The Mysterious Bell – Chapter 148
उन्होंने परची सीने की जेब में रखी।
"अब सुन लो, सब के सब। जब तक इस दवाखाने में एक भी मरीज़ है — एक — यह दवाखाना बंद नहीं होगा। तुम काग़ज़ लाओ, तारीख़ लाओ, मशीन लाओ। मेरी कुर्सी वहाँ से नहीं हिलेगी। और अगर मेरी कुर्सी नहीं हिली, तो तुम्हारी मशीन इस दीवार को छूने से पहले मुझे छूएगी।"
कतार खड़ी रह गई।
बूढ़ा आदमी, जो अपनी औरत को साइकिल पर लाता है, साइकिल से उतरा, और उसने अपना माथा डॉक्टर साहब की तरफ़ झुकाया। बस इतना।
और मुझे उस पल ऐसा लगा कि यह अस्पताल आज बच गया। सच में बच गया। कोई जादू नहीं, कोई घंटी नहीं। सिर्फ़ एक बूढ़ा आदमी जो अपनी कुर्सी से नहीं हिला।
मैंने काजल की तरफ़ देखा। वो दरवाज़े के अंदर खड़ी थी, सफ़ेद कोट में, और उसके हाथ में स्टेथोस्कोप था, और वो अपने आँसू पोंछ नहीं रही थी, जानबूझकर नहीं पोंछ रही थी।
फिर आए दुबे अंकल।
वो थाने के बाहर अपनी कुर्सी पर बैठते हैं, और उनकी कुर्सी की आड़ में बच्चे छिपकर बातें सुनते हैं। आज वो सीधे अस्पताल के गेट तक आए। वही नीली शर्ट, जो वर्दी जैसी है पर वर्दी नहीं है, और हाथ में एक पुरानी कॉपी, जिसके कोने मुड़े हुए थे।
उन्होंने अपना चश्मा साफ़ किया, कॉपी खोली, और उस पीली पट्टी की तरफ़ इशारा किया।
"तारीख़ पढ़ो," उन्होंने कहा।
नापने वालों में से किसी ने कुछ नहीं कहा।
"काग़ज़ पर जो तारीख़ लिखी है, उससे पहले कोई मशीन नहीं चलेगी," दुबे अंकल ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो रिटायरमेंट के बाद भी नहीं जाती। "मैं रिटायर हूँ, अंधा नहीं। तुम अपनी मशीन उस तारीख़ से एक दिन पहले लाओगे, तो मेरी शिकायत तुम्हारे मालिक के दफ़्तर पहुँचने से पहले थाने पहुँच जाएगी। और मैं इस गली का आदमी हूँ — मेरी शिकायत काग़ज़ में नहीं, लोगों के मुँह में लिखी जाएगी।"
उन्होंने कॉपी बंद की और कुर्सी की तरफ़ लौट गए।
और फिर आई शबनम आपा।
मैं तुम्हें बताना भूल गया कि शबनम आपा जब गुस्से में होती हैं तो उनका चेहरा नहीं बदलता — उनकी आवाज़ बदल जाती है। वो धीमी हो जाती हैं, और उनकी आवाज़ में उतनी ही मिठास आ जाती है जितनी गुड़ में होती है, और उसी मिठास से लोगों के कान जलने लगते हैं।
वो गुमटी से एक ट्रे लेकर आईं — उसमें दस गिलास चाय, और एक थाली में समोसे, और चाय की भाप उनके चश्मे पर जम गई, और उन्होंने चश्मा उतारकर कमर पर खोंस दिया।
"अरे, तो तुम लोग यहाँ नाप रहे हो," उन्होंने कहा, और बहुत प्यार से कहा। "कितना अच्छा काम करते हो। मेहनत वालों के लिए मेरे यहाँ चाय है।"
फ़ीता पकड़े आदमी ने हाथ बढ़ाया।
और शबनम आपा ने ट्रे उसके हाथ से बचाकर पीछे रख दी और अपनी लोहे की चिमटी उठा ली।
"पहले बताओ, तुमने यह फ़ीता किसकी ज़मीन पर बिछाया है?"
"मैडम, हम तो आदेश पर आए हैं।"
"आदेश किसका?"
