The Mysterious Bell – Chapter 1483
माँ के हाथ में गीला कपड़ा है। वो हँसते हुए भी कपड़ा निचोड़ रही है, और उनकी आँखें मेरे घुटने पर हैं — बस मुँह से कह रही हैं कि ये कुछ नहीं है, क्योंकि अगर उन्होंने डर दिखाया तो मैं और ज़ोर से रोऊँगा।
और मैं और ज़ोर से रोता हूँ।
पापा साइकिल उठाकर किनारे करते हैं। फिर मेरे पास आकर घुटनों के बल बैठ जाते हैं।
वो जल्दी में नहीं हैं। वो बहुत आराम से बैठते हैं, जैसे आज उनके पास पूरी दुनिया का वक़्त हो।
“देख,” वो कहते हैं और मेरा घुटना अपनी मुट्ठी से पोंछते हैं। “कुछ नहीं हुआ।”
“दर्द हो रहा है,” मैं नाक में बोलता हूँ।
“होना चाहिए,” पापा कहते हैं। “गिरेगा तो दर्द होगा।”
फिर वो रुकते हैं। और मेरी आँखों में देखते हैं।
“एक बात सुन,” वो कहते हैं। “अकेले उठना सीख। ये ज़रूरी है। जो आदमी गिरकर अकेले नहीं उठ सकता, वो आगे नहीं जाता।”
मैं सुबकता हूँ।
“पर,” पापा कहते हैं और मेरा हाथ अपनी हथेली में ले लेते हैं, “हाथ पकड़ना भी मत भूलना।”
“किसका हाथ?”
“किसी का भी,” पापा कहते हैं। “जो तेरे पास खड़ा हो। बाप का, माँ का, भाई का, दोस्त का। कोई न मिले तो गली में खड़े किसी आदमी का।”
वो मेरे घुटने पर अपना रूमाल बाँधते हैं।
“अकेले उठने वाला आदमी,” वो धीरे से कहते हैं, “कभी-कभी बहुत ऊँचा चला जाता है। पर वहाँ पहुँचकर उसे बताने वाला कोई नहीं होता कि मैं पहुँच गया।”
मैं सुबकते हुए सिर हिलाता हूँ।
और तभी माँ छत से चिल्लाती हैं — “खेलूराम की दुकान से एक और रूमाल ले आना! ये सब बर्बाद कर देगा।”
पापा हँसते हैं।
मैं भी हँसता हूँ। नाक बहती हुई, घुटना जलता हुआ, और मैं हँसता हूँ।
रोशनी धीमी होने लगी।
छत धुँधली हुई। कपड़े हवा में घूमकर गायब हो गए। पापा का जवान चेहरा धूल की तरह बिखर गया।
और मैं मैदान में लौट आया।
मेरे घुटने पर अब भी एक पुराना निशान है। मैंने उसे सालों से नहीं देखा था।
मेरी आँखें खुली थीं। मैदान में सन्नाटा था। सब मेरी तरफ़ देख रहे थे।
पापा मेरी बाँह पकड़े खड़े थे — बूढ़े पापा, झुकी कमर वाले, टेप से बँधे चश्मे वाले।
“अंकुश?” उन्होंने धीरे से कहा। “कहाँ गया था तू?”
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
“पापा,” मैंने कहा, “आपने मुझे एक बात बचपन में बताई थी।”
“कौन सी?”
“अकेले उठना सीख। पर हाथ पकड़ना भी मत भूलना।”
पापा के चेहरे पर कुछ बदला। जैसे किसी ने उनके हाथ से एक बहुत पुरानी चीज़ वापस उनकी हथेली पर रख दी हो।
“तुझे याद है?” उन्होंने कहा।
“नहीं,” मैंने कहा। “मैं भूल गया था। बहुत साल भूला रहा।”
मैंने मैदान में चारों तरफ़ देखा — माँ, काजल, उस्ताद, मीरा, टिंकू, शबनम आपा, रज़िया, गोविंद भाई, बबलू — सब मेरी तरफ़ देख रहे थे।
“मैं सालों से यही कर रहा था,” मैंने कहा। “सब अकेले उठाने की ज़िद पर उतर आया था। घर, दुकान, माँ का इलाज, पापा का डर, गली का हिसाब। जैसे अगर मैंने किसी से हाथ माँगा, तो मेरी कोई चीज़ छिन जाएगी।”
माँ ने कुछ कहना चाहा, पर मैंने हाथ उठाकर रोका।
“अब नहीं,” मैंने कहा। “अब उठाना भी है, और हाथ भी पकड़ना है। दोनों।”
टिंकू ने पीछे से कहा, “उस्ताद, ये अच्छी बात बोली आपने।”
भीड़ में हल्की हँसी फैली — वो हँसी जो डर के बाद आती है, जब किसी को लगता है कि अब साँस लेना ठीक है।
उसी वक़्त मेरी हथेली में ताला ठंडा पड़ने लगा।
बहुत ठंडा। जैसे पानी में पड़ा पत्थर।
मैंने उसे देखा।
उसकी पीली लकीर धीमी होकर बुझ गई। और फिर ताला — जो बीस हाथों से भी नहीं खुलता उसकी कहानी थी — मेरी हथेली पर दो हिस्सों में अलग हो गया।
टूटकर नहीं। जुड़ाई पर से दो टुकड़े ऐसे अलग हुए, जैसे किसी ने बहुत आराम से दो पलकें खोली हों। ऊपर का हिस्सा, नीचे का हिस्सा।
दोनों के अंदर खोखलापन था। और उस खोखलेपन में — मैंने ध्यान से देखा — किसी भी तरफ़ कोई चीज़ नहीं थी। न काग़ज़, न पैसा, न कील।
सिर्फ़ खोखलापन।
और उस खोखलेपन की दीवार पर एक बहुत महीन-सी लकीर बनी थी, जो घंटी की जीभ के आकार की थी। बिल्कुल वैसी, जैसे किसी ने उँगली से पीतल में दबाकर छाप छोड़ी हो।
कपूर की गंध फिर आई। इस बार हल्की। इतनी हल्की कि लगा किसी ने बहुत दूर किसी कमरे में कपूर जलाया है।
“अरे,” उस्ताद ने मेरे कंधे के पास से कहा। “ये तो… ये तो खुला।”
“टूटा नहीं,” मैंने कहा। “खुला।”
“ताले की तीन शर्तें थीं,” उस्ताद ने कहा। “हर शर्त में एक हाथ। पर तीन हाथ लगने के बाद भी ताला बोलता था। बोलने के बाद खुलता है।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
“आपने पहले क्यों नहीं बताया?”
