The Mysterious Bell – Chapter 156
मैंने गिलास पकड़ लिया। चाय गरम थी और उसमें अदरक तेज़ थी, ऐसी कि गले से नीचे उतरते हुए सीने तक चली जाए।
दुबे अंकल आगे चल रहे थे। उनकी नीली शर्ट की कमर पर पसीने का गोल निशान बन गया था। शाम की धूप अब पीली होकर गली की दीवारों पर चढ़ने लगी थी, और हमारी परछाइयाँ हमसे आगे-आगे दौड़ रही थीं, जैसे वो भी यह देखने की जल्दी में हों कि अब क्या होगा।
थाना गली के मुहाने पर है, चौक के कोने पर। छत पुरानी है, और बाहर की दीवार पर पीली रंगत उतर गई है, जिससे ईंटें नंगी दिखती हैं। अंदर घुसते ही पहली चीज़ जो नाक में लगती है वो है लालटेन का तेल, पुराने काग़ज़ की धूल और हल्की सी चाय की पत्ती, जो यहाँ के लोगों के हाथों से फर्श पर गिरते-गिरते बन गई है।
अंदर एक लंबी मेज़ है। लकड़ी की, मोटी, और उसकी ऊपर की सतह पर इतने निशान हैं कि लगता है किसी ने सालों तक कुछ न कुछ लिखते-मिटाते हुए उसे खुरचा है। मेज़ के पीछे एक सिपाही बैठा था, जवान, पतला, और इतनी धीमी रफ़्तार से कुछ लिख रहा था जैसे हर अक्षर के साथ उसे सोचना पड़ता हो।
दुबे अंकल ने जाते ही उसकी मेज़ पर हाथ रखा।
"बेटा," उन्होंने कहा, "ये लड़का मेरे साथ है। इसे अंदर बैठा दो।"
सिपाही ने सिर उठाया। फिर उन्हें पहचानकर उठ खड़ा हुआ।
"अंकल जी, आप बोलते तो मैं—"
"बोलने की ज़रूरत नहीं। तेरी कुर्सी हमें दे दे, और तू बाहर जाकर दो मिनट गली की हवा खा ले।"
सिपाही हँसा, कुर्सी छोड़कर बाहर गया। जाते वक़्त उसने मेरी तरफ़ देखा, ऐसा देखा जैसे कोई सोच रहा हो — ये लड़का है कौन जिसे दुबे अंकल अपनी कुर्सी दे रहे हैं।
मैं बैठ गया। कुर्सी भारी थी और मुझमें इतनी ताक़त नहीं थी कि उसे खींचकर ठीक करता, तो मैंने जैसा था वैसे ही बैठना ठीक समझा।
मीरा मेज़ के सिरे पर खड़ी रह गई। उसने कैमरा निकाला भी नहीं, बैग भी नहीं खोला। बस खड़ी रही। मुझे यह देखकर अच्छा लगा, क्योंकि कुछ जगहें ऐसी होती हैं जहाँ कैमरा निकालना सवाल बन जाता है।
दुबे अंकल मेरे सामने बैठे, और उन्होंने सीधे दराज़ खींचा।
दराज़ चरचरा कर खुला। उसमें से महक उठी — पुराने काग़ज़ की वो महक, जो कभी नहीं जाती, जो लकड़ी और नमी और स्याही, तीनों के मिलने से बनती है। उन्होंने एक मोटा रजिस्टर बाहर निकाला। उसका कवर काले कपड़े का था, और किनारों पर चमड़े की पट्टियाँ लगी थीं, जो घिसकर पतली हो गई थीं।
रजिस्टर मेज़ पर रखते ही उसमें से धूल उड़ी। मैंने नाक बचाई।
"मत बचा," दुबे अंकल ने कहा। "यही धूल तेरा सबूत है। पुराना धूल सबसे भरोसेमंद गवाह होता है, क्योंकि उसे कोई खरीद नहीं सकता।"
उन्होंने रजिस्टर का पन्ना पलटा। फिर दूसरा। फिर तीसरा। पन्नों के किनारे मुड़े हुए थे, कहीं-कहीं मकड़ी का जाला था, और कहीं-कहीं नीली स्याही फैलकर एक अलग ही नक्शा बना गई थी।
"बैठ ठीक से," उन्होंने कहा। "और सुन।"
मैं ठीक से बैठ गया।
"झगड़ा मार-पीट से नहीं बनता। मार-पीट से सिर्फ़ आदमी चुप होता है, काग़ज़ नहीं। और जिस दिन काग़ज़ बोलना सीख जाता है, उस दिन आदमी को चुप होना पड़ता है। यह बात मुझे मेरे साहब ने सिखाई थी, जब मैं जवान था और मुझे लगता था कि दुनिया लाठी से चलती है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"अब बताता हूँ कि तू मुझसे यहाँ क्यों बैठा है। बबलू ने आज तुझे धमकाया। बोर्ड उतारने की बात कही। घंटी की बात कही। शटर बंद करने की बात कही। तू गुस्से में था, तू बोल सकता था, तू उससे भिड़ सकता था। पर तुझे क्या साबित करना है?"
"कि वो धमका रहा था," मैंने कहा।
"कब?"
"आज। दोपहर के बाद।"
"कितने बजे?"
