The Mysterious Bell – Chapter 163
"अंकुश," उसने धीरे से कहा। "यह तारीख़ देख।"
मैं गया। तारीख़ वहाँ छोटी सी छपी थी।
"यह तारीख़ कल की है," मीरा ने कहा।
वो मेरी तरफ़ देख रही थी, और उसकी आँखों में जो था वो डर नहीं था। वो गुस्सा था। पत्रकार का गुस्सा।
मैंने काग़ज़ फिर देखा। नया, साफ़, चिकना। कोई मोड़, कोई धूल, कोई पुराना निशान नहीं।
"और नीचे देख," मीरा ने कहा। "हस्ताक्षर।"
मैंने नीचे देखा। नीचे एक हस्ताक्षर था, बारीक, साफ़, आदत में पड़ी हुई स्याही से।
चंद्रेश सक्सेना।
मुझे लगा गुमटी की लाइट एक पल के लिए धीमी हो गई।
"चंद्रेश," मैंने कहा। "वकील।"
"हाँ," मीरा ने कहा। "वकील।"
"वकील अतिक्रमण नहीं हटाता," मैंने कहा।
"नहीं हटाता," मीरा ने कहा। "वकील काग़ज़ बनाता है। हटाने का काम कोई और करता है।"
टिंकू काग़ज़ के ऊपर झुक गया। उसने अपनी उँगली से तारीख़ के अक्षरों को छुआ और फिर उसने उसे इतनी देर तक देखा कि मुझे लगा वो कुछ गिन रहा है।
"उस्ताद," उसने कहा।
"हाँ।"
"यह काग़ज़ आज का नहीं है।"
"मतलब?"
"कल का है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ बड़ी साफ़ थी। "यानी जाल है।"
गुमटी पर सब चुप हो गए।
"समझाओ," दुबे अंकल ने कहा। उन्होंने चाय रख दी थी।
टिंकू ने एक साँस ली। उसके हाथ काँप रहे थे, पर आवाज़ नहीं।
"जो नोटिस आज दी जाती है," उसने कहा, "उस पर आज की तारीख़ होती है। यह काग़ज़ नया है — देखिए, किनारा साफ़ है, कोई मोड़ नहीं, कोई धूल नहीं। पर इस पर कल की तारीख़ छपी है। इसका मतलब यह काग़ज़ कल बना था। आज सिर्फ़ गिरा दिया गया।"
"और अगर कल बना था," मीरा ने कहा, "तो जो अड़तालीस घंटे लिखे हैं, उसमें से चौबीस घंटे पहले ही बीत चुके।"
मैंने काग़ज़ फिर उठाया।
"अड़तालीस घंटे," मैंने कहा। "और इसमें से एक पूरा दिन इन्होंने चुपचाप चुरा लिया। हमें पता भी नहीं चला। बढ़िया खेल है। डर के साथ घड़ी भी बेच देते हैं।"
दुबे अंकल ने कुर्सी पर पीछे टेक लगाई।
"और एक बात," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर गुमटी के हर कोने तक पहुँची। "नोटिस तीन तरह से आती है। हाथ में देकर, पंचनामा करके, या रसीद पर अंगूठा लेकर। जो काग़ज़ शटर के नीचे से आया, वो नोटिस नहीं होता। वो चिट्ठी होती है। और चिट्ठी का कोई गवाह नहीं होता।"
"और काग़ज़ का गवाह ही उसकी जान होता है," मीरा ने कहा।
"हाँ," दुबे अंकल ने कहा। "जिस काग़ज़ पर मुहर नहीं, रसीद नहीं, गवाह नहीं — वो काग़ज़ है भी या नहीं, यह भी सवाल है।"
मैंने नोटिस को उलटा किया। पीछे सिर्फ़ सफ़ेदी थी। ऊपर कोई मुहर नहीं थी।
"मुहर नहीं है," मैंने कहा। "कोई नगरपालिका की मुहर नहीं। कोई विभाग का नाम नहीं। सिर्फ़ नीचे एक वकील का नाम।"
भोला भाई ने अपना मुँह हाथ से ढक लिया।
"तो मतलब," वो धीमे से बोले, "यह सरकार का नहीं है?"
"यह सरकार का नहीं है, भोला भाई," मैंने कहा। "यह साहब का है। और साहब ने इसे वकील के हाथ से भेजा है, ताकि हम काग़ज़ देखकर डर जाएँ और बोलना बंद कर दें।"
मैंने जेब में हाथ डाला और घंटी को हल्का दबाया। वो ठंवो ठंडी थी। ऐसी ठंडी नहीं जैसे बर्फ़, और ऐसी भी नहीं जैसे पानी। ऐसी ठंडी — जैसे कोई आदमी अभी-अभी कोई बहुत बड़ी बात सुनकर साँस रोक बैठा हो, और साँस छोड़ना भूल गया हो।
मैंने उँगली घंटी पर टिकाई रखी। एक पल। दो पल। तीन। कुछ नहीं।
"कुछ बोली?" मीरा ने धीरे से पूछा। वो मेरे बगल में खड़ी थी और उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि सिर्फ़ मैं सुन सकता था।
"नहीं," मैंने कहा। "चुप है।"
"पूरी तरह?"
"पूरी तरह नहीं। ऐसी चुप है, जैसे सब सुन रही हो और जवाब नहीं दे रही। जैसे किसी ने उसका मुँह पकड़ लिया हो।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वही सवाल था जो मेरे अंदर घूम रहा था — किसने पकड़ा?
