हिलाया। मीरा ने कैमरा निकालना चाहा, पर मैंने हाथ से रोका।

"अभी नहीं," मैंने कहा। "अभी कोई रिकॉर्ड नहीं। अभी सिर्फ़ बात है।"

मैंने दुकान का पर्दा उठाया और अंदर गया।

दुकान के पीछे के हिस्से में एक छोटा कमरा था, जहाँ भोला भाई चारपाई पर बैठते थे और घर का हिसाब रखते थे। वहाँ एक लकड़ी का मेज़ था, एक टूटी कुर्सी, और दीवार पर एक पुराना कैलेंडर जिस पर साल गलत छपा हुआ था। उसी कमरे में आज तीन लोग नहीं, दो लोग थे — भोला भाई, और उनका बेटा सनी।

सनी उम्र में अठारह-उन्नीस का होगा। पतला, लंबा, हाथों पर सीमेंट के धब्बे, काले रंग की आधी बाँह की शर्ट जिसके किनारे फटे हुए थे। वो आमने-सामने बैठा था, पर आँखें नीची किए हुए। भोला भाई भी नीची आँखों से बैठे थे। दोनों के बीच में एक चाय का गिलास रखा था, जो ठंडा हो चुका था और उस पर मलाई की परत जम गई थी।

मेरे अंदर आने पर भोला भाई ने सिर उठाया।

"अंकुश," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ सूखी थी, "बैठो।"

मैंने कुर्सी खींची और दोनों के बीच नहीं, बल्कि उनसे थोड़ा हटकर बैठा। जब लोग झगड़ा कर रहे होते हैं, तो बीच में बैठना सबसे बड़ी गलती होती है। बीच में बैठो तो दोनों तुम्हें अपना हथियार समझते हैं। मैं दोनों के सामने बैठा, जैसे कोई पुराना दोस्त बैठता है जो बहाने से आया हो।

"चाय?" भोला भाई ने पूछा।

"ना," मैंने कहा। "मैं चाय पीने नहीं आया।"

सनी ने पहली बार सिर उठाया। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने बहुत लोगों में देखी थी — डर, जो गुस्से के पीछे छिपा होता है। जैसे कोई बच्चा रोने से पहले शरारत करता है।

"तो क्यों आए हो?" उसने पूछा। उसकी आवाज़ में कड़वाहट थी।

"आया हूँ," मैंने कहा, "क्योंकि कल दस बजे एक सभा है। और इस गली में जिस-जिस ने किसी के काग़ज़ पर अंगूठा लगाया है, उसे आज रात अपनी बात खुद सुननी पड़ेगी। कल सुनने का मौका नहीं मिलेगा। कल जो बोलेगा, उसे कोई सुनेगा। जो चुप रहेगा, वो हमेशा के लिए चुप हो जाएगा।"

भोला भाई ने गिलास की तरफ़ देखा। सनी ने दीवार पर टँगे गलत साल वाले कैलेंडर की तरफ़।

"मैं जादू नहीं करूँगा," मैंने कहा। "मैं तुम्हें ठीक नहीं करूँगा। मैं कुछ भी नहीं करूँगा। आज रात बस एक नियम है — कोई झूठ नहीं। न तुम, भोला भाई। न तुम, सनी। जो बीता है, बीता है। आज हर आदमी एक सच्ची बात कहेगा। बस एक। एक सच्ची बात, और वो भी अपने दिल से, अपने मुँह से।"

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