The Mysterious Bell – Chapter 1484
“काला नहीं,” मीरा ने कैमरे के साथ आगे बढ़ते हुए कहा। “फीका हो रहा है।”
और जैसे ही मीरा का कैमरा आगे बढ़ा, भीड़ में एक और आवाज़ उठी — धीमी, काँपती, शक भरी — वही मोबाइल वाले हरी शर्ट के आदमी की।
“ये सब नाटक है,” उसने कहा। “साहब भी मिले हुए हैं।”
पर उसकी आवाज़ किसी ने नहीं उठाई।
क्योंकि उस वक़्त भीड़ में कुछ और हो रहा था।
लोग एक-दूसरे को देख रहे थे।
चुपचाप। बिना किसी सवाल के।
माँ ने काजल की तरफ़ देखा और काजल ने माँ की तरफ़। शबनम आपा ने रज़िया के कंधे पर हाथ रखा और रज़िया ने उनका हाथ पकड़ लिया। उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा और मैंने उनकी तरफ़। पापा ने मेरी बाँह पकड़ रखी थी, और अब उनकी पकड़ ढीली हो गई थी — जैसे किसी ने कहा हो, अब तू छोड़ भी सकता है, मैं गिरूँगा नहीं।
कोई नहीं बोला। पर मुझे साफ़ लगा कि भीड़ से एक बोझ उतरा है।
ऐसा बोझ, जो लोग सालों से उठाए हुए थे और उन्हें पता ही नहीं था कि वो उनके कंधों पर है। माँ का डर, पापा का डर, गोविंद भाई का काम, नसीमा बाई का तराज़ू, रमेश भाई की बाल्टी, शबनम आपा की चूल्हा, बच्चों का स्कूल — सब किसी एक लंबी रस्सी से बँधे थे, और उस रस्सी की गाँठ किसी के हाथ में थी।
अब वो गाँठ ढीली पड़ गई थी।
“उस्ताद,” मैंने धीरे से कहा। “बिजलीघर के बक्से। जबसे आपने छठे बक्से की बात बताई थी, वो अलग दिखता था।”
“हाँ,” उस्ताद ने कहा। “और अब वो चटक गया।”
“क्या मतलब?”
“मतलब,” उस्ताद ने कहा और उनकी आवाज़ बहुत धीमी हो गई, “कि जो बक्से में बंद था, वो बक्से से नहीं, अपने-आप से टूट रहा है।”
मैंने रणवीर की तरफ़ देखा।
वो अब भी अपनी हथेली देख रहा था। उसने अपना रूमाल निकाला — वही सफ़ेद, जिससे उसने सफ़ेद सीट पर काली बूँदें पोंछी थीं — और हथेली पर रगड़ा।
लकीर नहीं गई।
फिर उसने वो रूमाल जेब में डाला और पीछे मुड़कर अपने आदमियों की तरफ़ देखा।
पर उसके आदमी — जो अब तक उसके पीछे साये की तरह खड़े रहते थे — उस वक़्त एक कदम दूर खड़े थे।
मैंने देखा। ठीक से देखा।
और यही चीज़ थी जो रणवीर भारद्वाज को सबसे ज़्यादा डराती है — यह नहीं कि उसका हाथ जल रहा है, यह कि उसके पीछे खड़े आदमी अब उससे सटे नहीं हैं।
“रमेश,” रणवीर ने कहा। “गाड़ी लाओ।”
रमेश — वही ड्राइवर, जिसकी कलाई पर लाल धागा था — एक पल रुका, और फिर गाड़ी की तरफ़ चला।
पर वो रुका था।
एक पल।
और उस एक पल में मैंने रणवीर के चेहरे पर वो चीज़ देखी, जो मैंने बाईस साल के डर में पापा के चेहरे पर देखी थी — यह अहसास कि जिस चीज़ पर तुम सबसे ज़्यादा टिके थे, वो तुम्हें नहीं संभाल रही।
मैंने मेज़ पर पड़े ताले के दोनों हिस्सों को उठाया।
दोनों हल्के थे। इतने हल्के, जैसे अंदर से खाली कर दिए गए हों। मैंने उन्हें अपनी जेब के पास रखा — एक हिस्सा दाहिनी जेब में, दूसरा बाईं जेब में।
घंटी ने मेरी जेब के अंदर एक हल्की सी आवाज़ की। मैंने हाथ जेब पर रखकर महसूस किया — वो ठंडी थी, पर खाली नहीं। जैसे किसी चीज़ का इंतज़ार कर रही हो।
तभी टिंकू ने मेरी कमीज़ खींची।
“उस्ताद,” उसने फुसफुसाकर कहा, “वो बूढ़ा। वो लकड़ी के जूते वाला।”
मैंने उसकी आँखों की दिशा में देखा।
वो बूढ़ा मुँह से कुछ नहीं बोल रहा था। वो हाथ में एक पीली कॉपी पकड़े खड़ा था — वही कॉपी, जो सफ़ेद कुर्ते वाले अजनबी ने मैदान में दिखाई थी।
और वो बूढ़ा मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुरा रहा था।
धीरे-धीरे। बिना दाँत दिखाए।
ऐसी मुस्कान, जो किसी खुशी से नहीं आती — किसी चीज़ के पूरा होने से आती है।
मेरी जेब में घंटी हिली। और मुझे लगा जैसे किसी ने धीरे से कहा हो — “अब आगे।”
पर मैंने उसे अनसुना नहीं किया।
मैंने पापा का हाथ पकड़ा और भीड़ से कहा — “आज रात सब घर जाएँ। कल दो बजे से पहले सब कुछ तय होगा। और उससे पहले, वो खाली लाइन।”
माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
“बेटा,” उन्होंने कहा। “उस लाइन पर तेरा नाम लिखा जाएगा, तो काग़ज़ किसके नाम पर होगा?”