"बबलू साहब का।"
"अच्छा। तो बबलू साहब को बोलो कि यह गली उनके पिता की नहीं है," शबनम आपा ने कहा, और उनकी आवाज़ और मीठी हो गई। "यह गली के उन लोगों की है जिन्होंने यहाँ चालीस साल चप्पल घिसी है। और मैं तुम्हें बता दूँ — मैं यहाँ चाय बेचती हूँ, चिमटी भी रखती हूँ। चिमटी गरम होती है। और मैं गरम चीज़ें उठाने में ज़्यादा सोचती नहीं।"
दो आदमी अपने आप पीछे हट गए।
"आपा," मैंने धीरे से कहा। "चाय ठंडी हो रही है।"
"ठंडी होने दे," उन्होंने कहा। "आज किसी को चाय नहीं मिलेगी। आज यह चाय अस्पताल के मरीज़ों के लिए है। इन चार लोगों को ज़िंदगी में यहाँ की चाय नहीं मिलेगी, मैं कसम खाती हूँ।"
और फिर उन्होंने ट्रे उठाकर सीधे अस्पताल के अंदर चली गईं, और जाते-जाते बूढ़े आदमी को एक गिलास थमा दिया, बिना कुछ कहे।
तुम सोच रहे होगे कि यह सब बहुत अच्छा चल रहा है। सब जीत रहे हैं, सब बोल रहे हैं।
हाँ, मैं भी यही सोच रहा था।
और यही सोचते हुए मेरे कान में घंटी बोली, बहुत छोटा सा वाक्य।
"पीछे मत देख। आगे देख।"
मैंने आगे देखा।
गली के मुहाने से एक सफ़ेद गाड़ी आ रही थी। धीरे, बहुत धीरे, जैसे कोई शादी में आ रहा हो। उसकी खिड़कियाँ काली थीं, और धूप उन पर पड़कर बहुत साफ़ दिख रही थी, और मुझे उस गाड़ी से वो गंध आई जो नई गाड़ी से आती है — पेंट और चमड़े की।
गाड़ी रुकी। दरवाज़ा खुला।
और उतरा बबलू पांडे।
आज उसने पान नहीं चबाया हुआ था। आज वो अलग लग रहा था। उसके गले में वही मोटी सोने की चेन थी, पर आज उसने ऊपर एक सफ़ेद कुर्ता पहना था, और हाथ में एक मोटा मुड़ा हुआ नक्शा था — इतना मोटा कि जैसे उसने उसमें कोई किताब लपेट रखी हो।
और उसके चेहरे पर मुस्कान थी।
वो मुस्कान मुझे सबसे ज़्यादा डराती है। गुस्सा तो ठीक है, गुस्से से आदमी की बुद्धि खराब होती है। पर मुस्कान — मुस्कान का मतलब होता है कि आदमी ने पहले से सोच रखा है।
वो सीधा मेरे पास आया। कतार के बीच से, बिना किसी को हटाए, और लोग उसके रास्ते से अपने आप हट गए।
"अंकुश भाई," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में मिठास थी। "तुम सुबह-सुबह यहाँ क्या कर रहे हो? तुम्हारी दुकान का तो कोई काम नहीं है न इस इमारत से?"
"बबलू भाई," मैंने कहा, "मेरी दुकान का काम अस्पताल से नहीं, इस गली से है। और इस गली में हवा भी अब आपका काग़ज़ पढ़कर चलती है। मैं आपके काग़ज़ के नीचे अपने हाथ की लकीर देखने आया हूँ।"
"देख लो," बबलू ने कहा, और उसने नक्शा खोल दिया।
मैंने नक्शा देखा।
एक बड़ी शीट। ऊपर नीली मोहर, नीचे तारीख़, और बीच में पूरी गली की लकीरें, रास्ते, नाली, पीपल का गोल निशान, चबूतरी का चौकोर, और… और मेरी दुकान।
मेरी दुकान का चौकोर बना हुआ था, और उस पर लाल पेंसिल से एक छोटा क्रॉस।
मेरे पीछे किसी ने साँस रोक ली। मुझे नहीं पता कौन था। शायद डॉक्टर साहब। शायद काजल। शायद मैं खुद।
बबलू ने नक्शे पर उँगली रखी और उसे धीरे-धीरे खींचने लगा, जैसे कोई बच्चा रेत पर लकीर बनाता है।
"देख ले," उसने कहा, और उसकी मुस्कान थोड़ी और बढ़ गई।
"यहाँ से…" उसकी उँगली अस्पताल के चौकोर पर रुकी।
"…यहाँ तक।"
और उसकी उँगली गली की पूरी लंबाई नापकर मेरी दुकान के चौकोर पर आकर रुकी, और फिर आगे बढ़ी, और उस नीली लकीर पर रुकी जहाँ मेरा घर था।
"अस्पताल," उसने कहा, और उँगली दबाई।
"गली," उसने कहा, और उँगली खिसकी।
"तेरी दुकान," उसने कहा, और उसने मेरी तरफ़ देखा।
"और तेरा घर।"
उसने नक्शा मेरे सामने फैला दिया, इतना पास कि मेरी साँस उस पर लग रही थी।
"सब एक नक्शे में हैं, अंकुश भाई," उसने कहा। "एक ही नक्शे में। और यह नक्शा मेरी जेब में है। अब तू बोल — तू किस चीज़ को बचाने की बात करता है? इस गली को? इस दवाखाने को? अपनी दुकान को? अपने घर को?"
उसने नक्शा मोड़ना शुरू किया, और मोड़ते हुए बोला —
"इनमें से एक भी चीज़ अलग नहीं है, भाई। सब एक ही काग़ज़ पर लिखी हैं। और मैं तुझे एक बात और बता दूँ — साहब ने इस नक्शे पर तेरे नाम की जगह भी खाली रखी है। सोच ले। खाली जगह अच्छी चीज़ होती है। कभी-कभी उसमें बहुत कुछ भरा जा सकता है।"
नक्शा मुड़ा। गाड़ी का दरवाज़ा खुला। और मैं वहीं खड़ा रह गया, हाथ में पीले रंग वाली उँगली, और जेब में एक घंटी जो अब तक चुप थी — बिल्कुल चुप, जैसे वो भी सुन रही हो कि इस नक्शे में मेरे लिए क्या लिखा है।
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