The Mysterious Bell – Chapter 1491
“कहिए।”
“जो काग़ज़ मैंने तेरे पापा का लिया था — वो आज पूरी गली ने देखा। पर जो सबसे ज़्यादा नहीं देखा गया — वो यह है कि मेरे पास भी एक काग़ज़ था। मेरे ही नाम का।”
मैं रुक गया।
“क्या?”
“मैंने कभी किसी को नहीं बताया। मेरा भी एक काग़ज़ था — बीस साल पहले। मेरी दुकान का। मैंने भी अपना अंगूठा लगा दिया था।”
“गोविंद भाई —”
“नहीं, सुन,” उन्होंने कहा। “पच्चीस साल से मैं तेरे पापा की तरफ़ देखता था और सोचता था — कमज़ोर आदमी। आज पता चला, मैं उनसे कमज़ोर था। मैंने सिर्फ़ अंगूठा नहीं लगाया था, बेटा। मैंने अपनी दुकान का हिसाब भी लिखा था — झूठ का हिसाब।”
मैं उनके सामने बैठ गया।
“अब?”
“अब जो भी है,” उन्होंने कहा, “सच्चा है। मेरी दुकान चली गई, मेरी बही सही सलामत है।”
उन्होंने प्याला मेज़ पर रखा।
और उस वक़्त, मैंने देखा — उनका हाथ काँपा।
नहीं। काँपा नहीं।
उसे — इतना हल्का हिला, जितना किसी हाथ को नहीं हिलना चाहिए था।
पर मैंने देखा — वो हाथ प्याले पर टिका हुआ था, जैसे किसी ने उसे प्याले से बाँध दिया हो।
और मैं मुस्कुरा दिया।
“अपना हाथ क्यों नहीं पकड़ रहे, गोविंद भाई?” मैंने पूछा।
“क्योंकि अब इसे मेरी ज़रूरत नहीं,” उन्होंने कहा।
उस रात, गोविंद भाई ने पहली बार अपना प्याला ख़ुद उठाया, ख़ुद मुँह तक ले गए, और ख़ुद पिया — बिना किसी का सहारा।
और शबनम आपा गुमटी से बाहर निकलीं, उनके पास आईं, और उन्होंने उनके कंधे पर हाथ रखा।
कोई कुछ नहीं बोला।
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बच्चों की टोली एक कोने में बैठी थी।
टिंकू के पास एक पुरानी कॉपी थी, और वो उसमें कुछ ऐसा लिख रहा था जैसे कोई बड़ा मुँह लगा लिखता है — पूरा ध्यान, पूरी तल्लीनता।
सानिया बीच-बीच में झाँकती और टोकती।
“अरे, वो नहीं — पहले मैदान का पहला सच लिख।”
“पहला सच?” रफ़ीक़ ने कहा। “पहला सच यही था कि हमारे पापा ने सबके सामने माफ़ी माँगी।”
“नहीं!” चिंटू बोला। “पहला सच तो यह था कि शबनम आपा ने रज़िया आपा को पूरी चूड़ी पहनाई।”
“वो सच नहीं, खुशी है,” टिंकू ने कहा।
“खुशी भी सच होती है,” सानिया ने कहा।
“हाँ, पर काग़ज़ में पहले वो लिखते हैं जिससे कोई डरता है,” टिंकू ने कहा। “और हमें यह लिखना है कि हमें किस चीज़ से डर लगा।”
गुड्डू ने धीरे कहा, “मुझे तो तब डर लगा जब चुभन आई थी।”
“तो वही पहले लिख,” टिंकू ने कहा। “यह रिपोर्ट है — जासूसी रिपोर्ट। इसमें पहले डर, फिर सच, फिर नाम।”
उसने पहली लाइन लिखी —
“रात आठ बजे — सुई जैसी चुभन। सबने कान पकड़े। एक दीया बुझा।”
फिर दूसरी —
“रात आठ बजकर पंद्रह मिनट — गोविंद भाई ने सबके सामने अपना नाम बोला। पहली बार नाम सुना। गोविंद भाई का हाथ नहीं काँपा।”
तीसरी —
“रात नौ बजे — हरिप्रसाद ने अपनी आधी उँगली मेज़ पर रखी। कोई हँसा नहीं।”
चौथी —
“रात साढ़े नौ — माँ बोली, चौदह हज़ार दो सौ रुपये चुकाएँगी, पर ईमान नहीं।”
और पाँचवीं —
“सबसे बड़ा सच — हमारे पापा ने भी सबके सामने माफ़ी माँगी।”
टिंकू ने कलम रोकी।
“यह अच्छा है,” उसने कहा। “पर इसमें एक सच और जोड़ना है।”
“कौन सा?” सानिया ने पूछा।
“यह — कि हम भी वहाँ थे।”
“क्यों?”
“क्योंकि हमें भी याद रखना है,” उसने कहा। “बड़े लोग भूल जाते हैं। बच्चे नहीं भूलते।”
उसने आख़िरी लाइन लिखी —
“जासूस — टिंकू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू। यह रिपोर्ट रखी जाएगी। जब बड़े भूलें, हम याद दिलाएँगे।”
सानिया ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“टिंकू,” उसने धीरे कहा, “तू अच्छा जासूस है।”
“गिलहरी कह,” टिंकू ने कहा।
सब हँस पड़े।
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उसी वक़्त शबनम आपा ने गुमटी से आवाज़ लगाई, “चिंटू! इधर आ। तूने समोसे गिने थे?”
