The Mysterious Bell – Chapter 1496
इलियास का हाथ ज़रा हिला।
“अब एक काम करना,” मैंने कहा। “वो ही करना, पर उल्टा। जो आपने रणवीर के लिए किया था, वो आप वापस लेने के लिए करो। आपने चुप रहकर आधी जीभ दी थी। अब बोलकर उसे वापस लो।”
इलियास का चेहरा उतर गया।
वो सीधे मेरी तरफ़ देखने लगा और उसकी आँखों में वो डर आ गया जो बूढ़े लोगों की आँखों में बच्चों जैसा लगता है। वो अपने कुर्ते के किनारे को उँगली में लपेटने लगा।
“बेटा,” उसने कहा। “तू जानता नहीं। मैं पचास साल बाहर रहा। मैं जबलपुर में मज़दूरी करता रहा, नागपुर में दुकानों के बाहर बैठा रहा, दो और जगहों में मैंने अपना नाम भी नहीं बताया। मैंने अपना पूरा बचपन वहीं छोड़ दिया जहाँ ये घंटी थी। अब मैं लौटा हूँ। मैं अपने भाई के सामने खड़ा हूँ — पचास साल बाद। और सबसे ज़्यादा डर मुझे अपनी ही गली से लग रहा है।”
“गली क्या करेगी?” मैंने पूछा।
“गली ज़िंदा नहीं छोड़ेगी,” उसने कहा। “पचास साल पहले यही गली मुझे देखती थी तो कहती थी — यही है जिसने काग़ज़ बदला। अब मैं वापस आया हूँ, तो गली पूछेगी — कहाँ था? क्यों भागा? क्यों अपने भाई को अकेला छोड़ा? तूने तो अपनी माँ तक को नहीं बचाया। गली का सवाल काग़ज़ से बड़ा होता है, बेटा। गली का सवाल अंगूठे से बड़ा होता है।”
“आपकी गली आपको डरा रही है,” मैंने कहा।
“हाँ,” उसने कहा। “और मैं पचास साल से इसे सह रहा हूँ।”
तब उस्ताद ने उसका कंधा पकड़ा।
उनका हाथ इलियास के कंधे पर ऐसे बैठा जैसे बहुत सारी चीज़ें थाम ली हों। उन्होंने धीरे से कहा —
“इलियास।”
इलियास ने उनकी तरफ़ देखा।
“माफ़ी माँगना तेरा काम है,” उस्ताद ने कहा। “माफ़ करना उनका काम है। तू बस सच बोल। बाकी मत सोच। सोचने बैठेगा तो वही करेगा जो आज तक किया — और तेरे पास और पचास साल नहीं हैं।”
इलियास हँसा भी और उसकी आँखें भर भी आईं।
“आप मुझे डाँट रहे हैं,” उसने कहा।
“हाँ,” उस्ताद ने कहा। “पचास साल बाद भी मुझे तेरी आवाज़ में वो लड़का सुनाई देता है — वो जो हमेशा पीछे खड़ा होकर मेरी मशीन की टिक-टिक सुनता रहता था। अब खड़ा है तो बोल भी।”
मैंने घंटी उठाई और आधी जीभ उसके पास रखी।
“आप हाथ रखिए,” मैंने कहा।
इलियास ने दोनों हाथ बढ़ाए। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। मैंने भी अपने दोनों हाथ उनके ऊपर रखे। घंटी और आधी जीभ के बीच मेरी हथेली थी।
फिर एक टक-टक हुई। फिर दो। फिर एक लंबी, पतली सी आवाज़ आई — जैसे किसी ने दाँत से होंठ दबाया हो।
घंटी गरम हुई।
“उस्ताद!” मैंने कहा। “ये गरम हो रही है।”
“हाँ,” उन्होंने कहा। “पर बज नहीं रही।”
“क्यों?”
“क्योंकि अभी दो नहीं हैं,” उस्ताद ने कहा। “अभी भी दो लोगों का सच है। इसे और हाथ चाहिए। देख — ये माँग रही है।”
मैंने घंटी को देखा। उसकी सतह पर मेरी उँगली की लकीरों के साथ एक नई महीन रेखा उभर रही थी। ऐसी रेखा जो पहले नहीं थी।
फिर घंटी धीरे से बोली।
सिर्फ़ दो शब्द।
“सबके हाथ।”
इलियास ने पीछे झटका लिया। उस्ताद ने उसे थाम लिया।
“ये बोली,” इलियास ने कहा। “ये बोली!”
“बोली,” उस्ताद ने कहा। “पर बजी नहीं। मतलब अभी पूरी नहीं है।”
“सबके हाथ का क्या मतलब?” मैंने पूछा।
“मतलब तेरे हाथ और मेरे हाथ से कुछ नहीं होगा,” उस्ताद ने कहा। “ये घंटी अकेले इंसान की चीज़ नहीं रही। कभी थी। अब नहीं। अब इसे पूरी गली का सच चाहिए। जिसने तोड़ा, जिसने सहा, जिसने देखा, जिसने छुपाया — सबका। पाँच साल का कच्चा सच और पचास साल का पका सच — दोनों साथ लगेंगे तभी ये जुड़ेगी।”
मैंने घंटी को मेज़ पर रखा। मेरे हाथ अभी भी हल्के जल रहे थे।
इलियास ने अपना हथेली पर फूँक मारी।
“मुझे लगा था आज रात सब खत्म हो जाएगा,” उसने कहा।
“नहीं,” मैंने कहा। “आज रात सिर्फ़ शुरुआत है।”
तभी खिड़की के बाहर से टिंकू की आवाज़ आई।
“उस्ताद!”
