The Mysterious Bell161 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 161

7 min read November 5, 2026

बबलू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें छोटी हो गईं।

"तू," उसने कहा।

"मैं," मैंने कहा। "क्यों, मेरा नाम भूल गए थे?"

"तेरी दुकान का बोर्ड आज रात तक उतर जाएगा।"

"बोर्ड उतर जाएगा तो नया लगा लेंगे," मैंने कहा। "बोर्ड लकड़ी का होता है। लकड़ी टूट जाती है। हम लकड़ी वाले आदमी हैं, हमें क्या। तुम चाहो तो उतार दो। हाँ, एक बात — उतारते वक़्त दो लोग लगाना। अकेले उतारोगे तो याद रखना, पूरी गली देख रही होगी।"

बबलू ने मेरी तरफ़ एक कदम बढ़ाया। उसकी चेन हिली और लॉकेट टिक-टिक किया। शबनम आपा ने तुरंत चिमटी उठाई — इस बार कुछ नहीं बोलीं, बस उठाई। और वो चुप उठाना उनके सारे शब्दों से बड़ा था।

बबलू रुक गया।

और फिर उसने वो किया जो डरने वाले आदमी करते हैं। वो हँसा। बड़ी हँसी, जिसमें कुछ नहीं था। उसने अपनी जेब से पानदान निकाला, उसमें से एक पत्ता लिया, और चबाते हुए बोला, "ठीक है। सब ठीक है। आपा, चाय का पैसा?"

"रख लो," शबनम आपा ने कहा। "कल तेरी गाड़ी में तेरे साथ बैठकर पी लूँगी।"

गली फिर हँसी। मुझे लगा बबलू अब भड़क जाएगा। पर वो नहीं भड़का। वो उठा, बेंच पर से अपना रूमाल उठाया, और गुमटी से दूर जाने लगा। उसकी चाल में वो चीज़ नहीं थी जो शाम को थी। उसके कंधे थोड़े झुक गए थे।

मैंने मन में सोचा कि हो गया। आज का दिन इतना ही था। शाम ढल गई, हँसी हो गई, और कल की सभा बाकी है।

और ठीक उसी वक़्त उसकी जेब में फोन बजा।

वो बजना अजीब था — धीमा, किसी पुराने रेडियो की घुन जैसा। बबलू ने एक कदम और बढ़ाया, फिर रुक गया। फिर उसने फोन निकाला, स्क्रीन देखी, और उसके चेहरे पर जो आया, वो गुस्सा नहीं था। वो कुछ और था, कुछ ऐसा जो मैंने उसके चेहरे पर पहले नहीं देखा था।

वो मुड़ा। उसने फोन कान पर रखा और आवाज़ इतनी धीमी कर दी कि गुमटी पर बैठे लोग भी न सुन सकें। पर मैं पास था। और मैंने सुना।

"जी साहब। जी। नहीं साहब, वो सब हो गया। बस मैं अभी बताता हूँ।"

फिर वो चुप हुआ। सुनता रहा। बहुत सुनता रहा।

और फिर उसने फोन जेब में रखा, और बिना पीछे देखे, बिना किसी को कुछ कहे, वो मुड़कर देखने लगा — मेरी दुकान की तरफ़।

मेरी दुकान। जहाँ शटर खुला था, जहाँ बोर्ड टेढ़ा टँगा था, और जहाँ अंदर पीछे के कमरे में एक छोटा बल्ब गुनगुना रहा था।

वो देखता रहा। लंबे समय तक। इतने समय तक कि गुमटी की हँसी भी धीमी पड़ गई, क्योंकि लोगों ने भी उसकी नज़र का रुख देखा।

फिर उसने अपना पान मुँह के एक कोने में किया, थूका नहीं, बस रखा, और चल दिया।

गली में शाम का रंग गहरा हो रहा था। पीपल की छाया लंबी हो गई थी। और मैं वहीं खड़ा रह गया, और मेरे अंदर कुछ ठंडा हो गया था — वैसा ही ठंडा, जैसी मेरी जेब में घंटी थी।

टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी पकड़ में डर था।

"उस्ताद, वो दुकान क्यों देख रहा था? दुकान तो खाली है।"

मैंने उसका हाथ दबाया।

"दुकान खाली नहीं है, टिंकू," मैंने कहा। "दुकान में घंटी रखी है। और आज पहली बार लगा कि वो घंटी नहीं देख रहा था। वो उस जगह को देख रहा था जहाँ घंटी रखी है।"

शबनम आपा ने चिमटी कड़ाही से उठाई और उसे ज़ोर से पीतल की थाली पर पटका। आवाज़ ऐसी हुई जैसे किसी ने हवा में ताला लगा दिया हो।

"सब सुन लो," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ अब हँसी वाली नहीं थी। "आज रात कोई अकेला नहीं सोएगा। जिसके घर में दो कमरे हैं, वो एक में दूसरे का बिस्तर लगा देगा। जिसके पास लाठी है, वो लाठी दरवाज़े के पीछे रखेगा। और कल सुबह दस बजे — सब चबूतरी पर। जिसको बुलाना नहीं है, वो भी आएगा। बस एक बात — कल कोई चुप नहीं रहेगा। चुप ही तो उसका हथियार है।"

गली में कोई नहीं हँसा। पर कोई डरा भी नहीं।

मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी, पर उसमें एक हल्की गूँज थी, जैसे कोई बहुत दूर से बोल रहा हो।

"अब बोल," मैंने धीरे से कहा, "इतना क्यों सोच रहा है?"

