The Mysterious Bell158 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 158

7 min read November 5, 2026

मेरे कानों में गूँज हुई। घंटी ने भी वही कहा था — घर का सबसे पुराना बंद दरवाज़ा अभी नहीं खुला। मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी, पर चुप नहीं। उससे हल्की सी गूँज आ रही थी, जैसे किसी बंद कमरे में कोई दूर से गुनगुना रहा हो।

"कहा था न," दुबे अंकल ने कहा। "सवाल नहीं पूछेगा।"

"मैंने पूछा भी नहीं।"

"मुँह से नहीं पूछा। आँखों से पूछ लिया।"

मैंने आँखें नीची कर लीं। मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और मुँह फेर लिया, जैसे किसी को मौका दे रही हो।

दुबे अंकल वापस आकर बैठ गए। उन्होंने अपनी जेब से रुमाल निकाला और चश्मा पोंछा, हालाँकि चश्मा नहीं पहना था। रुमाल उनकी आदत थी, शायद इसलिए कि हाथों को कुछ करना होता है जब बात भारी हो। फिर उन्होंने कहा, "अब सुन, जो सुनने आया है। तीन चीज़ें। तारीख़, गवाह, लिखा हुआ काग़ज़। तेरे पास तारीख़ है — मीरा के फ़ोन में। तेरे पास काग़ज़ है — यह नक़ल, और उससे बड़ा काग़ज़ चंद्रेश के दफ़्तर में है, जिसे रज्जो लाई है और जिसे शाहिद फाड़ चुका है, पर फाड़ा हुआ काग़ज़ भी काग़ज़ होता है। फाड़कर कोई सच नहीं मरता।"

"और गवाह?" मैंने पूछा।

"गवाह," उन्होंने कहा, "वो तू खुद ढूँढ नहीं सकता। गवाह खुद आगे आता है। और आज दिन में एक आदमी आगे आया, फिर पीछे हट गया।"

मुझे समझ आ गया। "भोला भाई।"

"भोला भाई," उन्होंने दोहराया। "उसने आज तेरे साथ खड़े रहने की बात कही। पर उसने यह नहीं कहा कि वो कल सभा में खड़ा होगा। और जब तक वो खड़ा नहीं होता, बबलू के पास एक डोर बची रहती है। डोर बची रहेगी तो वो उसे खींचेगा।"

मैंने सिर हिलाया। मेरे अंदर कुछ जम रहा था, धीरे-धीरे, जैसे बरसात के बाद गली में कीचड़ जमता है। मुझे लगा मैं सब समझ रहा हूँ, पर असल में मैं सिर्फ़ पहली सीढ़ी पर खड़ा था।

"दुबे अंकल," मैंने कहा, "आपने कहा कि पच्चीस साल पहले आप कुछ नहीं कर पाए। आज क्यों कर रहे हैं?"

उन्होंने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने कहा, "क्योंकि आज पहली बार गली में किसी ने मुझसे कुछ माँगा नहीं। तूने मुझसे मदद नहीं माँगी। तूने मेरी कुर्सी पर बैठकर सिर्फ़ सच पूछा। और मैंने सोचा — जो आदमी मदद माँगे बिना सच पूछता है, वो मदद लेने के लिए तैयार है। और जो मदद लेने के लिए तैयार है, वो अकेला नहीं मरेगा।"

मैं कुछ नहीं बोला। मुझे लगा अगर मैं बोला तो आवाज़ टूटेगी।

बाहर शोर हुआ। दरवाज़े की तरफ़ देखा तो सिपाही अंदर आया और उसने कहा, "अंकल जी, बाहर शबनम आपा खड़ी हैं, चाय लेकर, और एक लड़का है जो बार-बार पूछ रहा है कि अंकुश भैया अंदर हैं या नहीं।"

"भेज दे उसे अंदर," दुबे अंकल ने कहा। "और चाय भी भेज दे। चार गिलास।"

टिंकू अंदर आया। वो दरवाज़े पर ही रुक गया, जैसे डर रहा हो कि अंदर कदम रखते ही कुछ हो जाएगा। उसके घुटने पर पट्टी थी, और उसके हाथ में माँ की वो लाल कॉपी थी जो उसने आज सुबह दुकान पर दिखाई थी।

"उस्ताद," उसने धीरे से कहा।

"अंदर आ," मैंने कहा।

वो आया और मेरी कुर्सी के पीछे खड़ा हो गया। दुबे अंकल ने उसे देखा और कुछ नहीं कहा। फिर उन्होंने अपना रजिस्टर उठाया और उसे वापस दराज़ में रखने लगे।

"रुकिए," मीरा ने कहा। "अंकल, आपने जो अपनी कॉपी दिखाई — पच्चीस साल पहली वाली। उसमें और क्या लिखा है?"

"बहुत कुछ," उन्होंने कहा। "हर शिकायत जिसे मैंने नहीं सुना। हर आदमी जिसे मैंने लौटा दिया। हर अंगूठा जिसे मैंने देखा और अनदेखा कर दिया। वो कॉपी मेरी नहीं है, मीरा बेटी। वो मेरे पापा की नहीं थी, और मेरे बेटे की नहीं होगी। वो उन लोगों की है जिन्हें मैंने टाल दिया।"

उन्होंने रजिस्टर दराज़ में रखा और दराज़ बंद कर दिया।

फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और कहा, "एक बात और पूछनी है तुझे। पूछ।"

"आपको कैसे पता कि यह बात आज इतनी बड़ी हो जाएगी? आपने आज ही क्यों सोचा कि अब कुछ करना चाहिए?"

