The Mysterious Bell – Chapter 157
"यह मेरी अपनी कॉपी है," उन्होंने कहा। "थाने की नहीं। जब मैं जवान था तो मैं इसमें वो लिखता था जो रजिस्टर में नहीं लिखा जा सकता था। जैसे — कौन डरा हुआ था, किसकी आवाज़ काँप रही थी, किसने पानी का गिलास उठाते वक़्त हाथ बदला। ये बातें कोई काग़ज़ नहीं मानता, पर यही बातें बताती हैं कि सच क्या है।"
उन्होंने पन्ना पलटा। पन्ने पीले थे, किनारों से कटे हुए, और ऊपर की तरफ़ धूल की पतली परत थी।
"यहाँ," उन्होंने कहा। "पच्चीस साल पुरानी लाइन है। और इसे मैंने अपने हाथ से लिखा था।"
मैंने गर्दन आगे की। मैं पढ़ भी नहीं रहा था, बस देख रहा था। लाइन छोटी थी, नीली स्याही, थोड़ी झुकी हुई।
"जगदीश यादव," दुबे अंकल ने पढ़ा। "आया था। काग़ज़ लाया था। हाथ काँप रहे थे।"
मुझे लगा मेरे सीने के अंदर कोई चीज़ धीरे से घूम गई।
"दादा," मैंने कहा।
"हाँ," उन्होंने कहा। "तेरे दादा।"
मैं कुछ देर उनकी तरफ़ देखता रहा। फिर मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ सूखी थी, "वो क्या लाए थे?"
"वही जो तू आज लाया है। काग़ज़। उन पर अंगूठा था। और उन्होंने कहा था कि यह अंगूठा मेरा है, पर मैंने यह नहीं बेचा।"
दुबे अंकल ने पन्ना बंद कर दिया। उन्होंने हथेली उसके ऊपर रख दी, जैसे किसी की आँखें बंद कर रहे हों।
"मैं उस वक़्त जवान था," उन्होंने कहा। "और मैंने कहा था — अंकल जी, आपके पास कोई गवाह है? कोई तारीख़? कोई लिखा हुआ काग़ज़? और वो बैठ गए थे उसी कुर्सी पर जिस पर तू अभी बैठा है। उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा था — बेटा, मेरे पास सिर्फ़ यही हाथ है और यही अंगूठा। इससे ज़्यादा मेरे पास कुछ नहीं है।"
मेरी आँखें जलने लगीं। मैंने मुट्ठी भींची और जाँघ पर रख दी।
"और फिर?" मैंने पूछा।
"और फिर मैंने उन्हें कहा — जाइए, काग़ज़ लाइए, गवाह लाइए। वो गए। वो कभी नहीं लौटे।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "और मैं यह सोचता रहा कि मैंने उन्हें लौटा दिया था। काग़ज़ के नियम से नहीं, अपनी जल्दबाज़ी से।"
थाने में कुछ देर कुछ नहीं हुआ। बाहर किसी ने साइकिल की घंटी बजाई और वो आवाज़ अंदर घुसकर फिर बाहर निकल गई। मेज़ पर पड़ी रजिस्टर की धूल अब भी हवा में तैर रही थी, और उन कणों में शाम की पीली रोशनी ऐसी दिख रही थी जैसे कोई पुरानी फ़िल्म चल रही हो।
"दुबे अंकल," मैंने कहा। "मैं आपको एक बात दिखाऊँ?"
"दिखा।"
मैंने जेब से वो पीली नक़ल निकाली, जो रज्जो बाई के बैग से मिली थी। मैंने उसे मेज़ पर खोल दिया। काग़ज़ कुछ चरमराया, क्योंकि उसकी तहें कई बार मोड़ी गई थीं।
दुबे अंकल झुके। उन्होंने पहले नीली मोहर देखी। फिर उस पर लिखा नाम। फिर वो लाइन जिस पर बड़े अक्षरों में गली का नाम लिखा था।
"अस्पताल, गली, दुकान, घर," उन्होंने धीरे-धीरे पढ़ा, जैसे हर शब्द को मुँह में तोल रहे हों। "एक ही शीट पर।"
"और यहाँ," मैंने कहा।
मैंने उँगली उस चौकोर पर रखी जहाँ लाल पेंसिल से क्रॉस बना था। फिर मैंने उँगली उस जगह पर ले गया जहाँ मेरी दुकान का नाम लिखा था और उसके नीचे की जगह खाली थी।
"यहाँ मेरा नाम होना चाहिए था," मैंने कहा। "पर जगह खाली है।"
दुबे अंकल ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस देखा।
"बबलू ने आज यही कहा था," मैंने कहा। "उसने कहा कि साहब ने मेरे नाम की जगह खाली रखी है। मुझे समझ नहीं आया। मुझे लगा कि वो मुझे डराने के लिए ऐसा कह रहा है। पर यह काग़ज़…"
मैं रुक गया। मेरी आवाज़ भारी हो रही थी, और मुझे यह पसंद नहीं था।
"यह काग़ज़ सच कह रहा है," दुबे अंकल ने कहा।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"सुन," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ अब धीमी हो गई, बहुत धीमी, जैसे कोई बात ज़मीन के नीचे से ऊपर आ रही हो। "खाली जगह कमज़ोरी नहीं होती। खाली जगह सबूत होती है।"
"कैसे?"
