The Mysterious Bell – Chapter 152
वो पीपल की तरफ़ मुड़ा। और तभी उसने एक और बात कही, बिना मुड़े, बिना देखे, एकदम हल्के लहजे में, जैसे बस हवा में बोली गई हो।
"और भोला भाई, तुम्हारे बेटे की जो बात साइट पर चल रही थी न… वो भी आज शाम से पक्की है। तुम समझ रहे हो।"
भोला भाई ने सिर झुका लिया।
वो ज़मीन देखने लगे। और मैंने देखा कि उनके गाल पर एक दाना-सा फड़क रहा था — वो थकान का दाना नहीं था, वो शर्म का था।
बबलू लाठी और काले बैग वाले आदमियों के साथ पीपल की तरफ़ चला गया। वहाँ पत्थर की चबूतरी है। उसने उस पर चढ़कर, जैसे कोई अपना घर हो, बैठ जाने जैसा आराम जमाया। लाठी वाला एक तरफ़ खड़ा हो गया। काला बैग वाला दूसरी तरफ़। और बबलू ने पान निकाला, चबाया, और एक पीक चबूतरी के किनारे पीपल की जड़ पर दे दी।
वो जानता था। वो जानता था कि जब तुम किसी के सामने बैठकर चबाते हो, तो तुम जीत जाते हो। और जो खड़ी गली देख रही है, वो चबूतरी पर बैठे आदमी को देखती है और समझ जाती है कि आज गली में किसकी चल रही है।
मैंने पलटकर गली देखी।
आधे शटर उठे, फिर झुके। किसी ने खिड़की बंद की। किसी ने तौलिया उतार लिया। शबनम आपा की चिमटी अब भी हवा में थी, और उनका चेहरा लाल था। वो मेरी तरफ़ देख रही थीं और उनका मतलब साफ़ था — बोल, अभी बोल, क्यों चुप है?
पर मैंने अपनी घंटी की बात मानी। कुछ चीज़ें ज़ुबान से नहीं, वक़्त से खुलती हैं।
मैं भोला भाई का हाथ पकड़कर उन्हें दुकान के अंदर ले आया। टिंकू पीछे वाले कमरे के दरवाज़े से घुसकर बाहर झाँक रहा था, उसकी आँखें बड़ी थीं और उसके होंठ डरे हुए थे। मैंने उसे इशारे से पानी लाने को कहा। वो दौड़ा और स्टील का गिलास भरकर लाया, और भोला भाई के हाथ में थमा दिया।
भोला भाई ने गिलास पकड़ा पर पिया नहीं। उन्होंने बस उसे दोनों हाथों से पकड़कर छाती से लगा लिया।
"चाचा," मैंने कहा, जब गली की आवाज़ें धीमी हो गईं। "पैसे कब लिए थे?"
भोला भाई का गला भर आया।
"चार महीने पहले। नहीं, पाँच। तीन हिस्सों में।" उन्होंने गिलास में देखते हुए कहा। "बारह हज़ार हुए।"
"काग़ज़?"
"कोरा था।" उन्होंने आँखें बंद कर लीं। "उसने कहा, रसीद नहीं लिखेंगे, हम भाई-भाई हैं। बस अंगूठा लगा दे।"
"काग़ज़ अब कहाँ है?"
"यही तो नहीं पता…" भोला भाई की आवाज़ टूटी। "जिस दिन लिया, वो काग़ज़ मेज़ पर था। उसने स्याही की डिब्बी खोली, मेरा अंगूठा लिया, काग़ज़ मोड़ा और अपनी जेब में रख लिया। मैंने पूछा भी थोड़ी देर बाद, तो बोला — भोला, तू चिंता मत कर। काग़ज़ तो काग़ज़ है। और तेरी बीवी की दवा ज़रूरी है।"
टिंकू ने दरवाज़े से कहा, "उस्ताद, यह तो…"
"हाँ," मैंने कहा। "यह तो वही हुआ है।"
"वही क्या?" टिंकू ने पूछा।
"वही जो मेरे पापा के साथ हुआ था।"
भोला भाई ने मेरी तरफ़ देखा। और उनकी आँखों में वो डर अब किसी और रंग का हो गया था।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "अगर तूने मेरी वजह से किसी काग़ज़ की बात कही, और उसने मेरा बेटा साइट से निकाल दिया, तो मैं…"
"चाचा, आपका बेटा साइट पर कहाँ काम करता है?"
"नए बाज़ार के पास। सीमेंट ढोता है। छह महीने से।"
"किसने भेजा?"
"बबलू भाई ने ही।"
मैंने एक पल सोचा। मेरे दिमाग़ में एक साफ़ तस्वीर बन रही थी, जो मुझे अच्छी नहीं लग रही थी। एक आदमी जो टुकड़े-टुकड़े करके हर घर में घुसता है। वो किसी को डराकर नहीं, किसी की मजबूरी में शामिल होकर घुसता है। पैसा, नौकरी, अस्पताल, दवा, रसीद — सब उसी एक आदमी के हाथ में। और अगर मोहल्ला उसके साथ है, तो वो ज़मीन तो मुफ़्त में ले लेगा।
"चाचा," मैंने कहा, "एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"उसने कभी कहा कि यह काग़ज़ किस बारे में है?"
