The Mysterious Bell – Chapter 1482
मैंने पापा के सीने पर अपना माथा टिकाए रखा। उनकी कमीज़ पर मेरे आँसू गिरे। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरा। बहुत धीरे। जैसे सालों की धूल हटा रहे हों।
और तभी —
ताले के भीतर से हँसी आई।
बहुत धीमी। बहुत पुरानी। जैसे किसी बंद कमरे से आती हो। पर साफ़। इतनी साफ़ कि मैदान में खड़े हर आदमी ने सुना।
वो हँसी मेरे कानों में घुसी और सीधे मेरी रीढ़ तक उतर गई।
मैंने पापा से अपना सिर अलग किया।
“ये…” मैंने कहा।
पापा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया था।
“ये हँसी,” उन्होंने धीमे से कहा।
वो हँसी फिर आई। इस बार थोड़ी लंबी। जैसे कोई अपनी ही किसी पुरानी बात को याद करके हँस रहा हो।
मैंने उसे पहचानने की कोशिश की।
बहुत जानी-पहचानी लगी।
मुझे लगा जैसे मैंने ये हँसी बहुत पहले सुनी है। बहुत साल पहले। जब मैं छोटा था। तब भी कभी रात में उठकर मैंने सोचा था कि घर में कोई हँस रहा है। पर जब आँख खोली, तो सिर्फ़ पंखे की आवाज़ थी।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।
घंटी गरम थी।
बर्फ़ जैसी नहीं। आग जैसी नहीं। बस इतनी गरम कि मेरी हथेली जलने लगी।
मैंने उसे बाहर निकाला।
घंटी मेरे हाथ में काँप रही थी। उससे कोई आवाज़ नहीं आई। न “हाँ”, न “नहीं”, न कोई चेतावनी। सिर्फ़ गरमाहट।
वो हँसी फिर आई।
इस बार हँसी के साथ एक शब्द भी आया। बहुत दबा हुआ। जैसे किसी ने बहुत सालों बाद बोला हो।
“…बेटा…”
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
पापा ने मेरा हाथ पकड़ा।
“अंकुश,” उन्होंने कहा।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
उनकी आँखों में वो पानी अब भी था। पर उसके पीछे डर भी था।
“ये हँसी,” पापा ने कहा, “मैंने बाईस साल पहले सुनी थी।”
“कहाँ?”
पापा ने ताले की तरफ़ देखा।
“उस रात,” उन्होंने कहा। “जिस रात मैंने अंगूठा लगाया था।”
मैदान में हवा रुक गई।
दीयों की लौ एक साथ झुकी और फिर सीधी हो गई।
मंसूर का टूटा ताला मेज़ पर पड़ा था। उसके जोड़ से पीली रोशनी की लकीर अब भी निकल रही थी। और उसके भीतर से कोई हँस रहा था।
मैंने घंटी को उस ताले की तरफ़ बढ़ाया।
घंटी की गरमाहट मेरी हथेली से बढ़कर मेरी बाँह तक चली गई।
और ताले के भीतर से वो हँसी फिर आई।
इस बार मुझे लगा कि वो हँसी मेरी अपनी आवाज़ में है। बस बहुत पुरानी। बहुत थकी हुई। जैसे किसी ने बहुत साल पहले मेरी आवाज़ चुरा ली हो और अब उसे मेरे सामने लौटा रहा हो।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
“पापा,” मैंने कहा, “ये ताले में कौन है?”
पापा की आँखों से आँसू गिरते रहे।
“मुझे नहीं पता, बेटा,” उन्होंने कहा। “पर मुझे लगता है कि ये वो आदमी है जिसने मुझे अपनी शक्ल दी थी। और जिसकी शक्ल मेरी है।”
वो हँसी फिर आई।
और घंटी मेरे हाथ में इतनी गरम हो गई कि मेरी उँगलियाँ खुल गईं। घंटी मेज़ पर गिरी। उसने एक हल्की आवाज़ की, जैसे किसी ने बहुत दूर से आह भरी हो।
फिर सब चुप हो गया।
ताले से पीली लकीर गायब हो गई।
हवा में फिर कपूर की गंध आई।
और मैदान में खड़े सैकड़ों लोगों के बीच, सिर्फ़ एक आवाज़ बची —
मेरे पापा की।
“मैं डरता हूँ, बेटा,” उन्होंने कहा। “पर अब अकेला नहीं।”
मैंने उनका हाथ फिर पकड़ लिया।
“नहीं, पापा,” मैंने कहा। “अब अकेला नहीं।”
और मैंने मेज़ पर पड़ी घंटी उठाई। वो फिर ठंडी थी। बिल्कुल ठंडी। जैसे उसने अभी-अभी कोई बहुत भारी बात सह ली हो।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
“कल दो बजे,” मैंने कहा। “रणवीर के दफ़्तार। और उससे पहले, वो खाली लाइन।”
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
“वो लाइन,” उन्होंने कहा।
“हाँ,” मैंने कहा। “जिस पर पहले मेरा नाम लिखा था। अब उस पर सच लिखा जाएगा।”
पापा ने धीरे से सिर हिलाया।
और मैदान में पहली बार ऐसा लगा कि सन्नाटा डर से नहीं, थोड़ी राहत से है।
पर मेरे अंदर एक सवाल अब भी काँटे की तरह धँसा था।
वो हँसी किसकी थी?
