The Mysterious Bell – Chapter 149
गाड़ी चली गई। उसकी धूल उड़ी और मेरे जूतों पर आकर बैठ गई, जैसे कोई कह रहा हो — यह भी तेरे हिस्से की है, रख ले।
मैं कुछ देर वहीं खड़ा रहा। हाथ में पीली उँगली थी, उँगली पर गीला पीला रंग लगा था, और जेब में एक घंटी थी जो बिल्कुल चुप थी।
डॉक्टर साहब ने पीछे से कहा, "अंकुश, अंदर चलो। धूप तेज़ है।"
मैंने कहा, "साहब, धूप नहीं, यह नक्शे की गरमी है। मुझे थोड़ी देर अकेले चलना है।"
काजल ने कहा, "मैं साथ चलूँ?"
मैंने कहा, "तू माँ के पास रुक। माँ अकेली नहीं रहनी चाहिए, और मैं अकेले जाना चाहता हूँ। यह बात अलग है।"
वो समझ गई। वो अब बहुत चीज़ें बिना बोले समझ जाती है। यही डर की सबसे बड़ी कमाई होती है — बच्चे बड़े हो जाते हैं, और बड़े नहीं देख पाते।
मैं गली से लौटा। अस्पताल से गली तक का रास्ता ज़्यादा लंबा नहीं है, पर आज वो नापने में मुझे पूरी उम्र लगी। पीपल आया, उसकी छाया आई, चबूतरी आई। चबूतरी पर कोई नहीं बैठा था। सुबह के इस वक़्त वहाँ हमेशा कोई न कोई होता है, कोई तस्बीह घुमाता है, कोई अख़बार को चार तह करके पढ़ता है।
आज ख़ाली थी। जैसे किसी ने पहले ही बता दिया हो कि आज यहाँ मत बैठना।
उस्ताद की दुकान का शटर आधा गिरा था और अंदर से सिलाई मशीन की टिक-टिक एक बार आई, फिर रुक गई। जैसे कोई गला साफ़ करके बोलना शुरू करता है और फिर सोचकर चुप हो जाता है।
शबनम आपा की गुमटी का तवा गरम था। वो बाहर निकली, मुझे देखा, और बोली, "आ गया? माँ कैसी है?"
"ठीक है आपा। दवा बदली है। बिजली भी आ गई।"
"और तेरा चेहरा क्यों ऐसा है जैसे दवा तेरे लिए बदली हो?"
मैंने कहा, "आपा, चेहरा थोड़ी देर में ठीक हो जाएगा। पहले दुकान खोलनी है।"
वो मेरी तरफ़ देखती रही, फिर बोली, "जा। शाम को चाय पीना। और उस काग़ज़ वाले की बात मत सुनना। वो जो भी कहे, वो हवा है। हवा में वज़न नहीं होता।"
मैं हँसा। "आपा, हवा में वज़न नहीं होता, पर वो छत उखाड़ सकती है।"
"तो छत मज़बूत बनवा लेना," उसने कहा और अंदर चली गई, और मुझे लगा कि गली में कम से कम एक आवाज़ अभी भी अपनी जगह पर खड़ी है।
दुकान पहुँचा। शटर उठाया। शटर की आवाज़ आज बहुत तेज़ लगी। अंदर गया, बोर्ड पर लगी धूल देखी, टब में पानी डाला, हाथ धोया। पीला रंग पानी में घुलकर हल्का पीला हो गया और नाली में चला गया।
मैंने उँगली को रगड़ा। रंग गया, पर निशान नहीं गया। कुछ निशान ऐसे होते हैं जो पानी से नहीं जाते। उन्हें उतारने के लिए आदमी को लोगों के सामने खड़ा होना पड़ता है।
तभी टिंकू आया। उसके हाथ में एक मैला कपड़ा था और चेहरे पर वो भाव था जो बच्चों के चेहरे पर तब आता है जब वो बड़ों की बातें सुन लेते हैं और समझ नहीं पाते कि क्या पूछें।
उसने सीधे बोर्ड की तरफ़ हाथ बढ़ाया।
"उस्ताद, इस बोर्ड पर धूल इतनी है कि नाम पढ़ने के लिए चश्मा चाहिए।"
"तो लगा ले चश्मा।"
"मेरी उम्र में चश्मा नहीं लगता उस्ताद।"
"तो फिर बोर्ड पढ़ने की कोशिश मत कर। बोर्ड गली में लगा है, गली को पता है यहाँ क्या होता है।"
वो हँसा नहीं। उसने कपड़ा बोर्ड पर रखा और रगड़ने लगा। धूल उड़ने लगी और धूप में सफ़ेद-सफ़ेद दिखने लगी।
"उस्ताद," उसने कपड़ा रगड़ते हुए कहा, "आज वो आदमी आएगा न?"
"कौन?"
"जो अस्पताल पर आया था। जिसकी गाड़ी बड़ी थी।"
मैंने एक पल सोचा कि झूठ बोल दूँ। बच्चों को डर से बचाने का सबसे आसान तरीक़ा झूठ होता है। पर मैं जानता हूँ, झूठ वाले घरों में बच्चे सबसे पहले बड़े हो जाते हैं। मैंने वो रास्ता नहीं लिया।
"हाँ," मैंने कहा। "आएगा। आएगा तो बैठाएँगे। चाय पिलाएँगे। फिर देखेंगे क्या कहता है।"
"और अगर वो कुछ बुरा कहे?"
"तो सुनेंगे। बुरा कहने वाले से भागने में उसकी बात सच हो जाती है। सुनने में नहीं।"
टिंकू ने कपड़ा ज़ोर से रगड़ा। धूल हटी और बोर्ड पर लिखा नाम आधा दिखने लगा। पुराना बोर्ड, टेढ़ा टँगा, और उस पर वो नाम जो मैंने अब तक ठीक से नहीं पढ़ा था, क्योंकि ऊपर कभी धूल थी और अब सच।
वो धूल अब हट रही थी। और मुझे लगा कि आज हर चीज़ से धूल हट रही है, चाहे मैं चाहूँ या न चाहूँ।
और फिर गली में वो आवाज़ आई जो आज सुबह अस्पताल के गेट पर आई थी।
पहले जूतों की आवाज़। फिर तीन परछाइयाँ। फिर एक आवाज़ जो पान चबाते हुए बोल रही थी, जैसे कोई बात करते-करते चबाना नहीं छोड़ता।
बबलू पांडे।
आज सुबह उसने पान नहीं चबाया हुआ था। आज सुबह वो अलग लग रहा था, सफ़ेद कुर्ता, मोटा नक्शा, मुस्कान। अब वो अपने पुराने रंग में लौट आया था। मोटी सोने की चेन, हाथ में पान का पत्ता, और साथ में दो आदमी।
एक के हाथ में मोटी लाठी थी, दूसरे के हाथ में काला बैग। दोनों चुप थे। ऐसे आदमी ज़ुबान से नहीं, खड़े होने से बोलते हैं।
मैंने कपड़ा टिंकू के हाथ से लिया और टब के किनारे रख दिया।
"टिंकू," मैंने धीरे कहा, "अंदर जा। पीछे वाले कमरे में जा और ट्रंक के पास बैठ। जब तक मैं न बुलाऊँ, बाहर मत आना।"
"उस्ताद…"
"जा।"
उसकी आँखों में सवाल था, पर वो जानता है कि मेरी आवाज़ का एक ढंग होता है। जब मैं उस ढंग से बोलता हूँ, तो वो सवाल जेब में रखकर अंदर चला जाता है।
वो गया। उसका बस्ता दरवाज़े के पास पड़ा रह गया। मैंने उसे नहीं उठाया।
बबलू दुकान के सामने आया, मेरे सामने रखे स्टूल को देखा, और बिना पूछे उस पर बैठ गया। स्टूल ने चरचराकर शिकायत की और चुप हो गई।
"अंकुश भाई," उसने कहा और पान चबाया। "सुबह से तू कहाँ-कहाँ भाग रहा है, भाई? अस्पताल, गली, दुकान। भूत की तरह।"
"बबलू भाई," मैंने कहा, "भूत को थकान नहीं होती। मुझे होती है। इसलिए मैं आदमी हूँ।"
वो हँसा। उसका हँसना ऐसा था जैसे कोई मोटी किताब का पन्ना पलटे — आवाज़ बड़ी, मतलब छोटा।
"मज़ाक अच्छा करता है तू," उसने कहा। "इसीलिए तुझे गली में सब पसंद करते हैं। पर आज मैं इश्क़ करने नहीं आया, भाई। आज मैं एक बात कहने आया हूँ।"
उसने पान का पीक गली की तरफ़ फेंका। फिर मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें छोटी थीं, पर उनमें वो चीज़ थी जो काग़ज़ पर लिखी तारीख़ में होती है।
"आज से इस गली में कोई मरम्मत नहीं होगी।"
मैंने एक पल उसे देखा। फिर मैंने हँसकर कहा, "बबलू भाई, ये बात थोड़ी अटकी हुई है। मरम्मत तो होती रहेगी। यहाँ साइकिल ठीक होती हैं, सरकार नहीं।"
उसके पीछे खड़े लाठी वाले आदमी ने लाठी की नोक ज़मीन पर टिकाई। बस टिकाई। कोई आवाज़ नहीं। पर गली ने वो आवाज़ सुनी।
"मज़ाक में बात मत घुमा," बबलू ने कहा। "सुबह तूने अस्पताल पर बहुत बड़ी बात कह दी, भाई। तूने कहा कि काग़ज़ बहुत हैं, अंगूठा कहीं नहीं। साहब को यह बात पसंद नहीं आई। साहब को यह बात ऐसी लगी जैसे कोई उनके दरवाज़े पर खड़ा होकर उनका नाम ग़लत बोल रहा हो।"
"मैंने नाम नहीं बोला," मैंने कहा। "मैंने सिर्फ़ अंगूठे की बात कही। अंगूठा किसी का नाम नहीं होता, वो सिर्फ़ सबूत होता है। और सबूत जब तक न लगे, आदमी अपना ही रहता है।"
"फ़लसफ़ा बहुत है तुझमें," बबलू ने कहा। "पर गली में फ़लसफ़े से पेट नहीं भरता। गली में पेट शटर से भरता है। और शटर मेरे हाथ में है।"
उसने उँगली उठाई। बोर्ड की तरफ़।
"शाम तक यह बोर्ड उतर जाना चाहिए।"
मैंने बोर्ड देखा। वो टेढ़ा बोर्ड, जिस पर आज सुबह तक धूल थी और जिस पर अब आधा नाम साफ़ था।
"बोर्ड क्यों उतरेगा, भाई?" मैंने पूछा। "बोर्ड से किसी का पेट नहीं भरता। बोर्ड तो बस बताता है कि अंदर क्या होता है।"
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