The Mysterious Bell – Chapter 153
उसने भोला भाई की तरफ़ देखा और उसकी आँखें रुक गईं।
"भोला भाई? आप यहाँ?"
भोला भाई ने सिर हिलाया।
मीरा ने बैग खोला और उसमें से कुछ काग़ज़ निकाले — पीले, मुड़े हुए, एक-दूसरे में फँसे। "तुम्हें पता है, पिछले दो महीने में इस गली में चार लोगों ने बिना पढ़े काग़ज़ों पर अंगूठा लगाया है। मुझे नहीं पता था। मुझे अभी सुबह पता चला, जब मैंने इन काग़ज़ों को दोबारा देखा।"
"इसका मतलब?" मैंने पूछा।
"इसका मतलब यह है," उसने काग़ज़ मेज़ पर फैलाते हुए कहा, "कि तुम्हारा आदमी सिर्फ़ ज़मीन नहीं खरीद रहा। वो लोगों के अंगूठे खरीद रहा है। और जब तक हम इन अंगूठों का हिसाब नहीं लगाएँगे, कोई भी काग़ज़ किसी भी दिन निकल सकता है।"
मैंने उन काग़ज़ों को देखा। एक पर साइकिल गली का नाम। एक पर दुकान का। एक पर अस्पताल की ज़मीन का।
और मैंने उँगली से उन काग़ज़ों को छुआ, एक छोर से दूसरे छोर तक, जैसे किसी की बीमारी पर हाथ रख रहा हो।
"मीरा," मैंने कहा। "तुम्हें नीलामी का नोटिस किसने भेजा था?"
"किसी ने नहीं। दरवाज़े के नीचे आया था। बिना लिफ़ाफ़े के, बिना नाम के।"
"तो किसी ने तुम्हें इस काम में धकेला है।"
"या किसी ने मुझे चेताया है," उसने कहा और मेरी तरफ़ देखा, और मुझे लगा कि उसने अपने सवाल का जवाब ख़ुद दे दिया।
तभी बाहर से बबलू की आवाज़ आई। वो चबूतरी पर बैठा ही चिल्ला रहा था, जैसे उसे कोई जल्दी हो।
"अंकुश यादव!"
मैं बाहर आया। धूप सिर पर आ चुकी थी, और पीपल की छाया चबूतरी से खिसक कर नीचे ज़मीन पर आ गई थी। बबलू ने पान का पीक फिर दिया, इस बार दुकान की दहलीज़ की तरफ़।
"शाम तक," उसने दोनों हाथों से उँगलियाँ गिनकर दिखाईं, जैसे किसी बच्चे को सिखा रहा हो। "बोर्ड उतर गया, घंटी उतर गई, शटर नीचे। फिर भी नहीं किया, तो साहब के आदमी दस बजे वाली सभा में ख़ुद आएँगे। और यह नहीं कहूँगा कि वो क्या करेंगे। क्योंकि जब वो बोलते हैं, तो मुझे भी नहीं बताया जाता।"
वो हँसा। उसकी हँसी में वो सब था जो मुझे अंदर तक चुभता है। वो हँसी जो कहती है — मैं तुमसे ऊपर हूँ, और तुम जो कुछ करोगे, वो मेरे हिसाब की किताब में एक लाइन से ज़्यादा नहीं।
और फिर वो उठा, अपना पानदान जेब में रखा, और अपने दोनों आदमियों के साथ गली के मुहाने की तरफ़ चल दिया।
मैं उसके जाते हुए पीठ को देखता रहा। पीतल की घंटी मेरी जेब में ठंडी थी, जैसे उसने मेरे सारे ख़ून को अपनी तरफ़ खींच लिया हो।
मैंने उसे दबाया।
"क्या?" उसने पूछा।
"अब क्या?" मैंने पूछा। "अंक एक सौ अठारह।"
"हाँ।"
"कुछ और दिखाना है?"
एक लंबी चुप्पी।
और फिर मेरी जेब से वो आवाज़ आई जो मुझे हमेशा सही वक़्त पर नहीं, थोड़ा पहले आती है — और शायद इसीलिए सही वक़्त पर मानी जाती है।
"दर्द दिख गया," घंटी ने धीमे से कहा। "पर डर अभी गली में बैठा है।"
मैंने गली की तरफ़ देखा। एक-एक करके शटर उठ रहे थे, धीरे-धीरे, जैसे कोई झाँक रहा हो कि बबलू गया या नहीं। और भोला भाई मेरे पीछे खड़े थे, और उनका गिलास अब भी हाथ में था और उनके हाथ अब भी काँप रहे थे, पर कुछ कम।
मैं पलटा।
और तभी मैंने देखा — मीरा दुकान के दरवाज़े पर खड़ी थी। उसने अपना बैग कंधे से उतार दिया था और उसका कैमरा हाथ में था। उसने उसे चालू कर दिया था। लाल बत्ती जल रही थी, और वो बत्ती सीधे मेरे चेहरे पर पड़ रही थी।
"तुमने कब चालू किया?" मैंने पूछा।
"जब वो चबूतरी पर बैठा," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में कोई डर नहीं था, कोई जल्दबाज़ी नहीं थी। "और जब उसने भोला भाई से कहा कि बोल, तब भी।"
"यह मतलब कि सब रिकॉर्ड है?"