उन्होंने सिर हिलाया, जैसे मानो हाँ, यही सवाल था।

"क्योंकि आज सुबह मैंने कुछ देखा," उन्होंने कहा। "मैं अपनी कुर्सी पर बैठा था, और गली की तरफ़ देख रहा था। तेरी दुकान के सामने बच्चे खड़े थे — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू। और वो सब एक ही तरफ़ देख रहे थे। मैंने सोचा, क्या देख रहे हैं? फिर मैंने देखा — वो तेरी दुकान का बोर्ड देख रहे थे। जो टेढ़ा टँगा है, जिस पर धूल जमी है। और सानिया ने अपनी कॉपी निकाली और उस पर उस बोर्ड का नाम लिखा।"

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। उसने भी सुना था। उसकी आँखें बड़ी हो गई थीं।

"मुझे समझ आया," दुबे अंकल ने कहा, "कि इस गली में एक भी बच्चा ऐसा नहीं है जो यह नहीं जानता कि कौन उसकी गली का है और कौन नहीं। और जिस दिन बच्चे जान जाते हैं, उस दिन बड़े मना नहीं कर सकते। मैं बड़ा हूँ, पर मैं अंधा नहीं हूँ। मैंने तीस साल में पहली बार सोचा कि अगर मैं आज भी चुप रहा, तो सानिया की कॉपी में मेरा नाम ऐसा लिखा जाएगा जो उसे कभी पढ़ना नहीं चाहिए।"

थाने में सन्नाटा था। चाय आ गई थी और सिपाही उसे मेज़ पर रखकर चुपचाप बाहर चला गया।

मैंने चाय का गिलास उठाया। हाथ काँप रहा था, और मुझे यह अच्छा नहीं लगा, तो मैंने गिलास दोनों हाथों से पकड़ा।

तभी दुबे अंकल ने अपनी शर्ट की अंदरूनी जेब से कुछ निकाला।

एक लिफ़ाफ़ा।

पुराना। इतना पुराना कि उसका रंग पीला पड़ गया था और किनारे मुलायम हो गए थे। उस पर कोई नाम नहीं लिखा था, कोई मोहर नहीं थी, बस एक कोने पर एक छोटी सी तह बनी थी, जैसे वो कई बार खोला और बंद किया गया हो, पर कभी भेजा न गया हो।

उन्होंने उसे मेज़ पर रख दिया। ठीक मेरी तरफ़, पर मेरे हाथ से दूर — इतनी दूर कि मैं उसे उठाने के लिए झुकूँ।

वो उठे। उन्होंने अपनी कुर्सी पीछे सरकाई, और उनकी आवाज़ अब वैसी नहीं थी जैसी अभी तक थी। अब उसमें वो चीज़ थी जो लोग तब बोलते हैं जब फ़ैसला कर चुके होते हैं।

"सुन, अंकुश।"

मैंने सिर उठाया।

"कल दस बजे की सभा में मैं आऊँगा," उन्होंने कहा। "मैं अपनी कुर्सी लेकर आऊँगा, क्योंकि मेरी कमर तेरी उम्र की नहीं है। और मैं अपनी कॉपी भी लेकर आऊँगा, क्योंकि उसके बिना मैं खाली हाथ आऊँगा, और खाली हाथ आने का मुझे कोई हक़ नहीं है।"

मेरी साँस तेज़ हो गई।

"पर पहले," उन्होंने कहा, और उन्होंने लिफ़ाफ़े की तरफ़ उँगली से इशारा किया, "तुम्हें भोला को गवाह बनाना पड़ेगा।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। "गवाह बनाना पड़ेगा, मतलब?"

"मतलब, उसे सिर्फ़ यह नहीं कहना है कि वो तेरे साथ है। उसे यह भी कहना है कि उसने क्या देखा, कब देखा, किसके हाथ से क्या लिया, और किस मज़बूरी में उसने अपना अंगूठा लगाया। जो आदमी अपनी मज़बूरी खुद नहीं कहता, उसकी गवाही अधूरी रहती है। और अधूरी गवाही से बबलू वाला आदमी हँसता है। मैं उसे हँसने का मौका नहीं देना चाहता।"

"वो डरता है," मैंने कहा। "उसका बेटा साइट पर काम करता है। उसकी बीवी का ऑपरेशन हुआ है।"

"तो उसे यह बताना पड़ेगा," दुबे अंकल ने कहा, "कि डरना गुनाह नहीं है। डर के आगे झुक जाना गुनाह नहीं है। पर डर को सच के आगे बैठा देना — यही एक चीज़ है जो गली को खोखला कर देती है। और यह बात तुझे नहीं कहनी। यह बात उसकी बीवी को कहनी है। औरतें यह बात जल्दी समझती हैं, क्योंकि वो डर के साथ रोज़ चूल्हा जलाती हैं।"

टिंकू ने पीछे से कहा, "उस्ताद, मैं भोला भाई को बुला लाऊँ?"

मैंने मुड़कर उसे देखा। उसका चेहरा छोटा था, पर उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो आज सुबह नहीं थी।

"नहीं," मैंने कहा। "उन्हें मैं खुद जाऊँगा। अकेले।"

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho