The Mysterious Bell159 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 159

7 min read November 5, 2026

और मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने कोई आपत्ति नहीं की। उसने बस यह कहा, "मैं बाहर रहूँगी। अगर तुम्हें ज़रूरत हो, तो खिड़की से हाथ उठा देना।"

"तुम दूर नहीं जाओगी?"

"मैं कभी दूर नहीं जाती," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो सूखापन लौट आया था जो उसकी असली आवाज़ है। "मैं बस कैमरा बंद रखती हूँ जब किसी को बात करनी होती है। यह मेरे पेशे का सबसे कठिन हिस्सा है।"

मैं हँसा। पहली बार उस दिन अंदर से हँसा।

मैंने मेज़ से लिफ़ाफ़ा उठाने के लिए हाथ बढ़ाया, पर दुबे अंकल ने हल्के से मेरा हाथ रोक दिया।

"यह अभी नहीं," उन्होंने कहा।

"इसमें क्या है?"

"जो इसमें है, वो कल सभा में खुलेगा," उन्होंने कहा। "और मैं इसे अभी इसलिए रख रहा हूँ कि तू यह देख ले — यह कितना हल्का है।"

मैंने देखा। लिफ़ाफ़ा हल्का था। बहुत हल्का।

"हल्का क्यों है?" मैंने पूछा।

"क्योंकि इसमें सिर्फ़ एक काग़ज़ है," उन्होंने कहा। "पर वो काग़ज़ वो नहीं है जो तू सोच रहा है। वो कोई सबूत नहीं है। वो एक तारीख़ है। और तारीख़ कभी अकेली नहीं आती — वो अपने साथ एक नाम लाती है। जब तक तू भोला को गवाह नहीं बनाता, वो नाम बेकार है, क्योंकि बेकार नाम वाला काग़ज़ मेज़ पर रखा काग़ज़ है। और मेज़ का काग़ज़ किसी काम का नहीं।"

उन्होंने लिफ़ाफ़ा उठाया, अपनी शर्ट की जेब में रखा, और बटन बंद कर दिया।

फिर वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़े। दरवाज़े पर रुककर उन्होंने पीछे मुड़कर देखा।

"अंकुश।"

"जी।"

"आज रात सो जाना। चाहे नींद न आए, आँखें बंद रखना। क्योंकि कल सुबह से तेरे पास सोने का वक़्त नहीं होगा। और जो आदमी सो नहीं पाता, वो झगड़े में जल्दी बोलता है। और जल्दी बोलने वाला आदमी अपना ही काग़ज़ गँवा देता है।"

वो बाहर निकल गए।

मैं कुर्सी पर बैठा रह गया। मेरी जेब में घंटी थी और वो अब भी ठंडी थी, पर उसकी गूँज लौट आई थी, धीमी, जैसे किसी दूर के कमरे में कोई गुनगुना रहा हो।

टिंकू ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। उसका हाथ छोटा था और उसमें गर्मी थी।

"उस्ताद," उसने कहा। "क्या हम जीतेंगे?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। मैं झूठ नहीं बोलना चाहता था। और सच भी नहीं जानता था।

"आज दोपहर तक," मैंने कहा, "मुझे लगता था कि बबलू बड़ा आदमी है। अब मुझे लगता है कि वो सिर्फ़ बोलने वाला आदमी है। और बोलने वाले आदमी के पीछे जो खड़ा होता है, वही असली होता है। उस तक पहुँचना है।"

"और उस तक कैसे पहुँचेंगे?"

मैं उठा। मैंने चाय का आख़िरी घूँट लिया, गिलास मेज़ पर रखा, और टिंकू की तरफ़ देखकर कहा, "उसके पास अंगूठे नहीं हैं। उसके पास काग़ज़ हैं। और जिस दिन उसके काग़ज़ पर बैठे लोग अपना अंगूठा देखकर कहेंगे कि यह मेरा है और मैंने यह नहीं बेचा — उस दिन उसके पास कुछ नहीं बचेगा। भोला भाई वही पहला अंगूठा है। इसलिए पहले उन्हें लाना है, और लाने से पहले उन्हें भरोसा देना है कि उनका बेटा भूखा नहीं मरेगा।"

हम बाहर निकले। गली में शाम उतर आई थी। शबनम आपा की गुमटी की लाइट जल गई थी और उसकी पीली रोशनी में पीपल की पत्तियाँ चमक रही थीं, जैसे किसी ने ऊपर से सिक्के बिखेर दिए हों।

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "भोला भाई की दुकान?"

