The Mysterious Bell154 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 154

7 min read November 5, 2026

मीरा पीछे हटी। उसकी एड़ी दुकान के बाहर खड़ी उस साइकिल से टकराई, जिसे कोई ग्राहक छोड़ गया था। साइकिल डगमगाई।

और तभी पीछे वाले कमरे का दरवाज़ा खुला।

टिंकू बाहर निकला, उसका चेहरा सफ़ेद, हाथ काँपते हुए। उसने कुछ सोचा नहीं। उसने बस अपना हाथ बढ़ाया, उस साइकिल के हैंडल पर लगी घंटी पकड़ी और ज़ोर से घुमा दी।

ट्रिंग-ट्रिंग-ट्रिंग-ट्रिंग।

वो आवाज़ गली में इस तरह फटी जैसे किसी ने सबके कान में उँगली डाल दी हो।

और उसी के साथ बच्चों की टोली फूट पड़ी।

सानिया चबूतरी से उछली और चिल्लाई, "अरे! कैमरा छीन रहा है! कैमरा छीन रहा है!" गुड्डू ने अपनी साइकिल की घंटी पकड़ी और पागलों की तरह बजाने लगा। रफ़ीक़ चबूतरी की पट्टी पर थपकियाँ देकर शोर मचाने लगा और चिंटू ने अपने दोनों हाथ मुँह पर रखकर वो सीटी बजाई जो वो स्कूल की छुट्टी में बजाता है।

पूरी गली में शोर। "चोर! चोर! कैमरा चोर!"

शबनम आपा गुमटी से निकलीं, हाथ में लोहे की चिमटी, जो अभी-अभी गरम समोसे से उठाई थी।

"हट बबलू!" उन्होंने आवाज़ की, ऐसी आवाज़ जो गली के मुहाने तक गई। "मेरी चिमटी गरम है और मेरी ज़ुबान उससे भी गरम है। छोड़ लड़की का हाथ।"

मैं उस वक़्त तक बढ़ चुका था।

मैंने बबलू की कलाई पकड़ी। उसकी कलाई पर सोने की चेन लिपटी हुई थी और उँगली में एक मोटी अँगूठी थी, और उसकी चमड़ी पर पसीना था जो चिपचिपा था और उसमें पान की गंध थी। मैंने पूरी ताक़त से पकड़ा। मेरी उँगलियाँ ग्रीस से भरी थीं और उसका हाथ फिसल रहा था, पर वो निकल नहीं पाया।

उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो गुस्सा था जो अपने ही बड़े आदमी के सामने बेइज़्ज़त होने के डर से आता है।

"हाथ छोड़, मिस्त्री," उसने दाँतों के बीच से कहा।

"छोड़ दूँगा," मैंने कहा। "पर एक बात पहले सुन ले।"

"क्या?"

"गली में हाथ नहीं चलता भाई।" मैंने उसकी कलाई थोड़ी और कसी। "यहाँ बात चलती है। हाथ चलाना हो तो नए बाज़ार जा। वहाँ सब चलता है — लाठी, बैग, मशीन, काग़ज़। पर यहाँ पीपल के नीचे बस एक चीज़ चलती है, और वो है बात।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसका हाथ अब भी काँप रहा था, पर कैमरा उसने ऊपर ही रखा हुआ था। लाल बत्ती जल रही थी।

बबलू ने एक पल सोचा। उसके दोनों आदमियों ने एक-दूसरे को देखा। लाठी वाले ने लाठी थोड़ी उठाई, और उसी वक़्त मेरी जेब में घंटी ठंडी हुई और धीमे से बोली, इतनी धीमे कि सिर्फ़ मैंने सुनी।

"पीछे हट रहा है। पर जा नहीं रहा।"

और फिर गली की हवा बदली।

कोई जल्दी में नहीं आ रहा था। कोई दौड़ता हुआ नहीं आ रहा था। बस चबूतरी के उस पार से एक आदमी आ रहा था, धीरे-धीरे, नीली शर्ट पहने हुए, जिसके बटन ऊपर तक लगे हुए थे और जिसकी आस्तीन सही-सही मोड़ी हुई थी।

दुबे अंकल।

वो अपनी कुर्सी से उठे थे — वही कुर्सी जो थाने के सामने पिछले बीस साल से एक ही जगह खड़ी है। उन्होंने अपना चश्मा जेब से निकालकर पहना और गली के बीच आकर खड़े हो गए। पीछे से आ रही धूप उनकी नीली शर्ट पर पड़ रही थी और उनकी छाया मेरी दुकान के बोर्ड तक पहुँच रही थी।

"बबलू," उन्होंने कहा।

बस इतना। नाम। कोई चीख नहीं, कोई धमकी नहीं। सिर्फ़ नाम।

और बबलू की कलाई मेरे हाथ में ढीली पड़ गई।

"दुबे साहब," बबलू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो मिठास अचानक लौट आई जो कुछ मिनट पहले मीरा के लिए निकली थी। "आप? आप तो आराम कर रहे थे। मैं तो बस —"

"मैं आराम कर रहा था," दुबे अंकल ने कहा। "पर गली में इतना शोर हुआ कि मुझे लगा किसी का घर गिर गया। सो मैं देखने आ गया। और देखा कि घर नहीं गिरा, एक आदमी गिर रहा है।"

उन्होंने मीरा की तरफ़ देखा।

"बेटी, वो जलती हुई बत्ती क्या है?"

