The Mysterious Bell1490 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1490

7 min read November 5, 2026

उन्होंने मेरा कंधा पकड़ा।

“अंकुश,” उन्होंने कहा, “बाईस साल पहले मैंने एक काग़ज़ पर अंगूठा लगाया था, क्योंकि मैं डरा हुआ था। आज मैं तेरे साथ बिजलीघर नहीं आ पाऊँगा, क्योंकि मैं वहाँ जाकर उस रात को फिर जीने से डरता हूँ। पर अगर कभी वहाँ किसी को मेरी ज़रूरत हो, तो पहली बार मैं डरकर भी पहुँचूँगा।”

मैंने कुछ नहीं कहा।

बस उनका हाथ पकड़ा और माथे पर रख लिया।

फिर वो चले गए।

उस्ताद मेरे बगल में खड़े थे।

“अब?” मैंने पूछा।

“अब,” उन्होंने कहा, “हम तीन चीज़ों से शुरुआत करेंगे। पहली — मंसूर चाचा का दूसरा ताला। दूसरी — तेरी खाली लाइन। तीसरी — उन छह बक्सों से बात।”

“क्रम?”

उन्होंने अपनी उँगली उठाई — वही मोटी, कामकाजी उँगली, जिस पर पेंसिल का निशान हमेशा रहता था।

“क्रम में नहीं,” उन्होंने कहा। “ोयुक्त बात नहीं है। आज रात यह तीनों साथ चलेंगी।”

मैं हँसा।

“उस्ताद, यह आपको कब से आता है?”

“अब से,” उन्होंने कहा।

चलते-चलते मैंने एक बार अपनी जेब से घंटी निकाली।

अंधेरे में वो मटमैली दिख रही थी — वही पुरानी पीतल, वही फूल का निशान, वही निशान जो मुझे दादा की याद दिलाता था।

मैंने उसे हल्का हिलाया।

वो ठंडी थी।

पर अंदर से एक बहुत छोटी सी आवाज़ आई — जैसे किसी ने नींद में कुछ कहा हो और फिर खुद चौंककर चुप हो गया हो।

मैंने उसे कान से लगाया।

कुछ नहीं।

मैंने हिलाया फिर।

कुछ नहीं।

तो फिर मैंने उसे जेब में रख दिया और चल दिया।

रात की हवा में गली धीरे-धीरे सो रही थी।

पर मुझे पता था — यह नींद कुछ समय की थी।

क्योंकि तभी, चलते-चलते, बिल्कुल अचानक, मेरी जेब में घंटी बजी।

एक बार।

छोटी सी।

और बहुत धीमे से घंटी ने कहा —

"एक और बाकी है।"

मैं ठिठक गया।

“क्या?” मैंने धीमे पूछा।

वो फिर चुप।

“कौन सा?”

वो फिर चुप।

“उस्ताद,” मैंने कहा, “घंटी कुछ कह रही है।”

उन्होंने चलते-चलते मेरी तरफ़ देखा।

“क्या?”

“एक और बाकी है।”

उनके कदम रुक गए।

उन्होंने मेरी जेब की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। फिर ऊपर आसमान की तरफ़।

“अंकुश,” उन्होंने कहा, “सुन ले। आज जो हुआ, वो सिर्फ़ शुरुआत है।”

“किसकी?”

“जो जोड़ता है, उसकी,” उन्होंने कहा। “और उससे पहले… जो अभी तक टूटा हुआ है।”

मैंने अपनी जेब में घंटी को फिर महसूस किया।

वो फिर से ठंडी हो चुकी थी।

पर भीतर — कहीं गहरे में — मुझे लगा कि उसने एक और साँस भर ली है। और अब उस साँस में एक नाम है। एक आदमी का नाम, जिसका चेहरा मैं अभी नहीं जानता।

मैंने उस्ताद का हाथ पकड़ा और हम नीम वाली गली की तरफ़ बढ़ गए।

और पीछे, मैदान में, आख़िरी दीया भी बुझ गया।

॥

नीम वाली गली का मोड़ आते-आते रात और गहरी हो गई थी।

उस्ताद के कदम भारी थे, पर चलने की रफ़्तार अचानक कम नहीं हुई थी। कदम धीमे नहीं, चुप हो गए थे।

गली में एक भी बत्ती नहीं जल रही थी। दोनों तरफ़ के मकानों की खिड़कियाँ बंद थीं, दरवाज़ों पर ताले लगे थे। कोई किसी दहलीज़ से झाँक नहीं रहा था।

“उस्ताद,” मैंने धीरे कहा, “यहाँ तो कोई भी नहीं दिख रहा।”

“कोई देखना नहीं है,” उन्होंने कहा। “नीला दरवाज़ा देखना है।”

पर नीले दरवाज़े तक पहुँचने से पहले ही उन्होंने मेरा हाथ रोक लिया।

“अंकुश।”

“हाँ?”

“सुन।”

मैंने सुना।

कुछ नहीं।

“कुछ नहीं है, उस्ताद।”

“बिल्कुल कुछ नहीं है, बेटा,” उन्होंने कहा। “यही तो सबसे बड़ी बात है। इस गली में आज भी सब कुछ बंद है। सब सोए हैं। पर रणवीर का घर आज बंद नहीं है। उसकी गाड़ी मैदान से निकलते वक़्त भी मोड़ पर आकर रुकी थी।”

“क्यों रुकी?”

