The Mysterious Bell – Chapter 1492
फिर एक ख़ाली लकीर छोड़कर नीचे लिखा —
“कल दो बजे — खाली लाइन भरनी है। उससे पहले — छह बक्सों से बात।”
मैंने कलम रखी।
दरवाज़े पर धीमी आवाज़ आई।
मैंने सिर उठाया — बल्कि ऐसा कहूँ, मैंने कान उठाए।
यह माँ थीं।
वो दरवाज़े पर खड़ी थीं — साड़ी का पल्लू कमर में, हाथ में एक छोटी काग़ज़ की पर्ची, आँखें थोड़ी भारी।
“माँ?”
“पाँच मिनट बैठ सकती हूँ?”
“बैठिए।”
वो चारपाई के किनारे बैठीं। मैंने उनके लिए पानी का गिलास भरा। उन्होंने एक घूँट पिया, फिर पर्ची मेज़ पर रखी।
“यह क्या है?” मैंने पूछा।
“दवा की पर्ची,” उन्होंने कहा।
“फिर से?”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “दस दिन की दवा है। और दस दिन में पाँच दिन की नहीं, चार दिन की है। मैंने गिन लिया है।”
“माँ —”
“रुक। सुन। आज तूने बहुत सुना। आज सुनने की तेरी बारी थी। यह मेरी बात है। मैंने दस साल से यह कॉपी संभाली है, और आज मैंने पहली बार सच गिना है। चार दिन की दवा बची है। उसके बाद —”
“माँ, मैं करूँगा कुछ।”
“क्या?”
मैं चुप हो गया।
“अंकुश,” उन्होंने धीरे कहा, “मैं तुझे डराना नहीं चाहती। पर मैं झूठ भी नहीं बोलूँगी, क्योंकि झूठ बोलकर मैंने पाईस साल नहीं गुज़ारे हैं।”
“आपने चुप्पी गुज़ारी है।”
“हाँ,” उन्होंने कहा। “वो अलग बात है।”
उन्होंने पर्ची उठाई।
“चार दिन,” उन्होंने कहा। “मैं चार दिन में तेरे हाथ और गली के हाथ से ज़्यादा नहीं माँगूँगी। पर एक बात — जब तू कल दो बजे दफ़्तार जाए, मेरा नाम उस खाली लाइन पर सबसे ऊपर लिख।”
“क्यों?”
“क्योंकि जब वो काग़ज़ बोलेगा,” उन्होंने कहा, “तो सबसे ऊपर एक माँ का नाम हो — दबा हुआ, छुपाया हुआ, मजबूरी में अंगूठा लगाने वाला।”
मैं उनके हाथ पकड़कर बैठा रहा।
“माँ।”
“हाँ?”
“अगर आज रात कुछ चाहिए — कुछ भी —”
“सिर्फ़ एक बात,” उन्होंने कहा। “कल दफ़्तार के बाद, जब लौटे, मेरे पास बैठकर सारी बात बताना। कुछ न छिपाना।”
“नहीं छिपाऊँगा।”
वो उठीं।
“मैं काजल के पास जा रही हूँ,” उन्होंने कहा। “वो आज बहुत रोई है। पर किसी को नहीं बताया।”
मैंने सिर हिलाया।
वो जाने लगीं, फिर रुकीं।
“अंकुश।”
“हाँ।”
“आज मैदान में, जब तूने घुटने पर बैठकर पापा का हाथ पकड़ा — माँ ने पहली बार देखा कि तेरे पापा सच में तेरे पापा हैं। बाईस साल से मुझे लगता था, वो तेरे सामने सिर्फ़ चुप्पी हैं।”
“अब?”
“अब मुझे लगता है,” उन्होंने कहा, “वो तेरे सामने एक आदमी हैं।”
वो चली गईं।
मैं कमरे में अकेला रह गया।
और ताले — मेज़ पर।
हल्के गरम।
मैंने एक पल सोचा।
कुछ देर बाद मैंने घंटी उठाई और उसे कान से लगाया।
कुछ नहीं।
मैंने घंटी नीचे रखी, बल्ब बुझाया और चारपाई पर लेट गया।
.