“हाँ, आपा। चालीस।”
“अब गिन।”
उन्होंने थाली आगे बढ़ाई।
चिंटू ने गिना — “एक, दो, तीन, चार…”
वो रुका।
“आपा, सोलह।”
“अरे, चालीस में से सोलह? चौबीस कहाँ गए?”
“मैंने गिने नहीं थे,” चिंटू ने कहा। “मैंने खाए थे।”
गुमटी में ठहाका लग गया।
शबनम आपा ने चिमटी उठाई — “चिंटू!”
“आपा — गलती से।”
“गिनकर गलती होती है? गिनती में गलती होती है? उसको गिनना कहते हैं, चिंटू — गिनना।”
पूरी गुमटी हँस रही थी।
टिंकू बीच में खड़ा होकर रणवीर की तरह मुँह बनाने लगा — सफ़ेद कुर्ता कोई नहीं था, पर वो अपने कंधे सीधे करके, आँखें आधी बंद करके, बड़ी मुस्कान के साथ हाथों को जोड़कर ऐसे खड़ा हो गया जैसे कोई बड़ा नेता खड़ा होता है।
“मेरे प्यारे बच्चों!” वो बोला, “मैं आपका अपना रणवीर भारद्वाज…”
गुमटी में एक साथ चार आवाज़ें आईं —
“बैठ जा!”
“हट!”
“ओए!”
और शबनम आपा ने अपनी चिमटी उठाई।
टपक।
टिंकू के सिर पर हल्की टपकी पड़ी।
“आपा!” टिंकू ने सिर सहलाया।
“अगली बार,” शबनम आपा ने कहा, “उस आदमी की नकल मत करना। उसका नाम भी इस गली में मुँह से मत निकालना। वो नाम है या नहीं — बाद में बताऊँगी।”
“आपा, प्याला ख़त्म।”
“फिर भर लाऊँगी। पर आज रात गली में कोई प्यासा नहीं सोएगा।”
और उन्होंने पीछे मुड़कर रज़िया की तरफ़ देखा — और दोनों बहनों ने एक-दूसरे को देखकर आँखों से ही कुछ कहा।
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मैं गुमटी से उठा और दुकान की तरफ़ बढ़ा।
टिंकू मेरे पीछे आया।
“उस्ताद,” उसने कहा, “मैं भी आऊँ?”
“आज नहीं,” मैंने कहा। “आज मुझे अकेले बैठना है।”
“पर उस्ताद —”
“कल तुझे बुलाऊँगा,” मैंने कहा। “पर आज तेरे लिए एक काम है।”
“क्या?”
“यहाँ रह,” मैंने कहा। “लोग आ रहे हैं। उन्हें बताना — जो आज मैदान में था, वो हमारा है। जो नहीं था, उससे हम कल बात करेंगे।”
उसने सिर हिलाया।
“उस्ताद।”
“हाँ।”
“आप ठीक हो?”
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“नहीं,” मैंने कहा। “पर हो जाऊँगा।”
वो मुस्कुराया और दौड़कर गुमटी की तरफ़ लौट गया।
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दुकान के पीछे वाला कमरा लौटकर बैठा तो बल्ब फिर गुनगुना रहा था — वही पुराना, पीला, थका हुआ।
मैंने औज़ारों का ट्रंक खोला।
मैंने दोनों ताले बाहर निकाले।
पहला — मंसूर का, दो खोखले हिस्सों में खुला, एक महीन लकीर भीतर।
दूसरा — चूल्हे वाले घर से आया, चाबी के बिना वाला काला चौकोर, कपड़े में लिपटा, पीठ पर वही दो लकीर-बिंदु निशान।
मैंने दोनों को अपने सामने मेज़ पर रखा।
और मैंने देखा — दोनों ठंडे नहीं हैं।
हल्के गरम हैं।
जैसे अभी कुछ बोलेंगे।
जैसे अभी किसी बात का इंतज़ार कर रहे हैं।
मैंने अपना हाथ उन पर हल्का रखा।
फिर मैंने घंटी निकाली।
वो जेब में ठंडी थी। पर जब मैंने उसे तालों के बीच रखा — वो थोड़ी गरम हो गई।
“घंटी,” मैंने धीरे कहा।
कोई जवाब नहीं।
“घंटी, सुन।”
कुछ नहीं।
फिर मैंने घंटी को हल्का बजाया।
वो बजी — पर आवाज़ नहीं आई। बस हल्की झनक जैसी हवा में रह गई।
और फिर — बहुत धीमे — घंटी ने कहा:
“अब तू बोलेगा, मैं सुनूँगी।”
मैं मुस्कुराया।
“कमाल है,” मैंने कहा। “अब तक तू बोलती थी, मैं सुनता था।”
“अब बदल रहा है,” घंटी ने कहा।
“क्या बदल रहा है?”
वो चुप हो गई।
मैंने घंटी हाथ में पकड़कर सोचा — आज जो हुआ, वो कहाँ जाएगा? सब कहाँ दर्ज होगा?
मैंने अपनी कॉपी खोली — वही नई कॉपी, जिसमें माँ का नाम सबसे पहले लिखा है।
पहला पन्ना।
मैंने लिखा —
“आज गली ने मिलकर माँ का इलाज बचाया। आज पापा ने अपना डर कबूला। आज गोविंद भाई का हाथ नहीं काँपा। आज हरिप्रसाद ने अपनी अधूरी उँगली दिखाई। आज शबनम ने रज़िया की चूड़ी पूरी की। आज बबलू ने चेन उतारी। आज दुबे अंकल की सीटी पर पुलिस भी सच के साथ आई।”
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