"कैमरा है, दुबे अंकल," मीरा ने कहा। "रिकॉर्ड चल रहा है।"

"अच्छा।" दुबे अंकल ने सिर हिलाया, जैसे उन्हें रोज़ ऐसी चीज़ें दिखती हों। "यानी जो कुछ हुआ, वो अंदर बंद हो गया।"

"हाँ।"

"फिर ठीक है।"

उन्होंने बबलू की तरफ़ देखा और मेरे हाथ से उसकी कलाई छुड़वा ली। बस एक इशारे से। मैंने छोड़ दी।

"बबलू," उन्होंने कहा, और अब उनकी आवाज़ धीमी थी, बहुत धीमी, जैसे कोई पुरानी कॉपी का पन्ना पलट रहा हो। "यह कैमरा चीज़ है न? मैंने टीवी पर देखा है। इसमें सब अंदर चला जाता है। और फिर बाद में वो बाहर आता है, और उस वक़्त आदमी के पास अपनी बात बदलने का मौक़ा नहीं रहता।"

"साहब, मैं तो —"

"मैं जानता हूँ तू क्या कर रहा था," दुबे अंकल ने कहा। "मैं पैंतीस साल उस थाने में बैठा हूँ, बबलू। मेरी वर्दी उतर गई, पर मेरी कॉपी नहीं उतरी। और मेरी कॉपी में तेरा नाम इस वक़्त भी लिखा हुआ है — पुराना नाम, नया नाम, दोनों।"

बबलू के चेहरे पर पसीना और बढ़ गया।

"यह कैमरा छूना," दुबे अंकल ने कहा, और उन्होंने कैमरे की तरफ़ उँगली उठाई, "तेरे लिए महँगा पड़ेगा। इतना महँगा कि तेरे साहब भी तुझे बचाने के लिए अपनी जेब नहीं खोलेंगे। क्योंकि तेरे साहब की जेब में सिर्फ़ काग़ज़ हैं, और काग़ज़ किसी का हाथ नहीं पकड़ता।"

गली में कोई नहीं हँसा। पर मुझे लगा कि सबके अंदर कुछ हँसा।

बबलू ने एक कदम पीछे हटकर अपनी कलाई सहलाई। उसने अपनी चेन ठीक की, जो झूलकर उसके सीने पर आ गई थी। उसने मुँह पोंछा और इधर-उधर देखा — कैमरा, दुबे अंकल, भोला भाई, शबनम आपा की उठी हुई चिमटी, चबूतरी पर खड़े चार बच्चे, और मैं।

"ठीक है," उसने कहा। उसकी आवाज़ में अब भी वो लपेट थी, वो चीनी जो खल खा चुकी थी। "ठीक है, दुबे साहब। आपकी इज़्ज़त है। आप कह रहे हैं, तो मैं चला जाता हूँ। पर एक बात सब सुन लें।"

उसने अपना पानदान जेब से निकाला, खोला, बंद किया।

"कैमरा तुम्हारे पास रहे, मीरा बेटी," उसने मीरा की तरफ़ देखकर कहा। "पर काग़ज़ किसके पास है, यह साहब जानते हैं। और साहब को यह भी पता है कि तुम्हारे उस्ताद के पास एक पुरानी घंटी है जो बोलती है।"

मेरी जेब में घंटी ठंडी हुई।

"साहब को सब पता चल जाएगा," बबलू ने कहा। "वैसे भी दस बजे सभा है। वहाँ सब सामने आ जाएगा। और वहाँ जो सामने नहीं होगा, वो सच नहीं, वो सिर्फ़ चुप्पी कहलाएगी।"

उसने दुबे अंकल की तरफ़ देखा और सिर झुकाया, जैसे कोई पुरानी फ़ाइल पर हस्ताक्षर कर रहा हो।

"आपका दिन अच्छा जाए, साहब।"

"तेरा भी," दुबे अंकल ने कहा। "पर मेरी एक सलाह है। तू मोटा है, बबलू। अब गली में दौड़ने की कोशिश मत करना। यहाँ गड्ढे बहुत हैं।"

बबलू कुछ नहीं बोला। वो पलटा और अपने दोनों आदमियों के साथ गली के मुहाने की तरफ़ चल दिया।

इस बार वो धीरे चला। जाते हुए मैंने देखा कि उसके कदम गली के बीच बने उस पत्थर से बचकर निकले, जो पीपल की जड़ से उभरा हुआ है, और जिस पर से हर बच्चा कूदकर निकलता है।

जब वो गली के मोड़ पर पहुँचा, तो वहाँ से एक बार पलटकर देखा — बस एक बार। और उस नज़र में डर नहीं था। हिसाब था। जैसे वो गिन रहा हो कि यहाँ कितने लोग खड़े हैं, और कितने उसके साथ आएँगे।

फिर वो मुड़ गया और गायब हो गया।

गली में चुप्पी नहीं लौटी। इस बार शोर लौटा — पर नया शोर। रफ़ीक़ ने चबूतरी पर से उछलकर कहा, "भाग गया! भाग गया!" और चिंटू ने तीन बार सीटी बजाई। सानिया ने अपनी लाल कॉपी निकाली और उसमें कुछ लिखने लगी, जैसे कोई पुलिस वाला चालान लिख रहा हो।

शबनम आपा ने चिमटी वापस गुमटी में रखी और पूरी गली को आवाज़ दी, "जिसे चाय चाहिए, आ जाए। और जिसे होश चाहिए, वो भी आ जाए। आज मुझे किसी से पैसा नहीं चाहिए।"

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