“सोचने के लिए,” उन्होंने कहा। “उसने कुछ सोचा। और जो आदमी रात में सोचता है, वो सुबह कोई बड़ी चीज़ करता है।”

मैंने घंटी जेब में महसूस की।

“उस्ताद,” मैंने कहा, “अगर इस घर में अभी वो दूसरा ताला है, तो आज रात खोल लें। किसी भी तरह।”

उन्होंने सिर हिलाया। फिर मेरी तरफ़ देखा — ऐसा, जैसे कोई पुराना रास्ता याद कर रहे हों।

“नहीं,” उन्होंने कहा। “आज रात हम इस दरवाज़े को नहीं छुएँगे। जो ताला रणवीर ने मैदान में खड़े होकर छोड़ा था, वो दरवाज़ा मेरे बिना नहीं खुलेगा। और जो दरवाज़ा खुलेगा, उसके पीछे जो है — वो मेरे भाई का सच है। इसे मैं अंधेरे में नहीं, सबके सामने खोलूँगा।”

“पर आपने ही कहा था — तीन काम।”

“तीन काम में से एक काम रात का था,” उन्होंने कहा। “वो रात हमने जी लिया। बाकी दो सुबह के हैं।”

मैं चुप हो गया।

फिर मैंने पूछा, “घंटी ने कहा — एक और बाकी है। किसकी बात है, उस्ताद?”

उन्होंने बिल्कुल हल्की आवाज़ में कहा, “अगर मुझे सही याद है, तो तेरे पास, मेरे पास नहीं।”

हम लौट पड़े।

लौटते वक़्त मैंने पीछे देखा।

नीम वाली गली एक खुले मुँह जैसी खड़ी थी, और उसके भीतर कुछ नहीं था।

पर वो मुँह खुला था — बंद नहीं।

बस खुला।

.

साइकिल गली में पहुँचे तो रात के दो बज चुके थे।

और गली सोई नहीं थी।

नहीं सोई थी — पूरी गली जाग रही थी।

पीपल के नीचे दीये बुझ चुके थे, पर उसके आस-पास के दरवाज़ों से पीली रोशनी आ रही थी। किसी ने खिड़की खोली थी, किसी ने दहलीज़ पर पानी की बाल्टी रख छोड़ी थी — जैसे अभी सफ़ाई के बाद किसी ने सब बाहर डाल दिया हो।

शबनम आपा की गुमटी के बाहर बेंच भरी पड़ी थी।

कोई खड़ा था, कोई बैठा था, कोई चाय के प्याले हाथ में लिए चुपचाप उन लोगों को देख रहा था जो अभी भी मैदान से लौट रहे थे।

शबनम आपा की आवाज़ आ रही थी — “अरे, वो कटोरी नहीं, वो थाली है। बोलो किसको चाहिए? सात प्याले और, रज़िया आटे वाला डिब्बा ला।”

ज़्यादा समोसे थे। कम प्याले।

अब प्याले भी ख़त्म होने लगे थे।

चिंटू दौड़कर आया — “शबनम आपा, अब तो प्याला नहीं बचा।”

“तो कटोरी में दे दूँगी। कटोरी भी तो भगवान का बर्तन है,” शबनम आपा ने कहा। “रज़िया, कटोरी निकाल।”

“दीदी, मैंने तो पहले ही कह दिया था — सात प्याले कम हैं।”

“तेरे सात के सात बरस बाद, आज तू फिर साथ खड़ी है,” शबनम आपा ने कहा, और रज़िया की आँख भर आई — पर वो हँसी भी।

गुमटी में भीड़ बढ़ रही थी।

मैंने दूर से देखा — गोविंद भाई बेंच के एक कोने पर बैठे थे। उनके हाथ में एक प्याला था।

मैं रुक गया।

क्योंकि गोविंद भाई अपना प्याला पकड़े हुए थे — अपने ही हाथ से।

और उनका हाथ नहीं काँप रहा था।

मैं उनके पास गया।

“गोविंद भाई।”

उन्होंने ऊपर देखा। उनके चश्मे पर अब भी टेप बँधा था, पर टेप हिल नहीं रहा था।

“अंकुश बेटा,” उन्होंने कहा। “बैठ।”

“आपका हाथ —”

“मैं जानता हूँ,” उन्होंने कहा। “आज तीन लोगों ने मुझसे यही कहा। शालिनी बेटी ने भी। मीरा बेटी ने भी। अब मैं खुद देख रहा हूँ। पच्चीस साल में पहली बार।”

“क्या हुआ इसमें?”

“कुछ नहीं हुआ,” उन्होंने कहा। “बस आज मैंने अपना नाम अपने मुँह से बोला। मेरा नाम गोविंद है। गोविंद भाई। मैंने नाम किसी काग़ज़ पर नहीं लिखा, मैंने बोला था। और जब इंसान अपना नाम खुद बोलता है, तो हाथ नहीं काँपता।”

वो मुस्कुराए।

“पर वो मुश्किल था, बेटा। पच्चीस साल बाद। मुझे लगा था, बोलते वक़्त मेरी आवाज़ रुक जाएगी। पर नहीं रुकी। पता है क्या — आवाज़ पहले बोलती है, डर बाद में आता है।”

“और अब?”

“अब डर आया है,” उन्होंने कहा। “पर आवाज़ अंदर है। डर बाहर है। अब डर बाहर रहेगा।”

उन्होंने चाय का घूँट भरा।

“अंकुश,” उन्होंने धीरे कहा, “एक बात कहूँ?”

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