The Mysterious Bell – Chapter 1489
“काग़ज़ पर नाम लिखूँगा। पापा के साथ।”
उन्होंने पीली कॉपी अपने सीने से लगा ली।
“इसमें मेरा नाम भी है,” उन्होंने कहा। “देख लेना। मेरा नाम नीचे है — पूरे हिसाब के सबसे नीचे। और जब तू उस खाली लाइन पर लिखे, तो मेरा नाम भी ऊपर कर देना।”
“माँ…”
“मैंने बाईस साल चुप रहकर बहुत कुछ छिपाया,” उन्होंने कहा। “अब नहीं छिपाऊँगी।”
काजल ने मेरी तरफ़ देखा।
“मैं माँ को घर ले जा रही हूँ,” उसने कहा। “डॉक्टर इसरानी ने आज रात आराम बोला है। तू जब लौटे, तो सीधे ताले के पास आना।”
“काजल…”
“क्या?”
“आज तूने बहुत कुछ सँभाला है।”
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो पानी था जो उसने आज कई बार रोका था।
“मैं तेरी बहन हूँ,” उसने कहा। “यह मेरा काम है।”
और मैंने उसका सिर चूम लिया।
माँ को काजल के साथ जाते देखकर मेरे भीतर कुछ ढीला हुआ — कुछ वो, जिसे मैंने बहुत मज़बूती से बाँधा हुआ था। डर। डर कि माँ नहीं रहेगी। डर कि मैं पापा को नहीं बचा पाऊँगा। डर कि मैं अकेला रह जाऊँगा।
वो डर आज पूरी तरह नहीं गया। पर वो हिला ज़रूर। और हिलना ही काफ़ी था।
उस्ताद मेरे पास आए।
“कल के लिए,” उन्होंने कहा।
“क्या?”
“दो बजे। दफ़्तार।”
“मैं जाऊँ?”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने अपनी सिलाई की मशीन पर हाथ रखा — वही मशीन, जिसे उन्होंने आज ढका था, और आज शाम फिर से खोला था।
“जाएगा,” उन्होंने कहा। “पर पहले, मेरे साथ कहीं चल।”
“कहाँ?”
“पुराने बाज़ार में। नीम वाली गली में। चूल्हे वाले घर में।”
“रणवीर ने कहा था कि कोई वहाँ न जाए…”
“रणवीर गया,” उस्ताद ने कहा। “और आँगन में उसका ताला पड़ा है। अब मेरी बारी है।”
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
पापा ने सिर हिलाया।
“आज रात,” वो बोले। “कोई घर नहीं सोएगा।”
मैंने सिर हिलाया।
तभी अंधेरे में एक और आवाज़ आई।
“अंकुश भाई।”
रमेश भाई थे। वो डरते हुए आ रहे थे, जैसे हर कदम पर माफ़ी माँग रहे हों।
“कहिए, रमेश भाई।”
“वो नल वाली बात…” उन्होंने घुटने टेकने की कोशिश की।
मैंने उन्हें रोका।
“रमेश भाई,” मैंने कहा। “नल जोड़ने के लिए दो इंसान चाहिए। आप हैं, मैं हूँ। बस इतना काफ़ी है।”
वो खड़े रह गए। उनके होंठ काँपे। फिर उन्होंने कुछ नहीं कहा — बस हाथ जोड़ा और चले गए।
भोला भाई अपनी दुकान की तरफ़ जा रहे थे। उन्होंने मुड़कर कहा — “अंकुश, कल सुबह मैं अपने बेटे को तेरे पास भेजूँगा। सीखेगा।”
“क्यों?”
“क्योंकि यहाँ कुछ सीखने को है,” उन्होंने कहा।
और उनका रेडियो फिर बजने लगा — भोला भाई की दुकान का रेडियो, जिसे उन्होंने आज शाम किसी और गाने पर चला छोड़ा।
नसीमा बाई आँचल से आँसू पोंछ रही थीं। उनके बेटे साजिद ने मेरी तरफ़ देखा और फिर अपना सिर झुका दिया।
हरिप्रसाद बमुश्किल चल पा रहे थे। उनके बेटे ने उनका हाथ पकड़ा। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और अपनी आधी उँगली फिर ऊपर उठाई — इस बार आसमान की तरफ़ नहीं, मेरी तरफ़।
“सीख ले,” उन्होंने कहा। “उँगली नहीं रहती। नाम रहता है।”
और वो चले गए।
शबनम आपा और रज़िया मेरे पास आईं।
“अंकुश,” शबनम आपा ने कहा। “कल पूरी गली की चाय मेरी।”
“आपका चूल्हा बंद था।”
“आज रात फिर जल गया,” उन्होंने कहा। “चूल्हे ऐसे ही तो चलते हैं। एक दिन बंद, दूसरे दिन ज़िंदा।”
रज़िया ने अपनी कलाई दिखाई। हरी चूड़ी चमक रही थी।
“यह पंद्रह साल बाद मिली है,” उन्होंने कहा। “पहले पंद्रह साल की चूड़ी मुझे याद थी, अब ये मिल गई।”
मैंने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया।
फिर मैंने मीरा को देखा।
वो कैमरा उतार रही थी। धीरे से।
मैं उसके पास गया।
“कैसे रहे?” मैंने पूछा।
“पूरा आया,” उसने कहा। “एक भी फ्रेम नहीं छूटा।”
“तुमने मुझे आज एक बात कही थी, दोपहर को।”
उसने मेरी तरफ़ देखा।
“मैंने कहा था कि मैं अब आख़िरी बार अपने कैमरे से किसी को नहीं बचाऊँगी,” उसने कहा। “और आज मैंने पहली बार अपने कैमरे से सच बचाया।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
वो भी कुछ नहीं बोली।
हम दोनों एक पल वहीं खड़े रहे, मैदान के बीच, बुझते हुए दीयों के बीच, और उसी पल मुझे लगा कि मीरा तिवारी से कहीं ज़्यादा अच्छी दोस्त मुझे कभी नहीं मिलेगी।
पापा मेरे बगल में आए।
उनके हाथ में वो पुराना पीला फूला लिफ़ाफ़ा था।
“यह कल दो बजे से पहले खुलेगा,” उन्होंने कहा।
“कहाँ, पापा?”