"सब," उसने कहा। "उसकी चेन से लेकर उसके पान के पीक तक।"
और फिर उसने कैमरा नीचे किया, पर बंद नहीं किया।
"अंकुश," उसने धीरे से कहा, "एक बात पूछूँ?"
"पूछो।"
"तुमने अभी अंदर जाकर भोला भाई से जो पूछा — पैसे, काग़ज़, कोरा अंगूठा — तुम्हें यह सब कैसे पता चला?"
मैंने उसकी आँखों में देखा। और मुझे याद आया कि मैं झूठ नहीं बोल सकता, पर चुप रह सकता हूँ।
"मैंने देखा," मैंने कहा। "उसकी आँखें बता रही थीं।"
मीरा ने एक पल मुझे देखा। फिर होंठ हिलाए, जैसे कुछ कहना चाहती हो और रोक लिया हो। और फिर उसने कैमरा अपने बैग में रखा और कहा, "ठीक है। तो अब बताओ, दस बजे तक हम क्या करें? क्योंकि मेरे पास सिर्फ़ एक काग़ज़ है, और तुम्हारे पास एक घंटी है। और उस आदमी के पास पूरी बस्ती के अंगूठे हैं।"
मैंने पीपल की तरफ़ देखा। चबूतरी खाली थी, पर उस पर बबलू के बैठने का निशान अभी भी था — पान का गीला दाग, जो धूप में सूख रहा था।
"मीरा," मैंने कहा, "अब हमें अंगूठों का हिसाब मिलाना है। एक-एक अंगूठा। और उससे पहले हमें उन लोगों को ढूँढना है जो डर के मारे चुप बैठे हैं।"
"कितने लोग?"
"पता नहीं," मैंने कहा और जेब में घंटी को फिर दबाया। "पर घंटी कह रही है कि डर अभी गली में बैठा है। मतलब वो कहीं गया नहीं है। मतलब वो हमारे बीच ही है।"
और मैंने साँस लेकर देखा — गली में, उस पीपल के नीचे, जहाँ बुज़ुर्ग बैठते हैं, उस चबूतरी पर अब कोई नहीं था, पर उसके नीचे ज़मीन पर एक जगह गीली थी।
बस वहीं से डर उठेगा, मुझे पता था। और वो डर किसी और का नहीं, हमारे ही किसी भाई का होगा।
॥
मैंने घंटी को जेब में रखा और उस पान के गीले दाग को देखता रहा, जो चबूतरी पर धूप में सूख रहा था।
मीरा मेरे पास से निकली। उसने कैमरा कंधे तक उठाया, लाल बत्ती जलती हुई, और सीधे गली के मुहाने की तरफ़ आवाज़ दी।
"बबलू भाई!"
बबलू के कदम रुक गए।
पहले उसके दोनों आदमी पलटे — लाठी वाला पहले, काला बैग वाला उसके पीछे। और फिर बबलू ख़ुद पलटा, धीरे-धीरे, जैसे कोई बड़ी गाड़ी रिवर्स में आ रही हो।
"क्या बोली?" उसने पूछा।
मीरा ने कैमरा थोड़ा और ऊपर किया।
"मैंने कहा, बबलू भाई," उसने साफ़-साफ़ कहा। "यह सब रिकॉर्ड हो रहा है। तो अपनी ज़ुबान सँभाल के बोलिए।"
गली में एक झटके में चुप्पी फैल गई। शबनम आपा के करछुल की खड़खड़ाहट भी रुक गई। भोला भाई, जो मेरे पीछे खड़े थे, उन्होंने गिलास दोनों हाथों से पकड़ लिया, जैसे अब कोई और चीज़ गिरने वाली हो।
बबलू ने एक पल कैमरे को देखा। फिर मीरा को देखा। फिर वो हँसा।
वो हँसी मुझे अब तक की सबसे बेकार हँसी लगी। न उसमें मज़ाक था, न शरारत। बस एक आदमी अपनी जेब टटोल रहा था कि डर कहाँ रखा था।
"अरे, यह तो वही लड़की है," उसने अपने आदमियों से कहा, मुझे दिखाते हुए, जैसे मैं गली का कोई खंभा हूँ। "जो हर बात का वीडियो बनाती फिरती है। माइक वाली। सुना नहीं तुमने? पूरी बस्ती में अपना चैनल चलाती है। ख़ुद का। कोई बड़ा चैनल होता तो बात भी बनती।"
लाठी वाला आदमी हँसा। बबलू ने पान का रस गले से उतारा और मीरा की तरफ़ एक कदम बढ़ाया।
"देख बेटी," उसने मीठी आवाज़ में कहा, "यहाँ जो बातें होती हैं, वो बातें ही रहती हैं। काग़ज़ पर आ जाएँ तो बात बिगड़ती है। तू कैमरा नीचे कर दे। मैं तेरी भलाई की बात कर रहा हूँ।"
मीरा ने कैमरा नीचे नहीं किया।
"आप मेरी भलाई की बात कर रहे हैं," उसने कहा, "और मैं इस वक़्त आपकी बात रिकॉर्ड कर रही हूँ। दोनों अपनी-अपनी नौकरी कर लें।"
बबलू की हँसी चेहरे पर जम गई, जैसे दूध फट गया हो।
और फिर वो झपटा।
भगवान गवाह है, इतने मोटे शरीर से इतनी तेज़ी मैंने कभी नहीं देखी। वो दो कदम में मीरा के सामने पहुँचा और उसका हाथ पकड़कर कैमरा खींचने लगा।
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