The Mysterious Bell – Chapter 1500
उसने दोनों हाथ अपने कानों पर रख लिए, और उसका चेहरा ऐसा हुआ जैसे कोई बहुत गहरे पानी में चला गया हो। और फिर मैंने देखा — उठाया हुआ पत्थर छूट गया। वो पत्थर जिसे वो आख़िरी बार उठाने आया था, या जिसे वो मेज़ पर से उठाकर मेरी तरफ़ फेंकने आया था — याद नहीं कब उसने उठाया। वो पत्थर उसके हाथ से गिरा और उसकी उँगली से छूटकर मिट्टी में लुढ़क गया।
तभी उसकी हथेली पर वो नीली लकीर दिखी।
वो जल रही थी। सच में जल रही थी — जैसे किसी ने उसकी हथेली पर खींचकर आग लगा दी हो। रणवीर ने हाथ पीछे खींचा, और उसके होंठों से कोई शब्द नहीं निकला, सिर्फ़ आवाज़ निकली, एक लंबी, दबी हुई, जैसे कोई भीतर से चीख रहा हो।
मैंने उसकी तरफ़ एक कदम बढ़ाया।
“रणवीर,” मैंने कहा।
अब भी उसके कान बंद थे। वो मुझे सुन नहीं रहा था। पर फिर भी उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं और उनमें नफ़रत नहीं थी — डर था।
“आज तुमने बहुत जोड़ लिया,” उसने धीरे कहा, जैसे खुद से कह रहा हो।
“अभी तो शुरू किया है,” मैंने कहा।
रणवीर ने हाथ नीचे किए।
और तभी मेज़ पर पड़े काग़ज़ों के पीछे की परछाइयाँ हिलने लगीं।
मैंने देखा — किशनलाल काका के काग़ज़ के पीछे एक औरत खड़ी थी, जो उनकी बीवी थी, जो दो साल पहले चल बसी थी और जिसके नाम कुछ नहीं लिखा गया। भोला भाई के काग़ज़ के पीछे एक बूढ़ा खड़ा था, जो उनके पिता थे। नसीमा बाई के काग़ज़ के पीछे एक जवान लड़का — उनका बेटा साजिद — जो दो काग़ज़ों पर दो बार अंगूठा लगा चुका था और अब सामने खड़ा था, काँपता हुआ, और उसने अपना हाथ उठाया।
“ये मेरा है,” साजिद ने कहा। “और मैंने इसे नहीं बेचा।”
एक-एक करके लोग आगे आने लगे। हर काग़ज़ के पीछे खड़ा आदमी अपना नाम बोलता, अपना हिसाब बताता — और फिर अपना काग़ज़ उठाकर अपने सीने से लगाता।
“यह रमेश कुमार भार्गव का है, और मैंने इसे नहीं बेचा।”
“यह भोला प्रसाद का है, और मैंने इसे नहीं बेचा।”
“यह उस्ताद अली बक्श की दुकान का है, और मैंने इसे नहीं बेचा।”
“यह नूर अस्पताल की ज़मीन का है, और यह किसी के बाप की नहीं, इस गली की है।”
और फिर आख़िरी काग़ज़ — जो सबसे ऊपर था, जिस पर शंकरलाल यादव का नाम लिखा था — वो मेरे पापा ने उठाया।
वो भीड़ में से आए थे, बिना किसी को बताए। उन्होंने काग़ज़ उठाया और उसे सीने से लगाया। उनकी आँखें भरी थीं, पर आवाज़ साफ़ थी।
“यह शंकर यादव का नाम है,” उन्होंने कहा। “और इस पर अंगूठा मेरा है। पर मैंने इसे नहीं बेचा। मैंने इसे डर में दिया था। और डर को अंगूठा नहीं कहते। डर को डर कहते हैं।”
उन्होंने काग़ज़ को आधा फाड़ दिया, फिर पूरा। और फिर उसकी छोटी-छोटी परतें हवा में उड़ गईं।
उस वक़्त गाड़ी के दरवाज़े पर खड़े उस लंबे सफ़ेद कुर्ते वाले आदमी ने पहली बार हिलना शुरू किया। उसने अपना हाथ जेब से निकाला, और मैंने देखा कि उसकी उँगली पर कुछ नहीं था। न काली अंगूठी, न कोई छल्ला। सिर्फ़ एक लंबी सफ़ेद उँगली, जो अंधेरे में लकड़ी जैसी लग रही थी।
उसने रणवीर की तरफ़ देखा।
“साहब,” उसने कहा, “अब हम चलें।”
रणवीर ने उसे देखा।
“तुम?” उसने कहा।
“मैं,” उसने कहा। “अब देर हो रही है।”
और रणवीर हँसा। पर वो हँसी पहली बार किसी बात पर नहीं, खुद पर थी।
“बीस साल मैंने तुम्हारी सुनी,” रणवीर ने कहा, “और आज तुम हमें ‘साहब’ कहकर छोड़ रहे हो?”
