The Mysterious Bell – Chapter 155
भोला भाई ने गिलास मेरी मेज़ पर रखा। उनके हाथ अब भी काँप रहे थे, पर अब वो काँपना डर का नहीं था, गुस्से का था। उन्होंने कुछ कहना चाहा, फिर रुक गए, और मेरी तरफ़ देखकर बस इतना कहा, "अंकुश, मैं उसके आगे नहीं बोलूँगा। मैं उसके सामने कुछ नहीं बोलूँगा। पर तेरे साथ रहूँगा। जब भी बुलाएगा, पहुँच जाऊँगा।"
"भोला भाई," मैंने कहा, "आप मेरे साथ नहीं, अपनी दुकान के साथ खड़े रहिए। मेरे साथ खड़े होने की ज़रूरत नहीं। मेरे साथ आपकी दुकान खड़ी हो जाए, बस इतना काफ़ी है।"
वो हँसे। पहली बार आज सुबह से, सच में हँसे।
टिंकू अब भी मेरी दुकान के दरवाज़े पर खड़ा था, और उसका हाथ अब भी उस साइकिल की घंटी पर था, जैसे उसे छोड़ने का नाम ही न ले रहा हो। उसने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में वो डर था जो तेरह साल के लड़के की आँख में बहुत बड़ा दिखता है।
"उस्ताद," उसने धीरे से कहा, "मैंने बिना पूछे घंटी बजा दी। आपने कहा था, पीछे रहना।"
मैं उसके पास गया और उसके सिर पर हाथ रखा।
"टिंकू," मैंने कहा, "आज तूने वो किया जो मुझे करना चाहिए था। और तूने सही वक़्त पर किया।" मैंने उसकी उँगलियाँ घंटी से हटाईं। "बस अब इस घंटी को छोड़ दे। यह बात करने वाली घंटी नहीं है। यह सिर्फ़ बजने वाली है।"
मीरा ने अपना कैमरा बंद किया और उसे बैग में रखा। फिर वो मेरे पास आकर एक स्टूल पर बैठ गई, जैसे उसके पैरों से सारी ताक़त निकल गई हो।
"तुम जानते हो," उसने कहा, "यह पहली बार है कि किसी ने मेरे कैमरे के सामने से हाथ नहीं खींचा?"
"किसी ने कभी छीनने की कोशिश नहीं की?"
"कई बार की।" उसने अपना बैग सीधा किया। "पर उन सबमें एक बात थी — पीछे कोई खड़ा नहीं था। आज पीछे तुम थे, भोला भाई थे, शबनम आपा की चिमटी थी, चार बच्चे थे, और अब दुबे अंकल भी हैं। इतने सारे लोग किसी काम के लिए इकट्ठे हुए हों, यह पहली बार हुआ।"
"अभी इकट्ठे नहीं हुए," मैंने कहा। "अभी सिर्फ़ खड़े हुए हैं। इकट्ठे दस बजे होंगे।"
"दस बजे," उसने दोहराया, और उसकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो मुझे अच्छी लगती है — बिना डर की जल्दबाज़ी। "और चार अंगूठे?"
"चार अंगूठों का हिसाब मिलाना है। एक-एक करके।"
"कैसे?"
मैंने जेब में हाथ डाला और घंटी को छुआ। वो ठंडी नहीं थी, न गरम। वो बस थी। जैसे कोई सो रहा हो और उसने मेरा हाथ महसूस कर लिया हो।
"मीरा," मैंने कहा, "तूने कहा था कि तेरे पास एक काग़ज़ है और मेरे पास एक घंटी है, और उसके पास पूरी बस्ती के अंगूठे हैं। सुन, उसके पास अंगूठे नहीं हैं। उसके पास काग़ज़ हैं। और अंगूठे उन काग़ज़ों पर हमारे लोगों के हैं। जिस दिन वो लोग अपना अंगूठा देखकर कहेंगे कि यह मेरा है और मैंने यह नहीं बेचा — उस दिन उसके पास कुछ नहीं बचेगा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा, और मुझे लगा कि उसने कुछ पूछना चाहा, फिर रोक लिया।
तभी दुबे अंकल आगे आए।
उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा। उनका हाथ भारी था, ऐसा भारी जैसे पुरानी लकड़ी की अलमारी का दरवाज़ा।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "एक बात सीधी पूछूँ?"
"पूछिए।"
"तेरी जेब में क्या है?"
मैंने उनकी आँखों में देखा। वो हँस नहीं रहे थे। वो शक भी नहीं कर रहे थे। वो बस पूछ रहे थे, जैसे कोई अपने ही आदमी से पूछता है।
"घंटी है," मैंने कहा। "पुरानी साइकिल की।"
"वही जिसकी बात बबलू कर रहा था?"