भोला भाई ने गिलास किनारे रख दिया।
"एक बार कहा था। पिछले महीने।" उनकी आवाज़ भारी हो गई। "उसने कहा — भोला, तेरी दुकान तो असल में चल ही नहीं रही। मैं तेरे काग़ज़ पर तेरा हाथ है न। सो जब बारी आए, तो तू कह देना कि मैं बिक्री के लिए तैयार हूँ। समझा?"
"और आपने क्या कहा?"
भोला भाई ने अपना फटा रूमाल जेब से निकाला, माथा पोंछा, और फिर उसे हाथ में मरोड़ते हुए बोले, "मैंने कुछ नहीं कहा। बस यही सोचा कि मैं क्या करूँ। दुकान है, तो बीवी की दवा है। दुकान गई, तो दवा भी गई। और मेरी बीवी अब चलना शुरू कर रही है, अंकुश। पहली बार। ऑपरेशन के बाद पहली बार उसने मुझे बुलाया और कहा — भोला, मेरा हाथ पकड़।"
वो चुप हो गए।
मेरी छाती में कुछ चटक-सा हुआ।
क्योंकि मैं जानता हूँ यह भावना। मैं यह भावना छह साल से पी रहा हूँ। जब माँ अस्पताल में हो, और डॉक्टर कहे कि इलाज के पैसे चाहिए, तब आदमी एक अंगूठा नहीं, अपनी पूरी ज़िंदगी लगा देता है — बस कोई माँगने वाला चाहिए। और ऐसे वक़्त में जो माँगने आता है, वो दुश्मन नहीं लगता।
"चाचा," मैंने उनका हाथ पकड़कर कहा, "आपने ग़लती नहीं की। आपको ग़लती में फँसाया गया है।"
"अंकुश…"
"और मैं आपसे कुछ नहीं माँगूँगा। न कोई काग़ज़, न कोई गवाही। मैं सिर्फ़ एक बात कहूँगा — आपकी दुकान पर कोई हाथ नहीं लगाएगा। देखिए, आज शाम नहीं आए, तो आपके बेटे का क्या होगा, यह सवाल मुझसे बड़ा है। तो इसका जवाब भी मैं अकेले नहीं दूँगा। हम सब मिलकर देंगे।"
"तू करेगा क्या?" भोला भाई ने पूछा। उनकी आवाज़ में वो व्यंग्य नहीं था। सिर्फ़ थकान थी।
"पता नहीं," मैंने कहा, और सच में पता नहीं था। "पर अभी सबसे ज़रूरी यह है कि आप बबलू से ऐसे नहीं मिलिए जैसे आज सुबह मिले थे। आज ऐसे मिलिए जैसे आपसे कोई कुछ माँग ही नहीं रहा।"
दरवाज़े पर शबनम आपा आईं। उनके हाथ में दो गिलास चाय थी, और उनका पल्लू कमर से खुल गया था, जिसे उन्होंने गुस्से से दबाया।
"चाय पी," उन्होंने भोला भाई की तरफ़ गिलास बढ़ाया। "और सुन, भोला — तू अगली बार उसके सामने ऐसे मत काँपना। मैं जानती हूँ तेरी दुकान का हाल। मुझे पता है तेरी बीवी की कमर का। तू चुप रहा, तो भी उसका फ़ायदा नहीं। देख लेना।"
भोला भाई ने गिलास पकड़ा और एक घूँट लिया।
"शबनम," उन्होंने धीरे से कहा, "तू अकेली है। मैं अकेला हूँ। हम सब अकेले हैं यहाँ।"
"तो अकेले को क्या करना चाहिए?" शबनम आपा ने गिलास मेज़ पर रखकर पूछा। और फिर ख़ुद ही जवाब दिया, "डरना नहीं चाहिए। क्योंकि डरने वाला अकेला मरता है। लड़ने वाला भी अकेला मरता है, पर मरने से पहले एक आवाज़ बन जाता है।"
मैं मुस्कुराया। "आपा, चाय में आज क्या डाला है?"
"आज सुबह से कुछ नहीं खाया, इसलिए तेरी अक्ल ठिकाने आ गई। तीन समोसे खा।"
मैंने समोसा उठाया। हाथ में धुआँ था, जला हुआ। पर मैंने काट लिया। और फिर हम तीनों वहाँ चुपचाप खड़े होकर खाने लगे — भोला भाई, टिंकू और मैं — जैसे कुछ नहीं हुआ हो।
कभी-कभी सबसे बड़ी हिम्मत समोसा खाने में होती है, जब बाहर कोई तुम्हारा शटर गिराने बैठा हो।
तभी दुकान के बाहर जूतों की आवाज़ आई।
मैंने सिर उठाया। मीरा थी। उसका कंधा लटक रहा था, बाल उलझे हुए, बैग कंधे पर टेढ़ा। उसकी आँखों में सुबह की लाली थी — वो रात भर सोई नहीं, यह साफ़ दिख रहा था।
"तुम यहाँ?" मैंने पूछा।
"मैं यहाँ नहीं थी," उसने कहा, और मेरी तरफ़ देखकर अंदर आई। "मैं पीछे वाली गली में बैठी थी। उस्ताद के पास। तुम्हारी घंटी वाली बात रात से मेरे दिमाग़ में घूम रही थी।"
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