उन्होंने मेज़ की तरफ़ देखा — उस लंबी मेज़ की तरफ़, जिस पर अब भी सैकड़ों काग़ज़ रखे थे, और जिनके पीछे कोई नहीं खड़ा था।
“यहीं,” उन्होंने कहा। “इसी मेज़ पर। उसी खाली लाइन के साथ।”
इतने में बबलू ने अपना स्कूटर स्टार्ट किया — पर फिर बंद कर दिया।
वो मैदान के बीच अकेला खड़ा था। स्कूटर के साथ। और उसकी आँखों में वो सवाल था जो उसने आज कई बार पूछा था पर मुझे कभी नहीं पूछा।
मैं उसके पास गया।
“कुछ पूछना है?”
“अंकुश,” उसने कहा। “मेरी बेटी की शादी है अगले साल।”
“मैं जानता हूँ।”
“लोग आएँगे?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“बबलू भाई,” मैंने कहा, “आज आपने जो किया, उसके बाद गली में कोई नहीं कहेगा कि आप कभी साहब के आदमी थे।”
उसकी आँखें भर आईं।
“साले,” उसने कहा, “तू मुझे रुलाने की कोशिश कर रहा है।”
और मैं हँस पड़ा। वो भी हँसा। पहली बार वो हँसा — बिना पान, बिना चेन, बिना डर।
फिर वो स्कूटर पर बैठा और चला गया।
मैं पलटकर मैदान को आख़िरी बार देखने लगा।
अब मैदान खाली था। दीये बुझ रहे थे — कुछ बुझ चुके थे, कुछ की लौ अभी टिमटिमा रही थी। पीपल के पत्तों में हवा थी, जिसकी आवाज़ किसी पुराने आदमी की साँस जैसी थी।
और वो लंबी मेज़ अब भी वहाँ खड़ी थी — खाली, पर हवा में हिलते काग़ज़ों के साथ।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।
ताले के दोनों हिस्से अभी भी वहीं थे। और घंटी भी — जो अब गरम नहीं थी, पर खाली भी नहीं थी।
टिंकू दौड़कर लौटा।
“उस्ताद!”
“क्या हुआ?”
“सबको बता दिया। भोला भाई, नसीमा आपा, किशनलाल काका, रमेश भाई, सानिया की अम्मी, गुड्डू के पापा…” उसने साँस लेने के लिए रुका, “…और वो तीन बुज़ुर्ग भी जो आज सुबह पीपल पर बैठे थे।”
मैं एक पल रुक गया।
“कौन तीन बुज़ुर्ग?”
“जो सुबह आए थे। जो कुछ नहीं बोले। जिन्होंने भूरा लिफ़ाफ़ा छोड़ा था।”
मेरी रीढ़ में एक ठंडी लकीर उतरी।
उन तीन बुज़ुर्गों का ज़िक्र कहानी में कई बार आया था, पर वो कोई नहीं थे जिन्हें मैं जानता था। और अब टिंकू कह रहा था कि वो आज रात भी मैदान में थे — शायद आख़िरी तक।
मैंने इधर-उधर देखा, पर वो कहीं नहीं दिखे।
“उनका क्या नाम था, टिंकू?”
“पता नहीं,” उसने कहा। “बस इतना कहा कि वो बिजलीघर आएँगे।”
मेरे भीतर कुछ हिला।
फिर मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। वो मेरी तरफ़ देख रहे थे, और उनके चेहरे पर एक अजीब-सी शांति थी।
“उस्ताद,” मैंने कहा।
“पता है,” उन्होंने कहा। “मैंने उन्हें देखा था।”
“कौन हैं?”
“जब वक़्त आएगा, खुद बता देंगे। आज रात बिजलीघर आएँगे — यही काफ़ी है।”
मैंने सिर हिलाया।
फिर मैंने एक बार घड़ी की तरफ़ देखा — पर घड़ी नहीं थी। मेरे पास घड़ी नहीं थी। पर मुझे लगा कि रात अब गहरी हो रही है।
“पापा,” मैंने कहा।
“हाँ?”
“आप घर जाइए। माँ के पास।”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा — कोई सवाल नहीं, कोई हिचक नहीं। बस एक बात।
“तू अकेला नहीं जाएगा।”
“अकेला नहीं हूँ, पापा। पूरी गली है।”
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