“मैं तो सिर्फ़ सलाह देता हूँ,” उसने कहा। “सलाह देने वाले को साथ नहीं जाना पड़ता।”
वो गाड़ी में बैठ गया। गाड़ी स्टार्ट हुई और गली के मुँह की तरफ़ मुड़ गई।
रणवीर खड़ा रह गया।
और उसी वक़्त पीछे से जीप आई।
दुबे अंकल जीप से उतरे, पीछे दो सिपाही, और आगे दरोगा।
“रणवीर भारद्वाज,” दरोगा ने कहा। आवाज़ में कोई तमाशा नहीं था। “आपके ख़िलाफ़ ज़मीन के काग़ज़ों में गड़बड़ी, अस्पताल की ज़मीन पर ज़बरदस्ती का मामला और स्कूल में आग के आरोप हैं। चंद्रेश सक्सेना के ख़िलाफ़ भी वही शिकायत है। आप दोनों साथ चलिए।”
चंद्रेश कब आया, मुझे पता नहीं चला। वो गाड़ी की छाया में खड़ा था, सफ़ेद कुर्ता उतारकर, सिर्फ़ एक सादी कमीज़ में। उसके हाथ में कोई फाइल नहीं थी। पहली बार।
“मैं इस गली का नहीं हूँ,” चंद्रेश ने कहा, जैसे किसी को सफ़ाई दे रहा हो।
“अब नहीं रहेंगे,” दरोगा ने कहा।
रणवीर को जीप की तरफ़ ले जाया जाने लगा।
और मैंने देखा — उसकी हथेली फिर चमकी। उसकी नीली लकीर जीप की लाल बत्ती में और साफ़ दिखी।
मैं एक कदम आगे गया।
“रणवीर,” मैंने कहा।
वो रुका।
“वो लकीर क्या है?”
उसने अपना हाथ देखा। फिर उसने देखा, और पहली बार उसकी आँखों में कुछ और था — वो नहीं जो अक्सर था। वो शायद डर नहीं था। वो शायद सच था।
“पता नहीं,” उसने कहा। “कभी ज़्यादा जलती है, कभी कम। पहली बार जब जली, तो मैं बारह साल का था। मेरे पिता की दुकान जल गई थी। और मैंने उस रात एक घंटी के टूटे हिस्से को जला हुआ पीतल समझकर जेब में रख लिया था। मैंने कभी उसे बेचा नहीं। कभी फेंका नहीं। और तब से ये लकीर है।”
मैं कुछ नहीं बोला।
“आज तुमने बहुत जोड़ लिया,” उसने कहा, और इस बार वो मुस्कुराया। पर वो मुस्कान नहीं थी, कोई पुरानी आदत थी, जो अब बेकार हो चुकी थी। “अब इसे सँभालकर रखना। और याद रखना — जो जोड़ता है, वहीं सबसे पहले जलता है।”
वो जीप में बैठ गया।
जीप के पीछे का शीशा फ़ौरन ऊपर नहीं चढ़ा। रणवीर हमारी तरफ़ देख रहा था। और शीशे में उसकी हथेली की नीली लकीर अब भी ज़िंदा दिख रही थी — धीरे-धीरे, जैसे कोई आग जले और न पता चले।
जीप चली गई।
और फिर मैदान में सन्नाटा छा गया — पर वो सन्नाटा डर का नहीं था। वो सन्नाटा उस तरह का था जो किसी लंबी बीमारी के बाद पहली सुबह में होता है, जब आदमी जागकर देखता है कि सूरज अब भी निकलता है।
मैंने घंटी को जेब में रखा। वो अब ठंडी नहीं थी। वो हल्की गरम थी, पर पहली बार उस गरमाहट में डर नहीं था। वो गरमाहट किसी अपने के हाथ जैसी थी।
उस्ताद मेरे पास आए।
“अब घर चल,” उन्होंने कहा। “और सुनो — कल सुबह जो होगा, उसके भी दो हाथ होंगे।”
“कौन से?” मैंने पूछा।
“पहला हाथ तेरा,” उन्होंने कहा, “और दूसरा तेरी गली का।”
मैं मुस्कुराया।
और उस वक़्त मैंने घंटी को जेब में रखते हुए अंदर से आवाज़ आती सुनी। पर वो अब भी पूरी नहीं थी। वो आधी थी।
“डर मत,” घंटी ने कहा। “अभी और एक जोड़ बाकी है।”
मैं रुक गया।
“कौन सा जोड़?” मैंने पूछा।
पर घंटी चुप हो गई।
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चमक लौट आई थी जो सुबह तक बुझी थी। इलियास मेरे पीछे खड़ा था और अपने आँसू बिना पोंछे खड़ा था। शबनम आपा रज़िया का हाथ पकड़े खड़ी थीं और रज़िया की हरी चूड़ी आज रात पूरी लग रही थी।
तभी पीपल की डाल पर कुछ फड़फड़ाया — कोई पक्षी, या हवा — और एक पत्ता गिरा। वो सूखा था, पर उस पर कुछ लिखा नहीं था।
मैंने उसे उठाया। मैंने उसे उंगलियों में घुमाया, और पत्ते की पीठ पर एक छोटा सा निशान था — दो लकीरें और बीच में एक बिंदु।
मैंने उस्ताद को दिखाया।
“यह क्या है?” मैंने पूछा।
उस्ताद ने उसे देखा। फिर उन्होंने पीपल की डाल की तरफ़ देखा, और उनका चेहरा बदल गया।
“यह किसी काग़ज़ पर बना नहीं है,” उन्होंने कहा। “यह पेड़ पर है।”
“मतलब?” मैंने पूछा।
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