"भोला भाई की दुकान," मैंने कहा।

और हम तीनों गली की उस तरफ़ चलने लगे, जहाँ उसकी दुकान का आधा गिरा हुआ शटर अभी भी उसी तरह टँगा हुआ था — जैसे किसी ने डर को वहीं खड़ा कर दिया हो और उसे खुद भूल गया हो।

पीछे चबूतरी पर सानिया अपनी लाल कॉपी में कुछ लिख रही थी। मुझे नहीं पता उसने क्या लिखा, पर उसकी कलम रुक-रुक कर चल रही थी, और धूप अब उसके पन्ने पर पीली पड़ रही थी।

मेरे जेब में घंटी ने धीरे से कहा, "भोला का डर बोलेगा तो बबलू का हिसाब टूटेगा।"

और फिर चुप हो गई।

॥

गली के मोड़ पर पहुँचते-पहुँचते शाम और गहरी हो गई थी। पीपल के पत्तों पर रोशनी ऐसे बैठी थी जैसे किसी ने ऊपर से पीला पानी छिड़क दिया हो। शबनम आपा की गुमटी से तेल की गंध आ रही थी, समोसे कड़ाही में तैर रहे थे और उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई धीरे-धीरे ताली बजा रहा हो।

टिंकू मेरे पीछे-पीछे चल रहा था और लगातार बोल रहा था। उसकी आवाज़ में वो घबराहट थी जो बच्चों में अक्सर उलटी तरफ़ निकलती है — बहुत ज़्यादा बोलने में।

"उस्ताद, अगर भोला भाई आज भी न बोले तो?"

"तो कल बोलेगा।"

"और अगर कल भी न बोले?"

मैं रुका। मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके घुटने पर बँधी पट्टी की गाँठ ढीली हो गई थी और वो उसे बार-बार पैर से दबा रहा था।

"टिंकू," मैंने कहा, "तूने मुझसे एक बार पूछा था कि घंटी सच बोलती है या नहीं। तूने वो सवाल पूछा था जो मैं खुद से नहीं पूछ पा रहा था। आज तू मुझसे मत पूछ कि भोला भाई बोलेंगे या नहीं। तू यह सोच कि अगर वो नहीं बोले तो हम क्या करेंगे।"

"क्या करेंगे?"

"तब देखेंगे। पहले यह देख लेते हैं कि वो क्या कहते हैं।"

मीरा मेरे बगल में चल रही थी। उसने कैमरा बैग में रख लिया था और बैग को कंधे पर ऐसे टाँगा था जैसे कोई भारी पत्थर टाँग लिया हो।

"मैंने वादा किया था," उसने खुद से कहा, जैसे मुझे याद दिला रही हो। "कैमरा बंद रहेगा।"

"मैंने तुझसे वादा नहीं माँगा था।"

"मैंने खुद से माँगा था," उसने कहा। "और मुझे अपने आप से किया हुआ वादा सबसे ज़्यादा पसंद है, क्योंकि उसे तोड़ने पर कोई मुझे डाँटता नहीं, सिर्फ़ मैं खुद रात को जागती हूँ।"

मैं हँसा। हँसी छोटी थी, पर सच्ची थी।

भोला भाई की दुकान गली के उस कोने पर थी जहाँ से पीछे की गली शुरू होती है। उसका शटर आधा गिरा हुआ था, और उस आधे में से अंदर की पीली रोशनी ऐसे छन रही थी जैसे किसी चीज़ को छुपाया जा रहा हो।

मैंने शटर को हल्का ऊपर उठाया। वो चरचराया, फिर रुक गया, जैसे कह रहा हो कि इतना ही, इससे ज़्यादा नहीं।

अंदर जाकर मैं ठिठक गया।

दुकान में रेडियो के खुले पेट पड़े थे, दो पंखे, एक प्रेस, और कई ऐसी चीज़ें जिनके नाम मुझे नहीं पता थे पर जिनकी गंध मुझे पता थी — टिन और गरम राल की गंध। दीवार पर छोटे-छोटे डिब्बों की कतारें थीं, हर डिब्बे पर हाथ से लिखा हुआ नाम। और उसी दीवार के नीचे, एक लकड़ी के स्टूल पर, भोला भाई बैठे थे।

उनके हाथ में पेचकस था। वो उसे घुमा नहीं रहे थे। बस पकड़े हुए थे, जैसे किसी ने उन्हें थमा दिया हो और वो भूल गए हों कि क्यों पकड़ा था।

"भोला भाई।"

उन्होंने सिर उठाया। उनकी आँखें लाल थीं, पर रोने की नहीं — जागने की। कई रातों की जागी हुई लाली।

"तू आया," उन्होंने कहा। आवाज़ सूखी थी।

"आया।"

"लोग बोल रहे थे कि तू थाने गया था।"

"गया था।"

"और?"

"और दुबे अंकल ने कहा कि मैं तुझसे गवाही माँगने नहीं आया।"

वो चुप रहे। उनका हाथ पेचकस पर और कस गया।

पीछे के परदे से आवाज़ आई। भोला भाई की बीवी की आवाज़। मैंने उन्हें पहले नहीं देखा था, बस सुना था — कि ऑपरेशन हुआ था, कि अब चलना शुरू किया है, कि अभी भी बैसाखी पकड़नी पड़ती है।

"भोला," उन्होंने परदे के पीछे से कहा, "चाय बना दूँ? मेहमान आया है।"

"नहीं," भोला भाई ने झट से कहा। "नहीं बनानी।"

"क्यों नहीं बनानी?" मैंने कहा, और मैं खुद उस स्वर से चौंक गया जितनी जल्दी वो निकला था। "बना दो आपा। मैं पी लूँगा। और बुरी लगे तो बता दूँगा।"

परदे के पीछे से हल्की हँसी आई। फिर चूड़ी की आवाज़, और फिर चूल्हे पर पतीले की टनटन।

भोला भाई ने मेरी तरफ़ देखा। "तू मुझसे क्या चाहता है, अंकुश?"

"कुछ नहीं चाहता।"

"झूठ मत बोल।"

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