घंटी ने कहा — "क्योंकि उसने आज पहली बार अपने साहब का नाम लिया।"

"और?"

"और उसका साहब उसे नाम से नहीं, काम से बुलाता है। आज पहली बार उसने उसका नाम लिया है। मतलब साहब डरा हुआ है।"

मैंने आँखें बंद कीं। डरा हुआ साहब सबसे खतरनाक होता है। क्योंकि डरा हुआ साहब जल्दी हाथ नहीं उठाता, वो जल्दी काग़ज़ उठाता है। और काग़ज़ वो चीज़ है जो गली को रातों-रात बदल सकती है।

मीरा मेरे पास आई। उसने धीरे से कहा, "मैंने सुना। 'जी साहब, अभी बताता हूँ।'"

"हाँ।"

"अंकुश, मुझे लगता है कि आज रात कुछ होगा।"

"मुझे भी।"

"तो करें क्या?"

मैंने गली की तरफ़ देखा — पीपल, चबूतरी, टेढ़ा बोर्ड, आधा गिरा शटर, गुमटी की पीली लाइट, और दूर उस कोने में, जहाँ से पीछे की गली शुरू होती है और जहाँ उस्ताद अली बक्श की दुकान है, एक छोटी सी रोशनी जल रही थी।

"करना क्या है," मैंने कहा, "यह तो पता है। पर एक बात पहले तय कर लें। आज रात हम सब एक जगह रहेंगे। मेरी दुकान पर। बोर्ड अंदर, शटर आधा, और अंदर हर आदमी के हाथ में एक औज़ार। कोई डर से नहीं, सिर्फ़ इसलिए कि अगर कोई दरवाज़ा खटखटाए तो जवाब देने वाला मौजूद हो।"

टिंकू ने तुरंत कहा, "मैं अपनी लाल कॉपी लाता हूँ।"

"क्यों?"

"क्योंकि जो भी होगा, मैं लिखूँगा। दुबे अंकल ने कहा था — तारीख़, गवाह, काग़ज़। तो मैं काग़ज़ वाला काम करूँगा।"

मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। उसका सिर छोटा था और उसमें बाल बेतरतीब थे, बिल्कुल मेरे जैसे।

"ठीक है," मैंने कहा। "तू काग़ज़ वाला काम कर। और मैं घंटी वाला काम करूँगा।"

हम गुमटी से आगे बढ़े। शबनम आपा ने पीछे से आवाज़ दी — "अंकुश!"

मैं मुड़ा।

"अगर कल वो सच में गली साफ़ करने आया," उन्होंने कहा, "तो मैं उसके हाथ में झाड़ू पकड़ा दूँगी और कहूँगी — शुरू कर। सबसे पहले अपना पान का दाग साफ़ कर।"

गली फिर हँसी। इस बार हँसी में डर नहीं था। हँसी में बदला था, और बदला भी वो जो साफ़ होता है — जिसमें कोई गंदगी नहीं, बस ज़िद।

मैं हँसता हुआ आगे बढ़ा। मेरे पीछे मीरा थी, और मीरा के पीछे टिंकू, और हमारे पीछे गली की आवाज़ें — गिलास की खनक, बच्चों की भागदौड़, किसी के हँसने की आवाज़, किसी के दरवाज़े बंद करने की आवाज़।

मैंने जेब में घंटी को हल्का दबाया।

"एक बात बता," मैंने धीरे से कहा। "आज कितना हुआ?"

घंटी ने कहा, "आज कुछ जुड़ा नहीं। आज सिर्फ़ कुछ खुला है। और खुलने का हिसाब मैं नहीं रखता।"

"तो फिर?"

"अभी एक सौ अठारह है," उसने कहा। "कल ताले की नहीं, लोगों की बारी है। और उस दिन मैं तेरे काम नहीं आऊँगा। तू मेरे काम आएगा।"

मैं रुक गया। मैं वहीं, गुमटी की लाइट के नीचे, एक पल के लिए अपनी ही चाल भूल गया।

पर फिर मैंने सिर हिलाया और आगे बढ़ गया। क्योंकि रुकने का यह वक़्त नहीं था।

दूर, गली के दूसरे सिरे पर, आधे गिरे शटर वाली दुकान से भोला भाई ने रेडियो की आवाज़ तेज़ कर दी थी। मुझे लगा वो जानबूझकर कर रहे थे — जैसे कह रहे हों कि मैं ज़िंदा हूँ, मेरी दुकान ज़िंदा है, और कल मैं भी आऊँगा।

और मेरे जेब में घंटी ठंडी थी, बिल्कुल चुप, पर उस चुप्पी में वो बात थी जो अब मुझे समझ आने लगी थी — कि कहानी अब घंटी की नहीं, गली की है।

मैंने टिंकू से कहा, "तेरा बस्ता घर पर है?"

"हाँ उस्ताद।"

"कल सुबह उसे लेकर आ जाना।"

"क्यों?"

"क्योंकि सभा में स्कूल छोड़ने वाले लड़के को भी बोलने का हक़ होता है," मैंने कहा। "और तेरे पास उससे बहुत बड़ा हक़ है। तू वहाँ था, मैं नहीं था।"

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