“किसी के नाम पर नहीं, माँ,” मैंने कहा। “जिस चीज़ पर सबका नाम हो, उस पर किसी एक का नाम नहीं होता।”
माँ ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने कुछ ऐसा कहा जो मैंने उनसे पहले कभी नहीं सुना था —
“तो कल लिखते वक़्त,” उन्होंने कहा, “मेरा नाम भी लिख लेना। मैं भी उस लाइन में शामिल हूँ।”
काजल ने माँ की तरफ़ देखा और उसकी आँखें भर आईं।
मैंने सिर हिलाया।
और फिर मैंने एक बार बिजलीघर की तरफ़ देखा — जहाँ से वो चटक आई थी — और सोचा, कल अगर मैं वहाँ गया, तो मुझे छह बक्सों के सामने सच बोलना पड़ेगा। बिना झूठ, बिना बहाने।
मेरी जेब में घंटी गरम नहीं हुई।
पर उसने मुझे रोका भी नहीं।
कभी-कभी चुप्पी भी हामी होती है।
॥
चुभन फिर आई।
वो ठंडी सुई जैसी चुभन — जो रीढ़ से शुरू होकर सीधे सिर तक जाती है। मैंने कंधे सिकोड़े। पापा का हाथ मेरे हाथ में था, और उनकी उँगलियाँ एक बार फिर काँपीं, फिर रुक गईं।
मैंने चारों तरफ़ देखा। मैदान में दीये अब भी जल रहे थे, पर उनकी लौएँ एक तरफ़ झुकी हुई थीं — जैसे हवा में किसी ने बहुत धीरे से साँस ली हो।
सामने, दस कदम दूर, वो बूढ़ा खड़ा था। लकड़ी के जूते। हाथ में पीली कॉपी। मुँह पर वही धीमी मुस्कान — न दाँत, न खुशी, बस किसी चीज़ के पूरा होने का इंतज़ार।
उसने कुछ नहीं कहा।
उसकी जगह हवा ने कहा।
“शबनम ने रज़िया को पंद्रह साल अपने घर में नौकर की तरह रखा।”
आवाज़ मैदान के बाएँ कोने से आई। फिर दाएँ से। फिर पीछे से। जैसे किसी ने एक ही बात को कई मुँहों से बोल दिया हो, और हर मुँह का अपना अलग स्वर हो।
“पंद्रह साल! और अब एक हरी चूड़ी में सब भूल गई?”
मैंने शबनम आपा की तरफ़ देखा।
वो मेज़ के पास खड़ी थीं। उनका मुँह एक पल के लिए सफ़ेद पड़ा। फिर उन्होंने अपनी गुमटी वाली आदत से हाथ कमर पर रखा — पर इस बार हाथ कमर तक पहुँचा ही नहीं। वो रुक गया।
रज़िया उनके बगल में थी। पतली, सिर पर पुरानी चादर, और कलाई पर वो हरी चूड़ी — जो दो टुकड़ों से आज ही पूरी हुई थी।
शबनम आपा ने रज़िया का हाथ पकड़ा। और मैदान के बीच में खड़ी हो गईं।
“हाँ,” उन्होंने कहा। “यह हुआ था।”
भीड़ में सन्नाटा।
“मैंने पंद्रह साल तक अपनी बहन को अपने ही घर में पराया रखा। मैंने उसको कसमों से बाँधा, बातों से बाँधा, और जब वो बाहर निकली तो मैंने कहा — जा, अब मत आना।”
उनकी आवाज़ थोड़ी काँपी, पर टूटी नहीं।
“हाँ, मैंने यह किया। और आज मैं इसका हिसाब देती हूँ। मुझे माफ़ी चाहिए — अपनी बहन से, और उस माँ से जिसके गेट पर मैंने दूध की कटोरी लौटाई थी।”
रज़िया ने धीरे से कहा, “आपा, मत…”
“नहीं,” शबनम आपा ने कहा। “सुनने वाले सुन रहे हैं। जो सच सबके सामने बोला जाता है, वही सच होता है। बाक़ी सब बहाना।”
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी। पर जैसे ही शबनम आपा ने आख़िरी शब्द कहा, उस पर एक हल्की गरमाहट आई — बहुत हल्की, बस इतनी कि मुझे यक़ीन हो जाए कि वो सुन रही है।
हवा में चुभन थोड़ी पतली हुई।
फिर वो फिर उठी।
“गोविंद ने शंकर यादव का अंगूठा क्यों लिया? किस हक़ से? चार हज़ार रुपये के लिए?”
यह आवाज़ पीछे से आई — वहाँ से जहाँ गोविंद भाई खड़े थे।
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