मैंने हाथ जेब से बाहर निकाला। उँगलियाँ हल्की ठंडी थीं, जैसे किसी ठंडे लोहे को छूकर आई हों।
मैंने काग़ज़ फिर उठाया। पीला काग़ज़, बल्कुल नया, बिल्कुल साफ़। जैसे अभी छपकर आया हो।
"गली वालो," मैंने आवाज़ उठाई। गुमटी पर बैठे सब लोग मेरी तरफ़ देखने लगे। कुछ खड़े थे, कुछ बेंच पर बैठे थे, कुछ बाहर सड़क पर खड़े थे। "जो लोग अंदर आ सकते हैं, आ जाइए। जो नहीं आ सकते, कान लगा दीजिए। बात सबकी है।"
मीरा ने मेरी बाँह हल्की दबाई। "नाटक मत कर," उसने फुसफुसाया।
"नाटक नहीं कर रहा," मैंने कहा। "सच सबको पता होना चाहिए। और सच अगर सबको एक साथ पता चले, तो उसका डर कम होता है।"
फिर मैंने काग़ज़ सबके सामने पकड़ा।
"यह काग़ज़," मैंने कहा, "कहता है कि मेरी दुकान पर अतिक्रमण है। यानी मैंने किसी की ज़मीन पर अपनी दुकान बैठा ली है। और मुझे अड़तालीस घंटे के अंदर यह अतिक्रमण हटाना है।"
भोला भाई फूट पड़े। "अड़तालीस घंटे? इतने में तो मैं इलाहाबाद भी नहीं पहुँच सकता, और ये दुकान हटाने की बात कर रहे हैं?"
"इसीलिए तो यह काग़ज़ है और हम नहीं," मैंने कहा। "काग़ज़ को जल्दी होती है। इंसान को नहीं।"
फिर मैं हँसा।
मैं हँसा और गुमटी की हवा बदल गई।
"अरे भाई," मैंने कहा, "ज़रा सोचो तो। मेरी दुकान। मेरी दुकान इतनी छोटी है कि अगर इसमें अतिक्रमण भी आएगा, तो तिरछा ही आएगा। सीधा आने की जगह ही नहीं है। मेरी दुकान में एक ट्रंक है, एक स्टूल है, और जब टिंकू आ जाता है तो जगह नहीं बचती। इसमें अतिक्रमण आएगा तो कहाँ फिट होगा भाई?"
किसी ने कुछ नहीं कहा। एक सेकंड। दो सेकंड।
फिर टिंकू हँसा। छोटी-सी हँसी, जो उसने जल्दी से रोक ली, जैसे डाँट के डर से।
और फिर शबनम आपा हँसीं।
वो ऐसे हँसीं कि गुमटी की छत तक आवाज़ गई। उनके हाथ में चिमटी थी और उन्होंने उसे उठाकर हवा में घुमाया जैसे कोई झंडा घुमा रहा हो।
"सही कहा रे," उन्होंने कहा। "तेरी दुकान में अतिक्रमण आएगा तो बाहर की तरफ़ ही आएगा। आएगा क्या, पहले उसे तेरी दुकान में घुसने की जगह तो मिलेगी!"
गुमटी में हँसी फैल गई। दुबे अंकल मुस्कुराए। उस्ताद अली बक्श ने चश्मे के पीछे से कुछ बुदबुदाया जो हँसी जैसा था। भोला भाई की आँखें अभी भी बड़ी थीं, पर उनके कंधे थोड़े ढीले हो गए थे।
पर मेरी हँसी जल्दी खत्म हो गई।
क्योंकि हँसी डर को ढकने के लिए होती है। सच को नहीं बदलती।
मैंने काग़ज़ फिर उठाया और उसे गुमटी के बल्ब के नीचे किया।
मीरा मेरे कंधे के ऊपर से झाँकने लगी।
"रुको," उसने कहा। "काग़ज़ नीचे करो। बल्ब के ठीक नीचे।"
मैंने किया।
उसने काग़ज़ को करीब से देखा। उसकी आँखें सिकुड़ीं। उसने उँगली से काग़ज़ के ऊपर वाली लाइन को छुआ, फिर नीचे वाली लाइन को, फिर किनारे को।
"यह तारीख़ देखो," उसने कहा। "कल की है।"
"कल की?" दुबे अंकल ने कहा। वो अपनी कुर्सी पर सीधे हो गए।
"कल की," मीरा ने दोहराया। "और नीचे… यह देखो। चंद्रेश सक्सेना। वकील।"
मैंने काग़ज़ अपने हाथ में लिया। चंद्रेश सक्सेना। वो नाम मैंने पहले कहीं देखा था। हाँ। नीलामी के नोटिस पर। फिर पीछे की गली में, उस सफ़ेद कुर्ते वाले दफ़्तर में।
"वही चंद्रेश," मीरा ने कहा, जैसे मेरा दिमाग़ पढ़ रही हो। "जिसने नीलामी का नोटिस बनवाया। जिसने डॉक्टर इसरानी को लालच दिया।"
गुमटी में चुप्पी छा गई। वो चुप्पी जो हँसी के बाद आती है, और ज़्यादा भारी होती है।
"तो इसका मतलब," दुबे अंकल ने कहा, "यह काग़ज़ वकील साहब ने बनवाया है?"
"और साहब ने भेजा है," मीरा ने कहा।
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