रात के तीन बज रहे थे, जब दरवाज़े पर तीन धीमी दस्तकें पड़ीं।
धीमी।
बहुत धीमी।
जैसे किसी ने दो अंगुलियों से दरवाज़े को छुआ हो।
मैं उठ बैठा।
काजल की आवाज़ नहीं — काजल सो रही थी।
माँ की आवाज़ नहीं — माँ तकिया पर थीं।
पापा? नहीं — पापा घर में थे।
मैं उठा। दरवाज़े तक गया।
मैंने घंटी जेब से निकाली।
वो — गरम थी।
बहुत गरम नहीं, पर गरम।
जैसे किसी ने उसे हाथ लगाया हो।
मैंने कुंडी खिसकाई।
दरवाज़ा खुला।
बाहर एक बूढ़ा खड़ा था।
लंबा, दुबला, झुका हुआ। सिर पर सफ़ेद टोपी, सफ़ेद दाढ़ी। हाथ में एक लाठी — पर वो लाठी किसी सहारे के लिए नहीं, किसी चीज़ को टटोलने के लिए थी। उसकी आँखें भारी थीं, धुँधली — जैसे बरसों से सूरज का इंतज़ार कर रही हों।
पर उन आँखों में एक चमक थी। वो चमक — पीतल जैसी।
मैंने देखा।
उसके हाथ में एक छोटा पीला काग़ज़ था — बहुत पुराना, बहुत मुड़ा हुआ। उस पर वही दो लकीरें थीं, वही बिंदु।
मेरे भीतर कुछ कस गया।
“आप कौन हैं?” मैंने पूछा।
उसने कुछ नहीं कहा।
उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
नहीं — उसने ऐसे हाथ आगे बढ़ाया, जैसे कोई माँग रहा हो।
और फिर उसने कहा — धीमी, धँसी हुई, बहुत पुरानी आवाज़ में, बिलकुल शांति से, बिना गुस्सा, बिना डर, बिना फ़िल्मी दम —
“वो आधी जीभ मेरी है, और मैं उसे वापस लेने आया हूँ।”
मेरी जेब में घंटी चुप थी।
बिल्कुल चुप।
और मैं जानता था — वो चुप नहीं थी।
वो इंतज़ार कर रही थी।
मैंने उस बूढ़े की तरफ़ देखा — और उसके चेहरे पर, उसकी झुर्रियों में, उसकी आँखों की चमक में, मुझे किसी की शक्ल दिखी।
किसी ऐसे की, जिसे मैं जानता हूँ।
पर मैं उसे पहचान नहीं पा रहा था।
॥
मैं दरवाज़े पर खड़ा रहा। मेरा हाथ कुंडी पर था और पैर दहलीज़ पर।
बाहर वो बूढ़ा खड़ा था, जैसे दीवार से टिका हुआ कोई पुराना पोस्टर हो, जिसे हवा ने किनारे से उखाड़ दिया हो और कोई चिपकाने न आया हो।
उसकी सफ़ेद टोपी सिर पर ठीक से नहीं थी। दाढ़ी छोटी थी, कहीं-कहीं से पीली पड़ी हुई। लाठी का निचला सिरा ज़मीन पर टिका था, पर उसकी पकड़ ढीली थी — जैसे लाठी उसका सहारा न हो, बस उसके साथ चलने की आदत हो।
“आपने क्या कहा?” मैंने फिर पूछा।
उसने वही किया। हाथ आगे बढ़ाया। हथेली खुली।
और उस हथेली पर वो पीला काग़ज़ रखा था — इतना पुराना कि उसका रंग अब पीला नहीं, हल्का भूरा हो चुका था। मुड़ा हुआ, कई बार मुड़ा हुआ। किनारों से इतना घिसा कि लगता था किसी ने सालों उसे जेब में रखकर हर रोज़ एक बार निकालकर देखा है।
और उस काग़ज़ पर, ऊपर की तरफ़, वही निशान था।
दो लकीरें। बीच में एक बिंदु।
वही। चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर। उस्ताद की घंटी के छल्ले पर। मंसूर चाचा के ताले पर। डॉक्टर इसरानी के रजिस्टर के आख़िरी पन्ने पर। और अब — इस बूढ़े की हथेली पर।
मेरे भीतर कुछ कस गया। पेट से छाती तक एक डोरी खिंची।
“आप कौन हैं?” मैंने तीसरी बार पूछा, और इस बार आवाज़ में वो नरमी नहीं थी जो पहले थी।
उसने उत्तर नहीं दिया।
उसने बस हाथ वैसे ही आगे रखा, और फिर धीरे से कहा — इतनी धीमी आवाज़ में कि लगा आवाज़ उसके गले से नहीं, किसी पुराने संदूक के भीतर से आ रही है —
“वो आधी जीभ मेरी है। और मैं उसे वापस लेने आया हूँ।”
मेरी जेब में घंटी चुप थी।
बिल्कुल चुप।
न गरम। न ठंडी। न आवाज़। सिर्फ़ चुप्पी — वो चुप्पी जो किसी के बोलने से पहले आती है।
मैंने एक कदम पीछे रखा और उसे ठीक से देखा।
उसकी आँखें भारी थीं। धुँधली। पर उनमें एक चमक थी — पीतल जैसी, हल्की, पुरानी।
और उस चेहरे में कुछ था।
कुछ जाना-पहचाना।
मैं उसे पकड़ नहीं पा रहा था। जैसे ज़ुबान पर नाम आकर रुक जाए।
मैं मुड़ा और गली की तरफ़ देखा। शबनम आपा की गुमटी पर लालटेन अब भी जल रही थी। दूर कहीं एक कुत्ता भौंका और फिर चुप हो गया। गली सो रही थी, पर उस सोने में भी वो जागरण था जो आज रात किसी को नींद नहीं लेने दे रहा था।
“उस्ताद!” मैंने आवाज़ दी। ज़ोर से नहीं, पर इतनी कि दुकान के पीछे वाले कमरे तक पहुँच जाए।
कोई जवाब नहीं।
“उस्ताद अली बक्श!”
इस बार आवाज़ तेज़ हुई।
दुकान के भीतर से लकड़ी के स्टूल के सरकने की आवाज़ आई। फिर पैरों की। फिर दरवाज़े का कुंडा खुला और उस्ताद बाहर आए — हाफ़्ते में एक बार ऐसा होता है कि वो रात में बैठकर पुराने कपड़े की मरम्मत करते हैं, और आज वही रात थी। उनके एक हाथ में कैंची थी, दूसरे में कुछ सफ़ेद धागा।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno