The Mysterious Bell162 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 162

7 min read November 5, 2026

टिंकू चुप हो गया। और उस चुप्पी में वो चीज़ थी जो आज तक उसकी आँखों में नहीं दिखी थी — भरोसा।

हम दुकान की तरफ़ चले। शटर खुला था। बोर्ड टेढ़ा टँगा था। और अंदर, पीछे के कमरे में, बल्ब गुनगुना रहा था, जैसे कोई बूढ़ा आदमी बैठकर अपने आप से कोई पुरानी धुन गा रहा हो।

मैंने दरवाज़े से अंदर देखा। सब कुछ वैसा ही था — औज़ार, ट्रंक, ग्रीस, चारपाई, और लोहे की अलमारी।

पर मुझे ऐसा लगा जैसे आज रात वहाँ कुछ और भी रखा है।

कुछ ऐसा जो नहीं देखा जा सकता, पर महसूस होता है।

आज रात बबलू का फोन बजा था और उसने कहा था — जी साहब, अभी बताता हूँ।

उस साहब का चेहरा मैंने आज तक नहीं देखा था।

पर आज रात मुझे लगा कि वो मुझे देख रहा है।

और सच कहूँ तो यह पहली बार था कि मुझे अपनी घंटी से ज़्यादा अपने दोनों हाथों की ज़रूरत महसूस हुई।

॥

गुमटी की लाइट पीली थी। उसके नीचे धुआँ ऐसे लटक रहा था जैसे कोई बूढ़ा आदमी बैठकर अपनी ही साँस को देख रहा हो। शबनम आपा के तवे पर समोसे कराह रहे थे और तेल की आवाज़ गली की सबसे पुरानी घड़ी जैसी लग रही थी। टिक। टिक। टिक।

मैं बेंच पर बैठा था। मेरे बगल में टिंकू, और सामने दीवार से टेक लगाए मीरा खड़ी थी। उसका कैमरा आज बंद था। उसने वादा निभाया था, और मुझे अच्छा लगा कि वादा निभाने के लिए मैंने उसे एक बार भी याद नहीं दिलाया।

आठ बज रहे थे।

गली की हवा में वो बात थी जो बारिश से पहले होती है। सब कुछ सूखा दिखता है, पर हर चीज़ के अंदर नमी आ जाती है। दरवाज़े खुले थे, पर लोग दरवाज़ों की आड़ से झाँक रहे थे। कोई भी पहले नहीं आ रहा था।

पहले उस्ताद अली बक्श आए।

धीरे चलते हुए आए, हाथ में लाठी, कान पर पेंसिल, और उँगली में अपनी दुकान की सिलाई मशीन का ताला लटकाए हुए। मैंने देखा और मुझे हँसी आ गई।

"उस्ताद, ताला क्यों?"

"मशीन अकेली सो जाती है," उन्होंने कहा। "आज रात उसे साथ लाया हूँ।"

वो बेंच के सिरे पर बैठ गए। उनका चश्मा आज भी टेप से बँधा था और चश्मे के पीछे उनकी आँखें गुमटी की लाइट में दो छोटे दीये जैसी जल रही थीं।

उनके पीछे बंसी बाबा और रहमत बाबा आए।

दोनों साथ आए थे। यही देखने लायक बात थी। पैंतालीस साल तक जो दो आदमी एक ही चबूतरी पर बैठकर आँख नहीं मिलाते थे, वो आज एक ही लाठी पर हाथ रखकर चल रहे थे।

"हमें बुलाया होता तो हम पहले आते," रहमत बाबा ने कहा।

"आपको बुलाने की ज़रूरत ही नहीं थी," मैंने कहा। "आप दोनों को देखकर लग रहा है कि आज मीटिंग में एक जोड़ा तो पहले से ही आ चुका है।"

बंसी बाबा हँसे। उनकी हँसी में दाँत कम थे और अपनापन ज़्यादा।

इसके बाद हाफ़िज़ निसार अहमद और पंडित ब्रजकिशोर आए। ये भी साथ। ये भी उसी हिसाब से। हाफ़िज़ बाबा की तस्बीह हाथ में थी और पंडित जी का गमछा कंधे पर।

"चाय पीनी है," पंडित जी ने कहा। "और फिर जो कहना हो कहो।"

शबनम आपा ने दोनों को गिलास बढ़ाए और बिना पूछे हाफ़िज़ बाबा के गिलास में चीनी कम डाली। मैंने पूछा कैसे पता, तो उन्होंने कहा, "पचास साल से इनके यहाँ काम करती हूँ न, तेरे जैसा नया नहीं हूँ।"

फिर बच्चे आए। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू। चारों एक साथ, दौड़ते हुए, आधे रास्ते में रुककर एक-दूसरे को धक्का देते हुए।

"उस्ताद!" सानिया ने कहा। "सफ़ेद गाड़ी!"

मेरा हाथ अपने आप जेब की तरफ़ गया।

"कब?"

"अभी। गली के मोड़ पर आई, रुकी, दरवाज़ा नहीं खुला, और फिर चली गई।"

"कितनी देर रुकी?"

गुड्डू ने उँगलियाँ गिनकर बताया, "इतनी देर। जितनी देर में मैं तीन बार उँगली पर खड़ा हो जाता हूँ।"

"मतलब बहुत कम," मैंने कहा।

"मतलब बहुत कम," गुड्डू ने दोहराया, जैसे यह उसने खुद खोजा हो।

चिंटू ने मेरी आस्तीन खींची। "उस्ताद, अगर दुकान हट गई तो पंचर कौन करेगा?"

मैं एक पल के लिए चुप हो गया। बच्चे कभी-कभी सबसे सीधा सवाल पूछते हैं, और सीधे सवाल ही सबसे ज़्यादा चुभते हैं।

"पंचर कौन करेगा," मैंने कहा, "यह तो तय है कि मैं करूँगा। दुकान का पता बदल सकता है, हाथ नहीं।"

चिंटू संतुष्ट नहीं हुआ, पर बैठ गया। उसने अपने घुटने पर पट्टी देखी और फिर शबनम आपा के तवे की तरफ़ देखने लगा।

अब दुबे अंकल आए।

जवान सिपाही उनकी कुर्सी उठाकर लाया और गुमटी के सामने रख दिया। दुबे अंकल बैठे, अपनी नीली कमीज़ की कॉलर ठीक की और बोले, "एक चाय सबके लिए, हिसाब मेरा।"

उन्होंने जेब से पैसे निकाले और गुमटी की उस पुरानी कटोरी में डाले। शबनम आपा ने कुछ नहीं कहा, सिर्फ़ देखकर सिर हिलाया।

फिर भोला भाई आए।

मैंने उन्हें दूर से ही पहचान लिया। इसलिए नहीं कि वो दिखते हैं, बल्कि इसलिए कि उनकी चाल में जो काँप थी, वो आवाज़ कर रही थी। वो आए, बेंच के पास खड़े रहे और कुछ नहीं बोले।

"भोला भाई, बैठिए।"

"अंकुश," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ गले के अंदर ही अटक गई।

उनके हाथ में एक लिफ़ाफ़ा था।

पीला।

मेरे पेट में कुछ ठंडा गया। मैं उस रंग से अब डरने लगा था। पीला काग़ज़, पीली मोहर, पीली नक़ल, पीली पट्टी — पिछले कुछ दिनों में हमारी गली में जो भी डर आया था, वो पीले रंग में लिपटा हुआ आया था।

"यह सुबह मेरी दुकान के नीचे से मिला," भोला भाई ने कहा। "शटर उठाया, तो पड़ा था। किसी ने बाहर से फेंका है। मैंने छुआ नहीं, सोचा तुम लोग देख लो।"

मैंने लिफ़ाफ़ा लिया।

उस्ताद अली बक्श ने आगे झुककर कहा, "सूँघ।"

"क्या?"

"सूँघ," उन्होंने कहा। "काग़ज़ की गंध बताती है कहाँ रखा था।"

मैंने सूँघा। हल्की स्याही की गंध थी और उसके पीछे कुछ ऐसा जो मुझे जाना-पहचाना लगा। धूप और साबुन की गंध। वही गंध जो इलियास के बैग में थी।

मेरे हाथ ठंडे हो गए।

"बस," उस्ताद ने कहा। "खोलो।"

मीरा मेरे पास आ गई। टिंकू ने कुर्सी खींचकर पास की। शबनम आपा ने तवा बंद कर दिया, जैसे उन्हें पता हो कि अब यहाँ चाय नहीं, कुछ और पकने वाला है।

मैंने लिफ़ाफ़े की किनारी फाड़ी।

अंदर एक काग़ज़ था। सफ़ेद, तीन तह में मोड़ा हुआ, ऊपर कोने पर हल्का सा मुड़ा हुआ। काग़ज़ नया था। बिल्कुल नया। इतना नया कि जैसे आज ही किसी के हाथ से निकला हो।

मैंने खोला।

ऊपर मोटे अक्षरों में लिखा था — अतिक्रमण हटाने का नोटिस।

मैंने ज़ोर से पढ़ा, क्योंकि सबको सुनना था।

"उपरोक्त भूमि पर स्थित अवैध अतिक्रमण को अड़तालीस घंटे के भीतर हटा लिया जाए। ऐसा न करने पर प्रशासन द्वारा हटाया जाएगा और होने वाला खर्च अतिक्रमणकर्ता से वसूला जाएगा।"

गुमटी पर चुप्पी फैल गई।

मैंने दोबारा पढ़ा और फिर मैं हँस पड़ा।

सबने मेरी तरफ़ देखा। भोला भाई ने मुझे ऐसे देखा जैसे मैं पागल हो गया हूँ।

"अतिक्रमण," मैंने कहा। "मतलब कब्ज़ा। मेरी दुकान पर कब्ज़ा। भाई, मेरी दुकान इतनी छोटी है कि इसमें कब्ज़ा भी तिरछा ही आएगा। सीधा आया तो दीवार से बाहर निकल जाएगा।"

कुछ लोग हँसे। हँसी धीमी थी, पर थी।

"मेरी दुकान पर तो मेरा ही पैर नहीं समाता," मैंने कहा। "और ये कहते हैं अवैध कब्ज़ा। साहब को कम से कम नाप तो लेने देना चाहिए था।"

टिंकू ने कहा, "उस्ताद, अगर सरकार मेरी दुकान हटाएगी तो पहले उसे ढूँढ़ना पड़ेगा।"

"वो तो है," मैंने कहा। "हमारी दुकान का पता उन्हें खुद ढूँढ़ना पड़ेगा, और मज़ा यह है कि वो ढूँढ़ने आएँगे, तब भी पता हमारा ही होगा।"

पर मीरा नहीं हँसी।

वो मेरे हाथ से काग़ज़ लेकर गुमटी की लाइट के नीचे ले गई। उसने अपनी जेब से एक छोटा काग़ज़ निकाला, उसे नोटिस के नीचे रखा, और दोनों को साथ देखने लगी।

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