“क्योंकि मुझे याद नहीं था,” उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ में कोई बहाना नहीं था, सिर्फ़ एक थकी हुई सच्चाई। “पचास साल में आदमी बहुत चीज़ें भूल जाता है। ताले ज़्यादा याद रखते हैं।”
मैंने ताले के दोनों हिस्से मेज़ पर रखे।
दोनों टुकड़ों ने मेज़ पर रखे जाते ही एक हल्की आवाज़ की — ‘टन’ और ‘टन’। जैसे दो घंटियाँ जिनकी आवाज़ कोई नहीं सुनता।
और उसी वक़्त दूर से एक आवाज़ आई।
एक चटक।
लंबी। मोटी। ऐसी, जैसे कोई बहुत पुरानी लकड़ी का चौखटा, जिसे बीस साल से कोई नहीं छू रहा, अचानक बीच से चटक जाए।
आवाज़ बिजलीघर की तरफ़ से आई।
पूरा मैदान एक साथ उस तरफ़ मुड़ा।
मीरा ने अपना कैमरा उठाया। “वहाँ कुछ हुआ है।”
“कुछ नहीं हुआ,” चंद्रेश सक्सेना ने धूल में बैठे-बैठे कहा, पर उनकी आवाज़ में वो मिठास अब नहीं थी। “रात है। कोई दरवाज़ा गिरा होगा।”
“सर,” मीरा ने कहा, “उस तरफ़ कोई दरवाज़ा नहीं है।”
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
“बिजलीघर,” उन्होंने कहा। “वो छह बक्से।”
मेरी जेब में घंटी एक बार फिर हिली। पर इस बार वो गरम नहीं हुई। बस एक बार हिली, जैसे कोई बूढ़ा आदमी सिर ऊपर उठाकर कहे — “आ गया।”
मैंने भीड़ में रणवीर को ढूँढा।
वो मेज़ से कुछ कदम दूर खड़ा था। उसकी जेब में हाथ था। उसका चेहरा वही शांत, वही विनम्र, पर कोई चीज़ गड़बड़ थी। वो अपने होंठ नहीं हिला रहा था, और जो आदमी सोच में डूबा हो, उसके होंठ नहीं हिलते।
फिर उसने अपनी जेब से हाथ निकाला।
और अपनी हथेली देखी।
मैं दूर था, पर मैंने देखा।
उसकी हथेली पर वो नीली लकीर थी, जो मेज़ पर पटके जाने के बाद उभरी थी। मोटी, ज़ख्म जैसी।
अब वो लकीर फीकी पड़ रही थी। ऐसे, जैसे किसी ने रात के रंग से उसे धीरे-धीरे पोंछना शुरू कर दिया हो। जहाँ सबसे मोटी थी, वहाँ से शुरू होकर। अब सिर्फ़ आधी बची थी — सीधी नहीं, टूटी हुई। जैसे किसी ने किसी का नाम काट दिया हो।
रणवीर ने अपनी हथेली पलटी। फिर दूसरी तरफ़ की।
फिर उसने अपना हाथ कुर्ते की आस्तीन से रगड़ा, धीरे-धीरे नहीं — ज़ोर से।
लकीर बदली नहीं।
वो आधी थी।
रणवीर ने सिर उठाकर मेरी तरफ़ देखा — और उसकी आँखों में वो चीज़ नहीं थी जो बाईस साल से थी। न हिसाब, न शरारत, न बड़प्पन।
डर थी।
सीधी, बच्चों जैसी डर, जो सर पकड़ लेती है।
और रणवीर भारद्वाज — जिसने अपनी ज़ुबान से लोगों की ज़मीनें हड़पी थीं, जिसने अपने ही डर से मिलने की हिम्मत नहीं की थी, जिसने बबलू के काँपते हाथ से अंगूठा लिया था — रणवीर भारद्वाज ने एक कदम पीछे हटते हुए कहा —
“ये नहीं हो सकता।”
उसकी आवाज़ सुनकर भीड़ में एक लहर दौड़ी।
“साहब को क्या हो गया?” सानिया की माँ ने कहा।
“साहब का हाथ देखो,” रफ़ीक़ बोला। “भाई, साहब का हाथ काला हो रहा है।”
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