मैंने खिड़की की तरफ़ देखा। टिंकू बाहर दीवार पर चढ़ा खड़ा था, एक हाथ में उसका बने हुए कार्डबोर्ड का माइक था और आँखें बड़ी।
“मैदान की तरफ़ से गाड़ी की रोशनी आ रही है!” वो चिल्लाया। “बड़ी रोशनी! सीधी हमारी गली की तरफ़ आ रही है!”
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उन्होंने इलियास की तरफ़। इलियास ने मेरी तरफ़।
कोई तीनों को एक-दूसरे से कुछ कहना नहीं पड़ा।
मैंने घंटी उठाई। आधी जीभ मेरी जेब में डाली। दोनों ताले और काला ताला मैंने जल्दी से उस पुराने पीले कपड़े में लपेटे और उसी मेज़ पर छोड़ दिया, जहाँ माँ की हिसाब की कॉपी खुली थी। औज़ार वहीं पड़े रह गए — मेरी रिंच, मेरा पेचकस, टेप वाला हथौड़ा। दुकान के भीतर का बल्ब गुनगुना रहा था, जैसे उसे भी नींद टूट गई हो।
हम दरवाज़े से बाहर निकले।
गली में रोशनी आ रही थी।
नई बस्ती की तरफ़ से सड़क बड़ी है, और उसी सड़क से एक-दो नहीं, तीन गाड़ियाँ आ रही थीं। उनकी आगे की बत्तियाँ पीपल के तने पर पड़ रही थीं और पत्ते चाँदी जैसे दिख रहे थे।
“कौन है?” उस्ताद ने कहा।
“देखते हैं,” मैंने कहा।
इलियास ने धीरे से कदम पीछे किया।
“अब रुको,” मैंने कहा। “आप भागे तो मैं आपसे कुछ नहीं कहूँगा, पर आज रात आपको भागना नहीं है।”
“मैं भाग नहीं रहा,” उसने कहा। “मैं बस………. बैठने की जगह देख रहा हूँ।”
मैं हँस दिया। बिना वजह। ऐसी हँसी आ जाती है जब कुछ और करने का हक़ न बचे।
गाड़ियाँ गली के मुँह पर रुकीं। पहली गाड़ी से रणवीर उतरा। दूसरी से चंद्रेश सक्सेना। तीसरी से दो आदमी जिन्हें मैंने पहले नहीं देखा था और एक लंबा आदमी सफ़ेद कुर्ते में, जिसके हाथ में एक बंद मोटी फाइल थी।
रणवीर आज रात अलग लग रहा था। फिर भी वही था। वही सफ़ेद कपड़े। वही हाथ जोड़ने की आदत। पर उसके चेहरे से वो चमक गई थी। गाड़ी की रोशनी में उसका चेहरा सपाट लग रहा था, जैसे किसी ने किसी पेंटिंग से रंग उतार दिए हों।
“इतनी रात को आने का कोई नया हिसाब होगा,” मैंने कहा। “क्योंकि पुराना तो हम सब बैठकर देख चुके हैं।”
रणवीर मुस्कुराया।
“उस्ताद,” उसने कहा, उस्ताद अली बक्श की तरफ़ देखकर। “एक बात है।”
उस्ताद ने अपना चश्मा सीधा किया।
“बोल,” उन्होंने कहा।
“मैं आपके भाई को लेने आया हूँ,” रणवीर ने कहा।
इलियास का कंधा काँपा।
उस्ताद आगे बढ़े। इलियास उनके पीछे आया। रणवीर ने उन दोनों को देखा और उसके चेहरे पर वो पुरानी मुस्कान आई जो खोने की मुस्कान होती है।
“इलियास चाचा,” रणवीर ने कहा। “आप लौटे।”
“मैं लौटा,” इलियास ने कहा। सपाट आवाज़।
“मैंने आपको ढूँढा था,” रणवीर ने कहा।
“क्यों?”
“क्योंकि आपके पास वो चीज़ है जो बाकी सबको जोड़ती है,” रणवीर ने कहा। “मेरे पास आधी थी। आपके पास आधी थी। सोचिए — हम दोनों मिल जाएँ तो पूरी हो जाए।”
इलियास ने आगे कदम बढ़ाया।
मुझे लगा वो कुछ ऐसा कहेगा जो हम सबको सुनना चाहिए। पर वो सिर्फ़ इतना कहा —
“तुमने मुझे बाईस साल पहले भी यही कहा था।”
रणवीर हँसा।
“और आपने मान लिया था,” उसने कहा।
“हाँ,” इलियास ने कहा। “मैंने मान लिया था।!”
एक पल के लिए गली में सिर्फ़ पीपल की पत्तियों की आवाज़ रही।
फिर इलियास ने अपना कुर्ता सीधा किया — वो सफ़ेद कुर्ता जो उस्ताद ने उसके लिए सिलकर रखा था — और रणवीर के सामने खड़ा हो गया।
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