"वही।"
दुबे अंकल ने कुछ देर मेरी जेब की तरफ़ देखा। फिर उन्होंने उसे छुआ नहीं, बस देखा और अपना हाथ वापस खींच लिया।
"मैंने पैंतीस साल में बहुत चीज़ें देखी हैं," उन्होंने कहा। "झगड़े, चाकू, काग़ज़, अंगूठे, आँसू। पर मैंने कभी नहीं देखा कि गली के लोग एक आदमी के सामने एक साथ खड़े हों, जबकि वो आदमी सिर्फ़ धमका रहा हो। आज पहली बार देखा। और मुझे यह अच्छा लगा।"
उन्होंने चबूतरी की तरफ़ देखा, जहाँ सानिया अपनी लाल कॉपी में सब कुछ लिख रही थी।
"एक बात और," उन्होंने कहा। "जब मैं वर्दी में था, तो मेरे पास एक कॉपी थी। उसमें मैं हर शिकायत लिखता था, तारीख़ के साथ। आज भी वो कॉपी मेरे पास रखी है। उसकी तारीख़ें पुरानी नहीं हुई हैं। काग़ज़ की तारीख़ कभी पुरानी नहीं होती। वो बस इंतज़ार करती है।"
मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो गई।
"दुबे अंकल," मैंने कहा, "आपके पास जो काग़ज़ हैं—"
"वो मेरे पास हैं," उन्होंने कहा। "पर वो मेरे नहीं हैं। वो गली के हैं। और आज तक मैंने उन्हें इसलिए नहीं निकाला कि कोई उन्हें पढ़ने वाला नहीं था। आज पढ़ने वाला मिल गया है।"
उन्होंने मीरा की तरफ़ देखा।
"यह लड़की?"
"यह लड़की," मैंने कहा।
"इसका चैनल क्या है?"
"बस्ती की आवाज़।"
दुबे अंकल ने एक लंबी साँस ली, और मुझे लगा जैसे उन्होंने पैंतीस साल की कोई गठरी उतार दी हो।
"अच्छा नाम है," उन्होंने कहा। "पर नाम से कुछ नहीं होता। सुन लो, दोनों। मैं अब थाने जा रहा हूँ। और तुम —" उन्होंने मेरी तरफ़ उँगली उठाई, और उनकी उँगली अब काँप नहीं रही थी, वो सीधी थी और साफ़। "तुम मेरे साथ थाने चलो।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने बैग कंधे पर चढ़ाया और खड़ी हो गई।
"अकेले?" मैंने पूछा।
"अकेले क्यों?" दुबे अंकल ने कहा। "जब पूरी गली चल रही है।"
उन्होंने पीपल की तरफ़ देखा, जहाँ अब भी चार बच्चे चबूतरी पर खड़े थे, और फिर मेरी दुकान के बोर्ड की तरफ़, और फिर उस गली की तरफ़ जो आगे थाने तक जाती है।
"अब तुम मेरे साथ थाने चलो," उन्होंने कहा। "यह झगड़ा गली का नहीं है, काग़ज़ का है। और गली के झगड़े मैं चबूतरी पर निपटा देता हूँ। काग़ज़ के झगड़े कॉपी में लिखे जाते हैं।"
॥
दुबे अंकल ने अपनी कुर्सी उठाई और चलने लगे। कुर्सी की एक टाँग में लकड़ी का छोटा टुकड़ा कील से जुड़ा था, जो ज़मीन पर टिकते ही अजीब सी आवाज़ करता था — जैसे कोई बूढ़ा आदमी उठते वक़्त हल्का सा कराह देता है। वो आवाज़ मुझे अचानक बहुत जानी-पहचानी लगी, क्योंकि हमारी गली में हर चीज़ ऐसी ही है — टूटी, जुड़ी, फिर भी चलती हुई।
मीरा ने अपना बैग कंधे पर ठीक किया और मेरे बगल में चलने लगी। उसने कुछ नहीं कहा। बस एक बार मेरी तरफ़ देखा और होंठ सिकोड़े, जैसे कह रही हो — देखते हैं क्या निकलता है।
चबूतरी से चारों बच्चे उतर आए। सानिया अपनी लाल कॉपी सीने से लगाए हुई थी, जैसे वो कोई खज़ाना हो। गुड्डू और रफ़ीक़ पीछे-पीछे चुपचाप चलने लगे, और चिंटू तो इतना करीब आ गया कि उसका कंधा मेरी कमर से टकराता रहा।
"चिंटू," मैंने धीमे से कहा। "थाने में सबको साथ लेकर नहीं घुसते।"
"मैं तो बाहर ही रहूँगा," उसने बड़ी गंभीरता से कहा। "पर अगर अंदर से कोई आवाज़ आए तो मैं दौड़कर अंदर आ जाऊँगा।"
"अच्छा," मैंने कहा। "और अगर मैं चुप रहूँ तो?"
वो एक पल सोचकर बोला, "तो मैं समझ जाऊँगा कि आप उलझ गए हो। फिर मैं चबूतरी पर जाकर शबनम आपा को बुला लाऊँगा।"
मीरा हँस पड़ी। पहली बार उस दिन में। हँसी छोटी थी, फिर भी असली थी।
शबनम आपा गुमटी से निकलकर आई और उसने मेरे हाथ में एक स्टील का गिलास पकड़ा दिया, बिना पूछे।
"चाय," उसने कहा। "पी ले। थाने में बैठकर रोना नहीं पड़ेगा।"
"आपा, मैं रोता नहीं।"
"तो और अच्छा।" उसने मेरी तरफ़ देखा और आवाज़ धीमी कर दी। "सुन, अंकुश। जब मैं तेरी उम्र की थी, मेरे पापा भी एक बार इसी थाने में बैठे थे। उस वक़्त कोई शबनम आपा उनके हाथ में चाय नहीं पकड़ाती थी। इसलिए मैं पकड़ा रही हूँ। तेरा कोई हिसाब नहीं, मेरा अपना।"
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