मैं रुक गया। मैंने सोचा। मुझे याद नहीं था। मुझे याद था कि दुपहर में मैंने टिंकू को पीछे के कमरे में छिपाया था, मुझे याद था कि सूरज कहाँ था — पीपल की छाया कहाँ से शुरू हो रही थी — पर घड़ी का वक़्त याद नहीं था।
"दो या ढाई बजे," मैंने कहा। मेरी आवाज़ में ही शक था।
दुबे अंकल ने सिर हिलाया, धीरे-धीरे, जैसे अंदर ही अंदर कोई हिसाब लगा रहे हों।
"दो या ढाई," उन्होंने दोहराया। "और जो वक़्त नहीं होता, वो काग़ज़ में अदालत में कोई नहीं मानता। अब बता, कितने आदमी थे उसके साथ?"
"दो। एक के हाथ में मोटी लाठी थी, दूसरे के हाथ में काला बैग था।"
"उनके नाम?"
"मुझे नहीं पता।"
"उनकी शक्ल? कद? कौन सा कपड़ा?"
मैंने आँखें बंद करनी चाहीं, पर वो दृश्य पूरा नहीं आया। मुझे सिर्फ़ बबलू का चेहरा याद था, उसका चबाया हुआ पान, उसकी सोने की चेन, उसकी आवाज़। बाकी दोनों धुँधले थे, जैसे किसी अधूरी तस्वीर में पीछे खड़े लोग।
"नहीं याद," मैंने कहा। और यह कहते हुए मुझे गुस्सा आया, अपने ऊपर।
"अब सुन," दुबे अंकल ने कहा, और उन्होंने उँगली मेज़ पर रख दी। "धमकी साबित करने के लिए तीन चीज़ें चाहिए। एक, तारीख़। दो, गवाह। तीन, लिखा हुआ काग़ज़। तीनों में से एक भी कम पड़ा, तो धमकी हवा में उड़ जाती है, और धमकी देने वाले को कोई कुछ नहीं कहता। समझा?"
"समझा।"
"तो अब बता। तेरे पास इन तीनों में से क्या है?"
मैं चुप बैठा रहा। मेरी जेब में घंटी थी और घंटी चुप थी। मुझे लगा जैसे वो भी सुन रही है, और मेरी तरह हिसाब लगा रही है।
"तारीख़ मेरे पास है," मीरा ने कहा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसने बैग से अपना फ़ोन निकाला, उँगली से कुछ छुआ, और स्क्रीन की तरफ़ देखा।
"रिकॉर्डिंग में वक़्त दिख रहा है," उसने कहा। "और मैं सब जगह नहीं जाती, पर यहाँ के हर बड़े की तारीख़ मेरे फ़ोन में है। बबलू की धमकी सुनाई दे रही है, बोर्ड उतारने की बात सुनाई दे रही है, घंटी की बात सुनाई दे रही है।"
दुबे अंकल ने उसका फ़ोन नहीं छुआ। उन्होंने देखा भी नहीं। वो बस बोले, "यह चीज़ अदालत में मानी जाती है या नहीं, मुझे नहीं पता। पर मैं इसे अपनी कॉपी में लिख सकता हूँ कि लड़की ने आकर बताया और रिकॉर्ड दिखाया। और मेरी कॉपी में लिखी तारीख़ किसी भी फ़ोन से पुरानी है, क्योंकि काग़ज़ पर लिखी तारीख़ को कोई मिटा नहीं सकता।"
मीरा ने फ़ोन रख लिया। फिर उसने कुछ सोचा और धीरे से बोली, "दुबे अंकल, एक बात पूछ सकती हूँ?"
"पूछो।"
"आप इतने साल इस थाने में रहे। आपको पता था कि गली में अंगूठे लिए जा रहे हैं। फिर आपने पहले कुछ क्यों नहीं किया?"
मेरी साँस रुक गई। सीधा सवाल था, और मीरा ऐसे ही सवाल पूछती है। वो कभी नहीं सोचती कि सामने वाले का चेहरा क्या हो जाएगा।
दुबे अंकल कुछ देर चुप रहे। फिर उन्होंने रजिस्टर का पन्ना उलटा और उस पर अपनी हथेली रख दी।
"क्योंकि काग़ज़ झूठ बोल सकता है," उन्होंने कहा। "अगर उस पर स्याही सही हाथ से लगी हो। और मैंने देखा है कि जब गरीब आदमी अपना अंगूठा लगाता है, तो उसे कभी पढ़ना नहीं आता। और जो पढ़ नहीं सकता, उसका अंगूठा उसका गवाह नहीं, उसकी जंजीर बन जाता है। मैंने सोचा था कि मैं इस जंजीर को तोड़ नहीं सकता, क्योंकि जंजीर वाले के हाथ बड़े हैं। मैं ग़लत था। मैं तोड़ नहीं सकता था, पर मैं उसे पकड़ सकता था। और मैंने नहीं पकड़ा।"
उन्होंने रुककर मेरी तरफ़ देखा।
"यह मेरा हिसाब है, अंकुश। मेरे अपने खाते में नाम है, और वो मैं आज भी नहीं मिटा पाया।"
मैंने कुछ कहने की कोशिश की, पर आवाज़ नहीं निकली।
वो उठे, अलमारी के पास गए, और उसमें से एक दूसरा रजिस्टर निकाला। यह पहले वाले से पतला था, कवर पर सिर्फ़ नीला कपड़ा था और कोने पर एक अक्षर लिखा था, जो पुराना पड़कर मिट गया था।
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