और वो मेरी आवाज़ में क्यों हँसी थी?
मैंने घंटी को अपनी जेब में रखा। उसकी सतह अब भी हल्की गरम थी।
मैंने मंसूर का टूटा ताला उठाया।
उसे अपनी हथेली पर रखा।
और मैंने धीमे से उससे कहा —
“तेरे अंदर जो भी है, सुन ले। कल मैं उसे ढूँढूँगा।”
ताला चुप रहा।
पर मेरी हथेली पर उसकी सतह एक बार फिर काँपी। जैसे किसी ने अंदर से हामी भरी हो।
और पीपल के नीचे जलते आख़िरी दीये की लौ ने एक बार झुककर फिर सीधा होना छोड़ दिया।
वो धीरे-धीरे बुझने लगी।
मैंने पापा का हाथ पकड़ा।
“चलो,” मैंने कहा। “घर चलें। कल बहुत काम है।”
पापा मेरे साथ चले।
और हमारे पीछे, मैदान में, ताले की गरमाहट अब भी हवा में तैर रही थी — जैसे कोई बहुत पुराना दरवाज़ा अभी बंद हुआ हो।
पर बंद होकर भी वो चुप नहीं था।
वो अंदर से हँस रहा था।
॥
ताले की हँसी रुकी नहीं।
वो मेरी ही आवाज़ में थी, पर उसमें एक पुरानी हवा भरी थी — जैसे कोई बहुत साल बंद कमरे का दरवाज़ा खोलकर बाहर निकले और पहली साँस में घर की गंध भर ले।
मैंने घंटी दोबारा हाथ में ली। वो फिर गरम हो गई। मेरी हथेली से वो गरमाहट कलाई तक गई और फिर बाँह तक।
और ताले के जोड़ से निकली पीली रोशनी पतली लकीर से फैलने लगी।
मैदान में सैकड़ों लोग खड़े थे। माँ, काजल, पापा, उस्ताद, मीरा, शबनम आपा, टिंकू — सब। पर मुझे उस वक़्त कोई नहीं दिखा।
मुझे सिर्फ़ एक छत दिखी।
पुरानी छत। आधी ईंट, आधी टीन। उस पर रस्सी बँधी थी और रस्सी पर कपड़े सूख रहे थे — सफ़ेद, नीला, लाल — हवा में पतंग की तरह।
और उस छत के नीचे, हमारी गली में, एक साइकिल थी।
लाल साइकिल। छोटी। हैंडल पर एक पीतल की घंटी, जिसकी चमक अभी गई नहीं थी।
उस पर एक बच्चा बैठा था। दुबला। घुटने पर फटी पैंट। बाल बेतराब। दोनों हाथ हैंडल पर ऐसे कसे हुए, जैसे किसी ने उसे ज़िंदगी से बाँध दिया हो।
मैं उसे पहचानता हूँ।
वो मैं हूँ।
आठ साल का। या सात का। जितना भी था।
पीछे एक आदमी खड़ा है, जो साइकिल की पिछली सीट पकड़े है। मैं उसकी कलाई देखता हूँ — मोटी, काम से काली, नाखूनों में ग्रीस।
पापा हैं। जवान पापा। दाढ़ी में सफ़ेद बाल अभी नहीं आए। कमर अभी सीधी है।
“चला, चला,” पापा कह रहे हैं। “पैडल दबा। देख मेरी तरफ़ मत, सामने देख।”
मैं पैडल दबाता हूँ। साइकिल एक हाथ आगे जाती है, फिर दूसरा, फिर तिरछी होने लगती है।
“पापा, पकड़े रहना!”
“पकड़ा है। दबा।”
मैं दबाता हूँ। साइकिल हवा में तैरने लगती है। गली की धूल मेरे पैरों के नीचे से उड़कर आगे जाती है। पीपल का पेड़ मेरी तरफ़ दौड़ता लगता है।
और तभी पापा कहते हैं — “अब तू खुद चला।”
मैं घबराकर पीछे देखता हूँ।
और देखता हूँ कि पापा दो कदम पीछे खड़े हैं। हाथ खाली। हवा में।
“पापा!”
साइकिल लड़खड़ाती है। हैंडल मेरे हाथ में मछली की तरह फिसलता है। सामने नाली का पत्थर का पुल आता है और मेरी आँखों के सामने धूल उलटी घूमती है।
धड़ाम।
मैं ज़मीन पर हूँ। साइकिल मेरे ऊपर नहीं, बगल में पड़ी है। उसका पहिया अभी भी धीरे-धीरे घूम रहा है — जैसे हँस रहा हो।
मेरे घुटने पर से खून की पतली लकीर आ रही है। धूल उस पर चिपक रही है।
और मैं रोने लगता हूँ।
ज़ोर से। बहुत ज़ोर से। नाक बहने लगती है, आवाज़ फटने लगती है, हाथ मुट्ठी बन जाते हैं। ऐसे रोना जैसे दुनिया का सबसे बड़ा नुक़सान हो गया हो।
और ऊपर, छत पर, माँ खड़ी हँस रही हैं।
“अरे!” वो पड़ोस की आंटी को दिखाकर कहती हैं। “देख, मेरा ये लड़का कभी रोता ही नहीं। आज इसे क्या हो गया?”
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