"क्योंकि जो आदमी काग़ज़ बनाता है, वो कभी जगह खाली नहीं छोड़ता। वो पहले नाम भरता है। उसकी आदत होती है — जगह है तो भरनी है, क्योंकि खाली जगह उसके काग़ज़ को अधूरा दिखाती है। अगर उसने जगह खाली छोड़ी है, तो उसका मतलब है कि वो नाम बाद में भरना चाहता था। और नाम बाद में क्यों भरना चाहता था? क्योंकि उसे नाम बताने वाला अभी तैयार नहीं था।"
मैं सीधा बैठ गया।
"तो मतलब," मैंने कहा, "जब यह काग़ज़ बना, तब मैं उसमें नहीं था।"
"तब तू उसमें नहीं था," उन्होंने कहा। "और आज वो तेरा नाम भरने की बात कर रहा है। क्यों? क्योंकि तूने उसकी जगह पर कुछ खड़ा कर दिया है — घंटी, दुकान, लोगों का भरोसा। जिस दिन तू खड़ा होकर उस काग़ज़ को तोड़ेगा, उस दिन वो खाली जगह नहीं रहेगी। वो बोलने लगेगी।"
मीरा ने अपनी कलम निकाली और अपनी छोटी डायरी पर कुछ लिखा। फिर उसने पूछा, "दुबे अंकल, एक बात साफ़ नहीं हो रही है। अगर काग़ज़ पर अंगूठा लगा है, तो अंगूठा लगाने वाला गया तो है उसमें। तो फिर खाली जगह का क्या?"
"अंगूठा गवाही देता है कि आदमी ने अंगूठा लगाया," दुबे अंकल ने कहा। "यह गवाही नहीं देता कि आदमी ने समझा कि वो क्या लगा रहा है। यही तो अंगूठे की सबसे बड़ी कमज़ोरी है। वो सिर्फ़ हाथ दिखाता है, सोच नहीं।"
उन्होंने मेज़ पर रखी नक़ल को मेरी तरफ़ सरका दिया।
"पर तेरे मामले में एक चीज़ अलग है," उन्होंने कहा। "तेरे पापा ने अपना अंगूठा लगाया, और तेरी लाइन खाली छोड़ दी। यह अजीब है। कोई आदमी अपनी जगह लेता है, और दूसरे की जगह खाली छोड़ देता है।"
"उन्होंने मुझे बचाने के लिए किया," मैंने कहा। "मुझे बाहर रखने के लिए।"
"हो सकता है," वो बोले। "पर मैं तुझे एक और बात बताता हूँ, जो पच्चीस साल मेरे अंदर बैठी है। जब कोई आदमी अपना अंगूठा लगाता है और साथ वाली जगह खाली छोड़ देता है, तो वो सिर्फ़ किसी को बचाने के लिए ऐसा नहीं करता। वो दोबारा लौटने के लिए भी जगह छोड़ता है। वो जानता है कि एक दिन कोई आएगा और उस खाली जगह पर खड़ा होगा। तेरे पापा ने तेरा हिस्सा ख़त्म नहीं किया। उन्होंने तेरे लिए जगह छोड़ी है।"
मुझे पानी जैसा कुछ गले में अटक गया। मैंने कुछ नहीं कहा।
दुबे अंकल अब उठ खड़े हुए और खिड़की के पास चले गए। खिड़की में लोहे का जाल लगा है, और उसके बाहर चौक की धूप अब नारंगी होने लगी थी। उन्होंने जाले में उँगली टिकाई और बोले, "मुझे एक बात कहनी है, और जब मैं कह दूँगा तो तू मुझसे इस पर सवाल नहीं पूछेगा।"
"क्यों नहीं पूछूँगा?"
"क्योंकि उसका जवाब मेरे पास भी नहीं है।"
मैं चुप हो गया।
"पच्चीस साल पहले," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी, "जगदीश यादव सिर्फ़ एक काग़ज़ लेकर नहीं आए थे। वो दो काग़ज़ लेकर आए थे। दूसरा काग़ज़ उन्होंने मुझे नहीं दिया। उन्होंने उसे सीने से चिपकाया हुआ था, और उसे देखकर उनकी आँखें भर आई थीं। मैंने पूछा भी — वो क्या है? और उन्होंने कहा — बेटा, यह वो काग़ज़ है जिसकी वजह से मैं यहाँ आया हूँ, पर जिसकी वजह से मैं यहाँ नहीं आ सकता।"
मैं उठकर खड़ा हो गया। मेरी कुर्सी पीछे खिसकी और उसकी टाँग फर्श पर खुरची।
"वो काग़ज़ कहाँ है?" मैंने पूछा।
"मैंने यही पूछा था," उन्होंने कहा। "और वो हँसे। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उन्होंने कहा — बेटा, यह काग़ज़ ताले में है। और जब बंद दरवाज़ा खुलेगा, तब यह काग़ज़ अपने आप बाहर आ जाएगा। मैं उसे ज़बरदस्ती से खींचना नहीं चाहता।"
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